अभी वे लाल अंगूठी वाले के विषय में सोच ही रहे थे ,मोहिनी को एक स्वर सुनाई दिया ,जैसे उसकी माँ बोल रही है। तब वो बाहर आकर ,एक रिकॉर्डर को उठाते हैं। आगे बढ़ ही रहे थे ,तभी मोहिनी को एक लाल रिबन दिखलाई दिया। मोहिनी धीरे से झुकी और उसे उठा लिया ,उसकी उँगलियाँ रिबन को छूते ही काँपने लगीं।
एक याद फिर से उसकी अन्तःपटल पर चमकी—तीसरा बच्चा उसके सामने खड़ा था ,उसके हाथ में बिल्कुल ऐसा ही एक लाल रिबन था और वह कह रहा था—“मोहिनी दीदी ! इसे संभालकर रखना,फिर दृश्य बदल गया।वही बच्चा पीछे हट रहा था ,कोई आदमी उसे पकड़कर ले जा रहा था ,मोहिनी रो रही थी और बच्चा जाते-जाते सिर्फ एक बात कह रहा था—“अगर मैं वापस न आऊँ… तो मुझे मरा हुआ मत समझना। मोहिनी की आँखें खुल गईं ,उसने रिबन को कसकर मुट्ठी में पकड़ लिया।
भानु ने, उसका हाथ थाम लिया ,“क्या याद आया?”मोहिनी ने उसकी तरफ देखा।इस बार उसकी आवाज में डर नहीं था ,तब वो बोली - वो बच्चा मुझे छोड़कर नहीं गया था।”
“फिर?”
“उसे किसी ने, मुझसे अलग किया था।”
यह सुनकर भानु की आँखों में गुस्सा उतर आया और अब वो वापस आ गया है।”
मोहिनी ने धीरे से सिर हिलाया ,“हाँ ,शायद”
रूद्र ने दरवाजे की ओर देखा ,उसके मुख से निकला -“नहीं”दोनों उसकी तरफ देखने लगे।रूद्र ने बहुत शांत आवाज में कहा— वापस आने वाला कोई और है।”
“कौन?”
रूद्र ने अपनी मुट्ठी खोली ,उसमें एक पुरानी धातु की चाबी थी।उसी पर खुदा था—R-18 जिसने तुम्हें आज रात यहाँ बुलाया…रूद्र की नजर मोहिनी पर टिक गई ,वो सिर्फ तीसरे बच्चे का संदेशवाहक नहीं है।उसने एक पल रुककर कहा—“वो उस आदमी तक पहुँचने का रास्ता भी है, जिसे इस हवेली ने पच्चीस साल से मरा हुआ बताया है।”
मोहिनी के मन पर एक ही नाम उभरा—'राजवीर 'और उसी क्षण…नीचे हवेली के मुख्य दरवाजे पर जोर से दस्तक हुई।एक बार और तीसरी दस्तक के साथ बाहर से आवाज आई—दरवाजा खोलो…! मैं राजवीर हूँ।”
उसकी आवाज़ सुनकर पूरी हवेली में सन्नाटा छा गया ,नीचे मुख्य दरवाजे पर दस्तक अब भी गूँज रही थी।ठक…ठक....कुछ पल की खामोशी के पश्चात् फिर—ठक… ठक…और उसके बाद वही आवाज—“दरवाजा खोलो… मैं राजवीर हूँ।”
मोहिनी, सीढ़ियों पर खड़ी रह गई ,उसके हाथ में लाल रिबन अभी भी था।
भानु ने रूद्र की तरफ देखा ,रूद्र का चेहरा बिल्कुल बदल चुका था उसने अविश्वास से पूछा -“तुमने कहा था,'' राजवीर जिंदा है।”
भानु ने धीमी आवाज में कहा -“हाँ ,“तो इस बात से क्या मतलब है ?”
रूद्र ने नीचे दरवाजे की तरफ देखा,“तो अब सवाल ये है, कि उसे यहाँ किसने बुलाया?”
पीछे से रत्न प्रताप की आवाज आई—“किसी को दरवाजा खोलने की जरूरत नहीं है।तीनों ने पलटकर देखा। रत्न प्रताप वहीं सीढ़ियों के नीचे खड़ा था।उसका चेहरा कठोर था, लेकिन आँखों में बेचैनी स्पष्ट दिखलाई दे रही थी।
मोहिनी धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी ,रत्न प्रताप ने उसे रोकना चाहा।“मोहिनी ! वहीं रुक जाओ !”ये मेरा आदेश है।
मोहिनी रुक तो गई किन्तु साथ ही उसने रत्न प्रताप से प्रश्न किया -“क्यों?”
