Dhokha [part 32]

दीपक हमेशा की तरह ,नंदिनी की प्रतीक्षा कर रहा था किन्तु नंदिनी नहीं आई , प्रतीक्षा करते हुए उसने समय देखा ,बहुत देर हो गयी ,अब तक तो उसे आ जाना चाहिए था। तब वो ,जाने से पहले एक बार नंदिनी से पूछने के लिए उसके घर गया और बाहर से ही अंदर झांक रहा था। नंदिनी तो नहीं दिखी किन्तु नानी ने उसे अवश्य देख लिया ,वो वापस जाने के लिए मुड़ा ही था। नानी ने पूछा -बाहर कैसे खड़े हो ? अंदर आ जाओ !

नहीं, नानी मुझे देर हो रही है ,मैं उसकी प्रतीक्षा में था ,अभी तक नंदिनी नहीं आई ,क्या उसे आज जाना नहीं है ? 

क्या ?तुम्हें नंदिनी ने बताया नहीं था, आज वो नहीं जाएगी, अपने घर जो गई हुई है। 

अच्छा !उसे बताना तो चाहिए था, मैं इतनी देर से उसकी प्रतीक्षा में था ,कहते हुए आगे बढ़ा और पूछा -कब वापस आएगी ?

चार दिन बाद लौटेगी,उनकी आवाज पीछा करते हुए उसके कानों तक पहुंची।  

उसने इस बात का मुझे एक बार भी ज़िक्र नहीं किया , उसे बताना तो चाहिए था ,नाराज होते हुए दीपक बुदबुदाते हुए,मोटरसाइकिल पर बैठा और आगे बढ़ गया।

 आज इस तरह अकेले जाते हुए ,कुछ अच्छा नहीं लग रहा था, उसको तो जैसे नंदिनी को साथ ले जाने की आदत बन गई थी। उसकी मोटरसाइकिल पर पीछे नंदिनी बैठी होती थी , अनजाने ही उसका मन उदास हो गया ? यह बात समझते हुए भी वह समझ नहीं पा रहा था। मन ही मन क्रोध आ रहा था ,झुंझलाहट हो रही थी ,कम से कम वो बता तो सकती थी। 

अभी कुछ दूर ही गया था ,तभी एक साईकिल से टकरा गया ,झुंझलाते हुए बोला -क्या साईकिल भी ठीक से  चलाना नहीं आता ?कहते हुए ,क्रोध से उसे घूरा ,आगे निकल गया। 

पीछे से वह व्यक्ति चिल्ला रहा था -'मोटरसाइकिल है ,तो क्या किसी को भी कुचल कर निकल जाएगा वह तो गाड़ी नहीं, तब इतनी अकड़ है। '' किंतु दीपक के पास इतना समय ही नहीं था, कि ठहर कर उसे देखे या फिर उसकी बात का जवाब दे किंतु मन ही मन सोच रहा था -' आज तो दिन ही खराब है। '

दफ्तर पहुंचा ,तो उसका उदास चेहरा देखकर उसके मित्र ने पूछा -क्या हुआ ?

मतलब ,मैं कुछ समझा नहीं,किस विषय में बात कर रहे हो ?

तुम्हारे विषय में ही बात कर रहा हूँ ,तुमसे ही पूछ रहा हूँ ,इस तरह तेरा चेहरा क्यों लटका हुआ है ?

नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है  

दीपक का सारा दिन ऐसे ही उदासी में बीता ,किसी भी काम में मन नहीं था ,अंदर ही अंदर उसे क्रोध आ रहा था किन्तु क्रोध का कारण क्या है ?वो स्वयं ही नहीं समझ पा रहा है। बस, ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे उससे कुछ छूट गया है। शाम को चुपचाप वापस लौट तो आया किन्तु आज यही घर सूना लग रहा है। घुटन सी महसूस होने लगी। उसने रसोईघर में जाकर चाय बनाई और छत पर आ गया। दूर -दूर तक छतें ही नजर आ रहीं थीं। बार -बार उसकी नज़र नानी की छत पर जाकर ठहर जाती ,कभी लगता जैसे अभी नंदिनी उसे हाथ हिलाकर अपने होने का एहसास कराएगी। 

घर में, उसका मन नहीं लग रहा था, नीचे आ गया ,बाहर टहलने के लिए निकल गया ,कुछ देर बग़ीचे में बैठा रहा। अपनी गंभीरता में उसने, अपने मन के खालीपन को छुपाया हुआ था। घर वापस जाने का मन नहीं था तब सोचा - आज बाहर ही खाना खा लेता हूँ ,यह सोचकर वह पास में ही किसी ढाबे पर गया किन्तु एक गिलास लस्सी कहकर वह बैठ गया। 

