Kiski dulhan [part 47]

वह आदमी अभी तक किसी को दिखा नहीं था किन्तु जैसे ही उसका चेहरा दिखा, सभी चौंक गए। अब वह आदमी सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा ,लेकिन इस बार उसके चेहरे पर वो रहस्यमयी शांति नहीं थी ,जो मोहिनी ने पहले देखी थी ,आज वह परेशान नजर आ रहा था। जैसे उसे किसी ऐसी चीज़ का पता चल गया हो ,जिसकी उसे उम्मीद नहीं थी।वह नीचे आया और सबके सामने रुक गया। उसकी नजर सबसे पहले मोहिनी  पर गई फिर भानु और रत्न प्रताप पर.... तब उसने प्रश्न किया -क्या तुम लोगों ने उसे देख लिया ?”

रत्न प्रताप ने कठोर आवाज़ में पूछा—किसे?”

M.V. ने कोई उत्तर नहीं दिया,सिर्फ मोहिनी की तरफ देखता रहा।

मोहिनी ने आगे बढ़कर पूछा— वह बच्ची कौन थी ?”


M.V. की आँखों में एक पल के लिए बेचैनी दिखलाई दी ,फिर उसने कहा—जिसका नाम तुम्हें अभी नहीं जानना चाहिए।”

मोहिनी के चेहरे पर गुस्सा आ गया ,जब भी किसी से कुछ भी पूछो ! मुझसे हर कोई यही कहता है।”वह आगे बढ़ी ,“मेरी माँ कौन थी—मत पूछो !“मेरे पिता कौन थे—मत पूछो ! मेरे बचपन में क्या हुआ था —मत पूछो !”उसकी आवाज़ भर्रा गई। अब वह बच्ची कौन है ? यह भी मत पूछो !

M.V. शांत रहा, मोहिनी की आँखों में आँसू आ गए और पूछा -कब तक ,हम इन्हीं पहेलियों में उलझे रहेंगे ?जिनका जबाब किसी के पास नहीं है। कमरे में सन्नाटा छा गया। वो आगे बोली - कब तक ,मेरी जिंदगी के फैसले दूसरे लोग करते रहेंगे?”

भानु उसके समीप आकर खड़ा हो गया ,और मोहिनी का समर्थन करते हुए बोला - अब कोई इसे चुप नहीं कराएगा।”

M.V. ने भानु को देखा और उससे पूछा - तुम्हें क्या लगता है ? कि सच जानने से सब ठीक हो जाएगा। ”

क्या नहीं होगा ?भानु ने शांत स्वर में कहा-' लेकिन झूठ में जीने से भी सब ठीक नहीं होगा।”

M.V. ने हल्की साँस छोड़ी ,और मोहिनी की तरफ देखते हुए बोला - तुम बिल्कुल अपने पिता जैसी हो।”

मोहिनी चौंक गई ,मेरे पिता ?”

M.V. की नजर तुरंत रत्न प्रताप  पर गई।

रत्न प्रताप कड़े स्वर में बोला —बस !

M.V. मुस्कुराया ,अब भी वही डर ?”

“तुम नहीं समझोगे,रत्न प्रताप मन में दबी पीड़ा से बोला। 

“मैं सब समझता हूँ।”

मोहिनी ने उनकी बातें सुनी तो उसे लगा ,दोनों के मध्य कुछ तो ऐसा था जिसे देखकर मोहिनी को लगा कि वे दोनों केवल पुराने परिचित ही नहीं थे ,बल्कि उनके मध्य कोई पुराना अपराध या कोई ऐसा रहस्य…जिसे दोनों एक-दूसरे के विरुद्ध इस्तेमाल कर सकते थे।

मोहिनी  ने पूछा— आपने कहा था,' कि आपने मुझे बचाया नहीं था… छिपाया था।”

M.V. ने उसकी ओर देखा ,“हाँ में जबाब दिया। 

आपने मुझे किससे बचाया था ?”

 कुछ पल वो चुप रहा फिर बोला—उस आदमी से, जिसने तुम्हें पैदा होते ही मरवा देने का आदेश दिया था।”

मोहिनी का शरीर जैसे सुन्न पड़ गया ,भानु ने तुरंत उसकी ओर देखा। आपने यह बात पहले मुझे क्यों नहीं बताई ?

M.V. ने उत्तर दिया— क्योंकि तब तुम दोनों तैयार नहीं थे।”

क्या अब तैयार हैं ?”

“अब भी नहीं।”

मोहिनी ने दृढ़ता से कहा—फिर भी बताइए ! 

M.V. ने अपनी जेब से एक छोटी-सी पुरानी वस्तु निकाली, पीतल की सीटी ! उसे देखकर जैसे  की साँस रुक गई ,वही सीटी…जो कुछ मिनट पहले उस बच्ची के हाथ में थी। ये सब आपके पास कैसे आई?”

