हाँ ,हत्या हुई थी, उसके अरमानों की,उसके जज्बातों की।
वो डोली में बैठी थी, रो रही थी ,फ़िक्र किसे अरमानों की ?
आज वो रोइ थी बहुत ,अपनों के लिए नहीं , अपने लिए।
अपने अरमानों का गला घोंट ,बैठी डोली में परवानों की।
रस्मों की ख़ातिर ,उलझा ,हत्या थी, उसके अरमानों की।
हत्यारों ने छला उसे ,करे शिकायत किससे ?अपनों की।
जड़ों से दूर अपनी किया ,बिरहा की भट्टी में झोंक दिया।
क़दम रखे , नई दुनिया में ,क्या उन्होंने ने भी साथ दिया ?
छला अपनों ने ही ,हत्या भी हुई थी ,उम्मीदों ने साथ दिया।
कितनी मांगों को कुचला ?रहस्य उसने सीने में दफ़्न किया।
रातों को रोती ,मुस्कुराहटों के पीछे' राज' उसने छुपा लिया।
दिन बढ़ते गए , उम्र भी छलती रही, रहस्य उसने बना लिया।
बेमौत वो मरती रही ,न जाने किस -किस ने विष दिया ?
कागज़ की कश्ती में बैठ ,आगे बढ़ती, मरती- जीती रही।
सागर की लहरों सी उठती -गिरती सम्पूर्ण समर्पण दिया।
नासूर बने ज़ख्मों की 'आह' हत्याओं का राज़ छुपा लिया।
प्रेम की कुंजी ऐसी न थी ,जिसके समक्ष राज़ खोल सके।
उम्मीदों की भर उड़ान ,अरमानो के वो बोल, खोल सके।
अपना समझ ,समक्ष उसके 'हत्या का रहस्य 'खोल सके।
अरमानों की लाशों में एक चिंगारी बाकि है,कब सुलग़ उठे ?
.jpg)