तब दीपक ने सोचा ,वो यहां से गई है किंतु फोन पर चैट तो हो सकती है कोई संदेश तो भेजा जा सकता है।  तब उसने फोन उठाया और नंदिनी को लिखा - जब तुम्हें जाना था, तो क्या बता कर नहीं जा सकती थीं ? मैं सुबह तुम्हारी प्रतीक्षा करता रहा ,दीपक ने, ये लाइन लिख तो लीं फिर सोचा,भेजूं या नहीं ,न जाने वो क्या सोचेगी ? कुछ देर ऐसे ही बैठा रहा और अंत मैं वो संदेश भेज ही दिया ,जो होगा देखा जायेगा। तब तक एक लस्सी उसके सामने आकर रख दी गयी थी किन्तु उसका, उस पर ध्यान ही नहीं था।  

तभी नंदिनी का जबाब आ गया ,संयोग से अचानक ही आना हो गया इसलिए तुम्हें नहीं बता सकी। मन में जैसे ख़ुशी की लहर दौड़ गयी। चेहरे पर स्वतः ही मुस्कान आ गयी ख़ुशी में लस्सी का गिलास मुँह से लगाया और एक घूंट भरकर उसने जबाब लिखा - यार ! ये क्या तरीका है ,एक इंसान तुम्हारी प्रतीक्षा में खड़ा है और मेेडम हैं कि ग़ायब !😔

ओह ! सॉरी !सॉरी !आपको इंतज़ार करना पड़ा 😊

अच्छा !तुम्हें हंसी सूझ रही है ,यहाँ हमारा सारा दिन बर्बाद हो गया ?

कैसे ,क्या हुआ ?😟

तब दीपक को लगा ,शायद उसने कुछ गलत लिख दिया ,तब उसने लिखा , ऐसी कोई विशेष बात नहीं है। और बताओ !घर में सब कैसे हैं ? तुम्हारे मम्मी -पापा ,तुम्हारा बेटा केेसा है ? क्या उससे मिली हो ?

घरवाले सभी ठीक हैं, किन्तु नितिन का अभी कुछ मालूम नहीं है। वो तो उस कोठी में बंद है। मैं जा भी नहीं सकती। हो सकता है ,मुझे मिलने ही न दें क्योंकि मैंने उनके बेटे को जेल जो पहुंचा दिया था । अभी भी उन्हें मेरी ही गलती नजर आती है। 😔

ओहो !मैंने तो तुम्हें उदास  कर दिया। 

नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है ,ये तो सच्चाई है ,इससे क्या मुँह मोड़ना ?और तुम बताओ !आज का दिन कैसे बीता ?तुम कह रहे थे ,बर्बाद हो गया। 

पता नहीं क्यों ?आज किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था ,सब कुछ उदास सा लग रहा था ,सोचा तुम्हें फोन कर लूँ। 

सही कह रहे हो ,आज मुझे भी ऐसा ही लग रहा था ,जैसे कुछ छूट सा गया है। 

हाँ ,सही कह रही हो ,अब तुम्हारे साथ जाने की आदत जो हो गयी है।आख़िर वाक्य लिख ही दिया।  

साहब ! खाना लगवा दें !

हाँ एक थाली ! कहकर वो फिर से चैट में व्यस्त हो गया।अच्छा ,अब ये बताओ ! अब कब आने का इरादा है ?

सोचकर तो यही आई थी ,कि तीन -चार दिन यहाँ रहूंगी किन्तु दूर चले जाने से वो अपनापन न जाने  कहाँ खो जाता है ? यहाँ आती हूँ ,तो मम्मी का वही राग शादी कब कर रही हो ?

उनकी चिंता अपनी जगह सही है। 

हाँ, तुम्हें तो ऐसा ही लगेगा ,अच्छा ये सब छोडो !तुम्हारा भोजन हो गया। 

नहीं ,अब यहीं बैठकर भोजन  कर रहा हूँ ,भूख तो नहीं थी इसीलिए यहाँ लस्सी पीने आया था ,तुमसे बातें करते -करते थाली ही मंगवा ली। 😃

अच्छा जी ! तुम तो भोजन कर रहे हो और मुझसे पूछा भी नहीं , भोजन किया या नहीं 😏

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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