Shaitani sa......18

केतकी बेचैन ,परेशान सी घूम रही थी उसका किसी भी कार्य में दिल नहीं लग रहा था। जब से वो श्याम से मिली थी ,तबसे उससे मिलने की इच्छा न जाने क्यों बढ़ गयी है ?ये बात तो ,वो स्वयं ही नहीं जानती ,वो उससे क्यों मिलना चाहती है ? बार -बार उसके ही ख्याल मन में क्यों आ रहे हैं ? किसी भी कार्य में मन नहीं लग रहा। घर में भी मन नहीं है। बाहर आती है तो न जाने क्यों नजरें किसी की तलाश में इधर -उधर भटक रहीं हैं। 

आज से पहले तो उसे कभी किसी ने रोका -टोका नहीं, किन्तु आज लगता है। हर किसी की नजर उसी पर टिकी है वे उसे इधर -उधर जाने से मना कर रहे हैं। बेवज़ह ही हरिया काका की ट्यूबवैल तक घूम आई किन्तु वहां बहुत भीड़ देख निराश हो वापस चली आई। 


अब वो निराश हो घर की तरफ जा ही रही थी। तभी दूर से उसे एक साया आता दिखलाई दिया। उसके ह्रदय की धड़कनें स्वतः ही बढ़ने लगीं। एक उम्मीद की लहर उसकी नस -नस में दौड़ गयी। उसके क़दम जस के तस थम गए। जब वो साया कुछ और क़रीब आया ,धड़कनें बेक़ाबू हो चली थीं। चेहरे पर अनजाने ही मुस्कान फैल गयी। आश्चर्य से उसकी आँखें स्थिर हो ,उधर ही देखने लगीं। दिल किया ,उसके यहां आने से पहले ही दौड़कर उसके समीप पहुंच जाये। 

 इस समय वो उस ऊपर वाले कुछ और भी मांगती तो शायद वो भी मिल जाता। उसके दिल का क़रार उसके सामने साईकिल से चला आ रहा है। उसका दिल किया दौड़कर जाये और उससे लिपट जाये किन्तु लोकलाज भी कुछ होती है या नहीं। 

 मन में अचानक बहुत गुस्सा आया और प्रसन्नता उसके चेहरे से गायब हो गयी ,किन्तु वहीं खड़ी उसके क़रीब आने की प्रतीक्षा करती रही। जब तक श्याम उसके करीब आया उसने अपना चेहरा दुपट्टे से ढ़क लिया। 

अरे !आज यहाँ कैसे ?तुम तो खेतों में होती हो। 

मैं  कहीं भी रहूं ,तुम्हें क्या ? तुम तो अपने गांव चले गए होंगे। 

हाँ ,चला तो गया था किन्तु कल ही आ गया था। 

कल आकर भी बताया नहीं ,कि मैं आ गया हूँ। 

कैसे बताता ?तुम तो कहीं दिखी ही नहीं। 

क्यों ?मैं क्या  गांव से बाहर चली गयी थी ,उसने व्यंग्य किया। इसी गांव की हूँ ,इसी गांव में तो रहूंगी। 

वो तो  मैं भी जानता हूँ ,तुम्हें बताकर भी क्या हो जाता ? तुम तो, मुझसे मिलना ही नहीं चाहतीं । 

ये तुमसे किसने कहा ? 

तो  क्या मिलना चाहती थीं ?वो साईकिल से उतर गया। 

उसके साईकिल से उतरते ही, केतकी घबरा गयी और बोली -तुम साईकिल से क्यों उतरे ?

बात करने के लिए ,अब क्या ऐसे ही बात करता ? वैसे तुम बताओ !तुम, मुझसे क्यों मिलना चाहती थीं ?

मैंने कब कहा ?मैं मिलना चाहती थी। 

अभी  तो तुमने कहा ,ख़ैर ये सब छोडो !तुम मेरा इंतजार क्यों कर रहीं थी ? 

नहीं तो.... 

अच्छा ,फिर मुझसे ही गलती हो गयी होगी ,दीपक सोचते हुए बोला। तभी केतकी ने उसका हाथ पकड़कर खींचा और उसे खेंचते हुए बोली -शायद कोई आ रहा है ,चलो ! उधर चलते हैं। 

कौन आ रहा है ?कहते हुए वो भी अपनी साईकिल सहित उसके साथ खिंचता चला आया। ये तुम क्या कर रही हो ?

तुमने देखा नहीं कोई आ रहा था। 

आ रहा था ,तो क्या हुआ ?इससे पहले तो तुम कभी किसी को देखकर छुपी नहीं फिर आज क्या हो गया ?

उसकी बात सुनकर केतकी सोचने लगी ,'ये सही तो कह रहा है ,ये एहसास होते ही वो शांत खड़ी हो गयी। और सोचने लगी -मैंने ऐसा क्यों किया, मुझे न जाने क्या होता जा रहा है ?

उसे देखकर श्याम मुस्कुराया और बोला - क्या  मुझसे प्यार करने लगी हो ?

