Kiski dulhan [part 36]

साया उनसे पूछता  है -जब आप लोगों ने, मृणाल को मरते नहीं देखा ,न ही उसका शव देखा है ,तब आप लोगों ने कैसे मृणाल को मृत घोषित कर दिया ?

साया का ये प्रश्न सुनकर विक्रम ने सिर झुका लिया और बोला - हमें ऐसा करना पड़ा था।"

साया की नज़र उन पर गई और  पूछा -किसी से बचाने के लिए?"

विक्रम चुप रहा ,रत्न प्रताप ने कहा—अब ये  बातें नहीं होगीं ।"


साया मुस्कुराया -"फिर कब?"

"जब मोहिनी स्वयं पूछेगी? उसकी आवाज़ में पहली बार कठोरता थी।

तुम्हें क्या लगता है ,वह अब तक सवाल नहीं कर रही थी ?"

उधर सुरंग में...मोहिनी और भानु चाँद वाले रास्ते पर आगे बढ़ते जा रहे थे ,उस राह में ,दीवारों पर अब छोटे-छोटे चाँद बने थे ,कुछ पूरे ,कुछ आधे और कुछ पूरी तरह टूटे हुए।मोहिनी  ने एक जगह रुककर दीवार को देखा और भानु से बोली -"यह देखो !

भानु उसके समीप आया।दीवार पर कई तारीखें खुदी थीं।एक...दो...तीन...कुल सात तारीखें।हर तारीख के सामने एक छोटा-सा निशान था लेकिन आख़िरी तारीख के सामने...एक प्रश्नचिह्न था ?भानु ने कहा—"ये शायद पूर्णिमा की तारीखें हैं।"

मोहिनी ने गिनती की "सात बार..और आठवीं ?"

भानु ने प्रश्नचिह्न को छुआ "शायद अगली।"

मोहिनी  ने धीरे से कहा - इसका अर्थ है, यह सब पहले भी हो चुका है।"

भानु  ने उसकी ओर देखा ,"क्या?"

"तुमने नहीं देखा? मोहिनी ने दीवार की ओर इशारा किया,तुमने ध्यान नहीं दिया "हर पूर्णिमा के सामने एक निशान है।"

"मतलब..."

हर बार कोई यहाँ आया था।"

भानु कुछ क्षण सोचता रहा ,फिर बोला—उसने दीवार पर बने छोटे निशान को गौर से देखा या हर बार कोई यहाँ से गायब हुआ था।"

मोहिनी की आँखें फैल गईं ,दोनों कुछ क्षण तक चुप रहे ,तभी...दीवार पर एक और निशान उभर आया ,आठवाँ !वह धीरे-धीरे चमकने लगा ,भानु पीछे हट गया और बोला -यह अपने-आप बन रहा है। "

मोहिनी ने फुसफुसाकर कहा—"क्योंकि अगली पूर्णिमा आने वाली है और तभी...सुरंग के भीतर कहीं दूर से घंटी की आवाज़ आई ,टन...एक बार फिर...टन...दूसरी बार !मोहिनी का चेहरा सफेद पड़ गया। वो बोली -यह वही आवाज़ है।"

"कौन-सी?"

"जो मुझे हर रात दो बजे सुनाई देती है।"

भानु ने मशाल कसकर पकड़ ली "लेकिन अभी तक तो दो नहीं बजे हैं।"

मोहिनी ने घड़ी देखी -1:47 AM

भानु ने धीरे से कहा—अभी तेरह मिनट हैं ,दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

सुरंग अचानक और ठंडी हो गई ,मशाल की लौ छोटी होने लगी।

मोहिनी ने अपने दोनों हाथ बाँध लिए ,मुझे लग रहा है ,जैसे कोई हमें देख रहा है।"

भानु ने चारों ओर देखा, लगता तो मुझे भी यही है। "

उन्होंने अपने पीछे देखा ,कुछ नहीं ,आगे देखा कुछ नहीं ,लेकिन फिर...मोहिनी  की नज़र ज़मीन पर पड़ी।वहाँ गीले पैरों के निशान थे।छोटे ,बहुत छोटे !जैसे किसी बच्चे के।वे निशान उनके आगे जा रहे थे।और आश्चर्य की बात...उन पर धूल नहीं जमी थी।जैसे कोई अभी-अभी वहाँ से गुज़रा हो। मोहिनी  ने धीमे से कहा—शायद ये उसी के पदचिह्न हैं।"

भानु  ने पूछा—"किसके?"

मोहिनी ने जवाब नहीं दिया ,अभी उसे पक्का यकीन नहीं था ,वह उन निशानों के पीछे चलने लगी।

भानु उसके साथ हो लिया ,कुछ दूर जाने के बाद वे एक छोटे गोल कमरे में पहुँचे। कमरे के बीचोंबीच...एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी थी।कुर्सी के सामने एक छोटी मेज़।मेज़ पर...एक लाल कपड़े में लिपटी वस्तु।

मोहिनी  ने कपड़ा हटाया ,उसके अंदर एक पुराना लॉकेट था।वही आकार...जो उसकी पायल में लगा था।उसने लॉकेट उठाया।पीछे सिर्फ़ एक अक्षर खुदा था—"म"

भानु ने कहा—"मृणाल।"

मोहिनी ने लॉकेट खोला ,अंदर एक छोटी सी तस्वीर थी।तस्वीर धुंधली थी ,लेकिन उसमें दो औरतें थीं।एक युवा ,दूसरी उससे थोड़ी बड़ी और उनके बीच...एक छोटी बच्ची !मोहिनी  की उँगलियाँ काँपने लगीं और बोली - भानु ..."