रत्न प्रताप ने कोई जवाब नहीं दिया ,तब मोहिनी ने फिर से प्रश्न किया - क्या आप उसे जानते हैं? किन्तु रत्न प्रताप ने तो जैसे चुप्पी साध ली थी। मोहिनी ने फिर पूछा—“रत्न प्रताप जी… क्या आप राजवीर को जानते हैं? उसके स्वर में तेजी थी। इस बार भी कोई जवाब नहीं आया।
तब रूद्र सीढ़ियों से नीचे आया और बोला -“उनसे पूछने की कोई जरूरत नहीं है।”
रत्न प्रताप ने उसकी तरफ देखा ,रूद्र ने कहा—“उनकी चुप्पी ही जवाब है।
”रत्न प्रताप अपने दाँत भींचते हुए बोले - “तुम नहीं जानते हो ,कि तुम क्या कर रहे हो ?”
“और क्या आप जानते हैं?”
“हाँ।”
तो इतने सालों से सच क्यों नहीं बताया? क्यों नहीं बता देते ?मोहिनी को उसका सच !
रत्न प्रताप '' नजरें चुराने लगा ,बाहर फिर आवाज आई -रत्न प्रताप !…”
एक बार फिर सब शांत हो गए ,बाहर वाला आदमी इस बार सीधे रत्न प्रताप को पुकार रहा था और कह रहा था -“रत्न प्रताप, तुम्हें क्या लगा था ?कि मैं कभी वापस नहीं आऊँगा?”
रत्न प्रताप का चेहरा सफेद पड़ गया,'काटो तो खून नहीं 'जैसे उसकी चोरी पकड़ी गयी हो। भानु ने पहली बार अपने पिता-समान उस आदमी के चेहरे पर ऐसा डर देखा था।
तब फिर बाहर से आवाज आई -“दरवाजा खोलो !”या फिर आज भी मुझे मरा हुआ ही मानते हो !”
मोहिनी ने भानु की तरफ देखा , भानु को लगा वो घबरा रही है ,उसने मोहिनी का हाथ पकड़ लिया और बोला -“तुम मेरे साथ रहोगी।”
मोहिनी ने धीमे से कहा—“अगर वो सच में राजवीर हुआ , तो?”
“तो भी,ये दरवाज़ा नहीं खुलेगा ”
“और अगर नहीं है?”
भानु ने उसकी आँखों में देखा।
“तब भी।”
मोहिनी कुछ पल उसे देखती रही ,उसे विश्वास नहीं हो रहा था ,ये ऐसा कैसे कर सकता है ? किन्तु आज उसे पहली बार महसूस हुआ कि इस हवेली में चाहे कितने भी रहस्य क्यों न हों, एक इंसान ऐसा था, जो कम-से-कम इस समय उसके साथ खड़ा था।
तब भानु ने मुख्य दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाया ,रत्न प्रताप ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया ,“मत खोलो !”जैसे उसे वो चेतावनी दे रहा हो। भानु ने उसकी ओर देखा ,“क्यों?”
किन्तु रत्न प्रताप के पास कोई जवाब नहीं था ,भानु ने उसका हाथ हटाया और आगे बढ़कर कुंडी खोल दी।अभी दरवाजा थोड़ा-सा ही खुला था ,बाहर घना अंधेरा था ,मुख्य रास्ते पर कोई दिखाई नहीं दे रहा था।तब भानु ने दरवाजा पूरा खोल दिया किन्तु वहां कोई नहीं था ,सिर्फ फर्श पर एक पुराना चमड़े का बैग पड़ा था।
रणवीर तेजी से आगे आया और पूछा -“वो आदमी कहाँ गया?”
रूद्र ने बैग उठाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया ही था ,रत्न प्रताप ने तुरंत कहा—“उसे मत छूना।”रूद्र रुक गया और पूछा - “क्यों?”
रत्न प्रताप ने कुछ नहीं कहा ,रणवीर ने धीरे से कहा—“अब तो ये और भी दिलचस्प हो गया।”रूद्र ने बैग को ध्यान से देखा ,उस पर धूल जमी हुई थी।किनारे पर एक पुराना धातु का टैग लगा हुआ था।उस पर लिखा था—R.V.
मोहिनी के कदम वहीं रुक गए और बोली -“राजवीर…”
भानु ने बैग खोला ,अंदर तीन चीजें थीं -एक पुरानी घड़ी ,एक फोटो और एक छोटा-सा कागज।भानु ने फोटो उठाई ,उसमें एक जवान आदमी था।उसके साथ एक महिला खड़ी थी और सामने तीन बच्चे।
मोहिनी की साँस अटक गई ,वही तीन बच्चे ,वही लाल रिबन ,वही चेहरा जिसे वह अपनी यादों में खोज रही थी ,लेकिन इस बार तस्वीर के पीछे कुछ और भी लिखा था। भानु ने पढ़ा—“18 अगस्त 2001 — आखिरी बार साथ।”
मोहिनी ने, वो फोटो भानु के हाथ से छीनकर अपने हाथ में ले ली।“आखिरी बार…”उसने धीरे से कहा।“मतलब इसके बाद…”
भानु ने कागज उठाया ,उस पर एक लाइन और लिखी थी—“तीसरे बच्चे को बचाना था, बाकी दोनों को भूलना था।”