नहीं तो... मैं भला ऐसा क्यों करूंगी ?

तुम्हें कुछ भी पता नहीं ,तुम मेरी ही प्रतीक्षा में थीं ,है न.... मुझे देखकर तुम्हारा दिल किया ,तुम मुझसे लिपट जाओ !मुझसे लड़ो ! इतने दिनों से तुम कहाँ थे ?

ये  सब तुम्हें कैसे पता ?

मैं जानता हूँ ,अपनी शान दिखाते हुए श्याम बोला -उसका साहस बढ़ा और बोला -किसी भी काम में मन नहीं लग रहा होगा। 

हाँ हाँ ,अब तो केतकी को लगा, श्याम ने उसका मर्ज़ पकड़ लिया है ,आश्चर्य से बोली - तुम तो डॉक्टर निकले। 

डॉक्टर नहीं जादूगर !

वो कैसे ?

मैंने तुम्हारा दिल चुरा लिया और तुम्हें पता ही नहीं चला ,बस लक्षण दिख रहे हैं। केतकी शर्मा गयी आज ऐसा पहली बार हुआ और झेंपते हुए बोली -डॉक्टर साहब ! इसका कोई इलाज़ है। 

हाँ अवश्य है ,तुम्हें प्रतिदिन मुझसे मिलने आना होगा ,तुम्हारे सीने में जो मेरे नाम का दिल धड़क रहा है ,अब उसे मेरे बिन चैन नहीं आएगा। 

नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। 

क्यों ?क्या अब तक भी तुम्हें पता नहीं चला, तुम्हारी क्या हालत हो गयी ?गले मिल जाओगी तो दिल को और सुकून मिलेगा। कहते हुए उसने अपनी बाहें खोल दीं। केतकी जो आज तक अपनी याद में किसी से शरमाई नहीं थी। आज घबरा भी गयी और शर्माकर लाल भी हो गयी। तभी बाहर की तरफ देखकर बोली -वो लोग चले गए कहते हुए वहां से बाहर की तरफ भागी। 

ये तो छल है ,श्याम बोला -मैं तुम्हारा इलाज़ कर सकता हूँ। 

तुम्हें मेरे दिल का हाल मालूम है और अपने दिल का हाल नहीं बताया ,चलते -चलते केतकी बोली। 

तुम्हारा इलाज करते -करते मेरा इलाज़ भी हो जायेगा। तुम मेरे दिल का हाल अब तक नहीं समझी ,मैं तो एक ही मुलाक़ात में समझ गया। अच्छा ,ये तो बताओ ! कल कब मिलोगी ?खुलकर अपने दिल का हाल बताऊंगा। 

कहाँ मिलोगे ?अब केतकी ने मिलने से इंकार नहीं किया ,सोच रही थी पहले की तरह ये कहीं चला न जाये। कल हमारे कुएं के पास आना ,वहाँ कम ही लोग जाते हैं। कहते हुए भाग गयी। जब गांव के नजदीक पहुंची तब उसने गहरी -गहरी सांसे ली। अपने चेहरे को छुआ ,जो अभी भी गर्म था। जैसे कोई चोरी करके आ रही हो। तब उसने वहीं नल से पानी लेकर मुँह धोया ,अपने ह्रदय की धड़कनों को नियंत्रित किया। प्रसन्नता और घबराहट के मिले जुले भाव थे। 

जब घर पहुंची ,तब माँ ने पूछा -कितनी देर लगा दी ?अब तक कहाँ थी ?

वो सहेली के घर चली गयी थी। 

उन्होंने उसका चेहरा देखा और उससे कहा  -इधर आ !

केतकी घबरा गयी और बोली -क्या हुआ ?

तू ठीक तो है। 

हां हाँ वो दूर से ही बोली। 

फिर तेरा चेहरा इस तरह लाल क्यों है ?इधर आ देखु तो जरा, तुझे बुखार तो नहीं हुआ। 

नहीं ,खिसियानी सी मुस्कुराहट से बोली -पता नहीं आज बार -बार मुँह गर्म हो रहा है। मैंने बाहर के नल पर पानी से धोया भी था। 

तब तो तूने कसकर चेहरा रगड़ दिया होगा। क्या तुझे इतनी भी अक़्ल नहीं ,चेहरे की त्वचा नाजुक होती है। ऐसे जोर से नहीं रगड़ते हैं। पता नहीं ,इस लड़की का क्या होगा ? ब्याह की उम्र हो रही है ,किन्तु इसका बचपना अभी भी नहीं गया। न जाने, इसको कब अक्ल आएगी ?कहते हुए वो सब्ज़ी काटने लगीं। 

केतकी तेजी से सीढ़ियों से चढ़ते हुए ऊपर जाने लगी किन्तु सलवार के पायंचे में पैर उलझ गया ,गिरते -गिरते बची। अपने कमरे में पहुंचकर पलंग पर बैठी और  सोचने लगी -ये मुझे क्या हो रहा है ?ऐसा लग रहा है , जैसे मैं बौरा गई हूँ ।  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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