"हाँ?"

"इस बच्ची के चेहरे को देखो !"

भानु ने तस्वीर देखी ,उसका चेहरा अचानक बदल गया "ये..."वह बोलते-बोलते रुक गया।

मोहिनी  ने पूछा—"क्या?"

भानु ने तस्वीर उसकी ओर वापस कर दी और बोला -"मुझे नहीं पता ,लेकिन उसकी आँखें कुछ और कह रही थीं।

मोहिनी ने गौर से देखा ,तस्वीर में बच्ची के गले में...वही लॉकेट था और उसके नीचे...एक छोटा-सा अक्षर था। मोहिनी ने फुसफुसाकर कहा—क्या ये मैं हूँ।"

भानु ने कोई उत्तर नहीं दिया क्योंकि उसी क्षण कमरे की दीवार पर एक छाया उभरी।एक महिला की छाया।वह धीरे-धीरे मोहिनी के पीछे आकर रुकी।

मोहिनी  ने भी उसे देखा ,वह छाया...बिना किसी शरीर के दीवार पर बनी हुई थी,फिर उसने हाथ उठाया।और दीवार पर एक शब्द लिखा—"माँ"मोहिनी की आँखों से आँसू बह निकले "माँ..."उसके मुँह से अनायास निकला।

उस छाया ने दूसरा शब्द लिखा—"ज़िंदा।"मोहिनी की साँस जैसे रुक गई।

भानु ने भी वह शब्द पढ़ लिया ,दोनों कुछ क्षण तक स्तब्ध खड़े रहे ,लेकिन इससे पहले कि वे कुछ समझ पाते...घड़ी ने दूर कहीं से पहला घंटा बजाया।टन...1:59 AMऔर उसी समय...लॉकेट के भीतर छिपा एक बहुत छोटा कागज़ बाहर निकल आया। उस पर केवल एक पंक्ति थी—"जब घड़ी दो बजाए, तो पीछे मत देखना।"मोहिनी ने काँपते हुए वह पंक्ति पढ़ी।

भानु  ने तुरंत कहा..."मोहिनी 'टन...घड़ी ने दो बजने की पहली घंटी बजाई और उनके पीछे...किसी के धीरे-धीरे चलने की आवाज़ आने लगी।छप...छप...छप...

मोहिनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं।भानु  ने उसका हाथ पकड़ लिया और फिर...अंधेरे में किसी महिला की फुसफुसाहट गूँजी—बेटी..."मोहिनी की आँखों में आँसू भर आए।वह आवाज़...उसे अपनी माँ की लग रही थी ,लेकिन वह पीछे नहीं मुड़ी ,क्योंकि कागज़ पर आख़िरी शब्द अब भी उसके सामने थे—"पीछे मत देखना।

टन...

दूसरी घंटी की गूँज अभी सुरंग की दीवारों में घूम ही रही थी कि मोहिनी के पीछे से फिर से वही आवाज़ आई—"बेटी..."

मोहिनी  की आँखें बंद थीं।उसकी साँसें तेज़ हो चुकी थीं।आवाज़ इतनी परिचित थी कि उसका पूरा शरीर उसे पलटकर देखने के लिए मजबूर कर रहा था ,लेकिन उसके हाथ में अब भी वही छोटा-सा कागज़ था।"जब घड़ी दो बजाए, तो पीछे मत देखना।"

भानु ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया ,और बोला - मोहिनी कुछ भी हो जाये ,पीछे मत मुड़ना।"

"वो मेरी माँ है...मोहिनी की आवाज़ काँप रही थी ,मुझे उनकी आवाज़ पहचान में आ रही है।"

आवाज़ पहचान में आ सकती है,भानु ने धीमे स्वर में कहा -लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पीछे वो ही हों।"कुछ क्षण सन्नाटा रहा।फिर कदमों की आवाज़ और करीब आ गई।छप...छप...अब ऐसा लग रहा था जैसे कोई उनके ठीक पीछे खड़ा हो।मोहिनी ने अपनी आँखें और कसकर बंद कर लीं।

फिर उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाया—"तुमने मेरी बात क्यों नहीं मानी?"मोहिनी  के शरीर में जैसे बिजली-सी दौड़ गई।वह लगभग पलट ही गई थी कि विराज ने उसका हाथ रोक लिया और बोला -"नहीं!"

अगले ही पल...सुरंग में तेज़ हवा चली और मशाल बुझ गई , चारों ओर पूर्ण अंधकार छा गया।भानु ..!क्या तुम यहाँ हो ?

"हाँ ,मैं यहीं हूँ।"

"क्या तुम्हें कुछ दिख रहा है ?"

"नहीं।"

"वह कहाँ गई?"

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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