M.V. ने कहा—ये मेरे पास नहीं आई।”वह सीटी मोहिनी की ओर बढ़ाते हुए बोला—यह हमेशा से ही तुम्हारी थी।

मोहिनी ने ,सीटी हाथ में ली, उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं और जैसे ही उसने सीटी को छुआ…एक तेज स्मृति उसके भीतर कौंधी। वह दौड़ रही थी ,उसके छोटे पैर फर्श पर फिसल रहे थे ,पीछे कोई आदमी चिल्ला रहा था—“दरवाजा बंद करो!” एक बच्ची उसका हाथ पकड़े हुए थी।' मोहिनी, भागो!” मोहिनी ने उस बच्ची की तरफ देखा ,लेकिन उसका चेहरा दिखलाई नहीं दे रहा था ,फिर वही आग ! फिर धुआँ !फिर एक पुरुष का हाथ ,जिसमें वही लाल अंगूठी ,और वही आवाज़—एक को बचाओ… बाकी दोनों को खत्म कर दो !” मोहिनी ने अचानक सीटी छोड़ दी ,वह पीछे हट गई ,“नहीं…”

भानु ने उसे पकड़ लिया और घबराते हुए पूछा - क्या हुआ?”

मोहिनी  काँपते हुए बोली—उस रात…”

“क्या?”

कोई हमें मारना चाहता था।”

M.V. ने आँखें बंद कर लीं ,बोला - हाँ ”

“कौन?”फिर वही चुप्पी।

मोहिनी ने सीधे उसकी आँखों में देखा ,“वही आदमी?”

M.V. ने हाँ में सिर हिलाया ,जिसकी अंगूठी उस बच्ची के पास है?”

M.V. कुछ कहता, उससे पहले रत्न प्रताप  बोल पड़ा—नहीं ,”सभी ने उसकी ओर देखा ,रत्न प्रताप  की आवाज़ बहुत धीमी थी ,वह अंगूठी उसकी नहीं है।”

मोहिनी  ने पूछा—तो किसकी है ?”

रत्न प्रताप ने उत्तर नहीं दिया। M.V. ने भी उसकी तरफ देखा ,दोनों की आँखों में एक पुराना संघर्ष उभर आया ,तब  M.V. ने कहा— 'रत्न प्रताप …”

“क्या?”

“अब झूठ बोलने का समय समाप्त  हो गया है।”

रत्न प्रताप ने उसकी ओर घूरकर देखा और बोला - अगर सच बाहर आ गया तो केवल यह हवेली नहीं जलेगी ,क्या तुम ये बात समझते हो ?

“हाँ, मुझे मालूम  है।”

“तो फिर चुप रहो !”

“अब बहुत देर हो चुकी है।”

अचानक नीचे से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई ,ठक ! सभी एकसाथ चौंक गए।

भानु  ने तुरंत मोहिनी को अपने पीछे किया। साया ने तेज स्वर में  पूछा—नीचे कौन है ?”

किन्तु कोई उत्तर नहीं आया ,तब M.V. ने धीरे से कहा— शायद वो वापस आ गई।”

मोहिनी ने पूछा—“कौन?”

M.V. ने उसकी ओर देखा और बोला “वही बच्ची !”सबकी नजर सीढ़ियों के नीचे गई ,वहाँ घना अंधेरा था।फिर…एक छोटी-सी परछाईं धीरे-धीरे दीवार के पीछे से निकली ,बच्ची !वही लाल अंगूठी ,वही पीतल की सीटी उसके हाथ में थी ,वह कुछ कदम आगे आई और इस बार उसने सीधे M.V. को देखा और बोली -“आप फिर देर से आए।”

M.V. का चेहरा बदल गया ,उसने धीरे से कहा—“तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए था।”

बच्ची मुस्कुराई और बोली - लेकिन आप जानते थे, कि मैं आऊँगी।”M.V. चुप रह गया। 

मोहिनी ने आगे बढ़कर पूछा—“तुम कौन हो? बच्ची ने उसकी ओर देखा ,कुछ पल तक बस उसे देखती रही ,फिर उसने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ कागज निकाला ,वह कागज मोहिनी  की ओर बढ़ाते हुए बोली—“इसे पढ़ो !”

मोहिनी ने वो कागज हाथ में लिया और पढ़ने लगी ,कागज पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—“जिसे तुम अपनी माँ समझती हो, वह तुम्हारी माँ की आखिरी गवाही है।”

मोहिनी ने ,मृणाल की तरफ देखा ,उसकी आँखें जैसे मृणाल से पूछ रहीं थीं ,क्या ये सब सही है ?मृणाल की आँखों से आँसू बहने लगे ,वह बुदबुदाई -“यह कागज मैंने लिखा था।”

मोहिनी का दिल बैठ गया “लेकिन क्यों?आपने ऐसा क्यों किया ?

मृणाल ने कोई जवाब नहीं दिया ,बच्ची धीरे-धीरे पीछे हटने लगी। मोहिनी ने उसका हाथ पकड़ना चाहा और बोली -“रुको!”बच्ची रुक गई ,उसने पलटकर देखा और बहुत धीमे से कहा—मुझे पहचानने के लिए तुम्हें अपना बचपन याद करना होगा।”

मुझे ,तुम्हारा नाम जानना है ,मोहिनी ने जिज्ञासावश कहा। 

बच्ची ने मुस्कुराकर सिर हिलाया “अभी नहीं।”

“क्यों?”


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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