नंदिनी की नानी चाहती थी ,दीपक हमारे घर आये और उससे कुछ बातें हों ,मेलजोल बढ़े और उसके विषय में कुछ जानने का मौका मिले, किन्तु नंदिनी ने तो जैसे ठान ही लिया है ,वो कुछ भी ठीक से होने देना नहीं चाहती है। तब नानी से कहती है -मैंने उसका आज 'धन्यवाद' कर दिया है। इसके लिए उसे घर में बुलाने की कोई आवश्यकता नहीं है।
उसकी बातें सुनकर नानी चिढ गयीं और बोलीं - तुझसे, कितनी बार कहा है, कि मेरे '' कामों में टांग मत अ ड़ाया कर ''जब मैंने कहा है ,कि उस लड़के को खाने पर बुलाना है ,तो फिर यह बहाने बाजी क्यों ?
नानी ! आप तो बुरा मान गयीं , आप, उसे खाने पर क्यों बुलाना चाहतीं हैं ? क्या मैं समझती नहीं ?आपने आज तक तो उसे कभी खाने पर बुलाने के लिए नहीं कहा था ।
इससे ,पहले उसे क्यों बुलाना था ? क्या 'मैं'उसे पहले से जानती थी ?जब हम किसी अनजान इंसान के सम्पर्क में आते हैं ,तब ही तो उससे मिलकर, उसके विषय में जानकारी होती है। अब हम हर किसी को तो घर पर नहीं बुला सकते ,उसे इसीलिए बुलाना है क्योकिं वही लड़का, कई बार हमारे साथ खड़ा रहा है। मैं अकेली क्या -क्या करती ? उसने ही हर परेशानी में हमारी सहायता की है, इस सोसाइटी से हमारी सहायता के लिए और कोई तो नहीं आया। जब तू गर्भवती थी ,तब भी वही आया था इसीलिए उसे ही बुलाया है।अब कुछ बात समझ में आई। काम कोई करे ,खाने के लिए पूरे क्या मौहल्ले को न्यौता दे दूँ ,बात करती है। नानी ने मुँह बनाया।
हालाँकि उनका उद्देश्य वही था जो नंदिनी समझ रही थी किन्तु उसको, उस समय समझाने के लिए उन्होंने जो तर्क दिया ,वो भी अपनी जगह उचित था। वो नहीं चाहती थीं कि नंदिनी बेवज़ह ही कुछ का कुछ समझने लगे ,जब तक ये न पता चले ,दीपक के मन में क्या है ? नंदिनी अभी भी शांत रहकर अपना काम कर रही थी। उन्हें लगा ,नंदिनी को अभी भी मेरी बातों पर विश्वास नहीं है।
अरे !तू समझती क्यों नहीं ,वो हमारा पड़ोसी है ,हमारे कितने काम आया है जब तू गर्भवती थी,डॉक्टर के ले गया। तुझे या तेरे बच्चे को मारने का प्रयास किया गया , तब भी उसने हमारा साथ नहीं छोड़ा और अब अपने काम को लेकर तुम कितनी परेशान थीं ,तब भी, वो ही तुम्हारा साथ दे रहा है और हमें क्या चाहिए ? ऐसे अच्छे पड़ोसी का क्या हमें 'स्वागत 'नहीं करना चाहिए ?
मैं, सब समझती हूं ,इससे पहले कि वो कुछ और कहती ,नानी ने उसे घूरा और हम्म्म्म !की आवाज निकाली।
मैं कुछ नहीं कह रही ,आपकी जैसी इच्छा हो ,करिये ! मुझे क्या ?
क्या आप उसे ,एक अच्छे पड़ोसी होने के नाते ही, यहां बुलाना चाहती हैं ,तब भी नंदिनी ने अपनी शंका ज़ाहिर कर ही दी और हंसने लगी।
नंदिनी की बात सुनकर नानी भी हंसी और बोलीं -तू नहीं मानेगी। इंसानियत के नाते तो हमें ,उसकी इंसानियत की कदर करनी चाहिए ,उसका सम्मान करना चाहिए इसीलिए तो बुला रही हूँ। जबकि नंदिनी जानती थी कि नानी का दीपक को अपने घर बुलाने का उद्देश्य कुछ और ही है। ये सब उसकी मम्मी ने ही कहा होगा।
नंदिनी अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर लेट जाती है। कहने को तो दीपक अच्छा लड़का है और दीपक, नंदिनी को समझाता भी रहता है, किंतु इसका अर्थ यह तो नहीं कि मैं उसके गले ही पड़ जाऊं ,वह नानी की सब चालें बड़े अच्छे से समझती है। वे भी क्या करें ?इतने दिनों से यहाँ रह रही हूँ , हो सकता है ,इनसे मम्मी ने ही कहा हो क्योंकि मां को तो फ़िक्र रहती ही है। मुझे भी तो अपने बेटे नितिन की फ़िक्र रहती है।
मैं भी क्या कर सकती हूँ ?किस पर विश्वास करूं किस पर नहीं ,प्रतीक को ज़िंदगी 'धोखा' दे गयी। मुझे मौत ने नहीं बुलाया ,वो चाहती थी ,मैं प्रतीक के बच्चे के लिए जिऊँ ,उसकी यादों को समेट इस ज़िंदगी से लड़ती रहूं। प्रतीक के भाई ने उसे धोखा दिया ,उसे ही नहीं मुझसे भी छल किया और अब न जाने कौन ?हम पर अपनी आँखें जमाये बैठा है ? ऐसे में दीपक ही हमारे साथ खड़ा दिखलाई दिया है।
अब तक तो वो ही अपना नजर आ रहा है। मैं उससे खूब बातें करती हूँ फिर भी विश्वास करते हुए ड़र लगता है। न जाने कब, किस रूप में ये 'धोखा 'हमारी प्रतीक्षा में हो।
तभी उसके विचारों ने पलटा खाया , पता नहीं, ये क्यों समझना नहीं चाहती ?दीपक जो अब तक मेरे साथ हमदर्दी जतला रहा है ,नानी का मंसूबा जानकर जो मेरी थोड़ी बहुत सहायता करता है ,हो सकता है उससे ऐसी बात करके शायद वह मेरी सहायता करना ही बंद कर दे। यहां आना ही बंद कर दे किंतु ये लोग, तो समझना ही नहीं चाहती हैं। तब नानी का दिल रखने के लिए उसने कह तो दिया, अच्छा ठीक है ,उसे बुला लेंगे। किन्तु क्या ये उचित रहेगा ? कुछ भी करने पर अब न जाने क्यों डर समा जाता है ?
अगले दिन नंदिनी जब ,अपनी संस्था में जाने के लिए तैयार थी ,तब नानी ने उसे फिर से याद दिलाया -आज दीपक से कह देना ! उसका हमारे यहां रात का खाना है।
मन ही मन नंदिनी सोच रही थी, इस बात को ये अभी तक भूली नहीं हैं। वैसे कोई बात स्मरण करने को कहो तो,कह देंगी -'अब मेरी उम्र हो गयी है ,इस उम्र में ज्यादा कुछ याद नहीं रहता। '' तब बोली -ठीक है , नानी ! मैं ,उससे कह दूंगी-कि तुम्हें मेरी नानी ने खाने पर बुलाया है। किंतु यदि वह, मुझसे पूछने लगा - उन्होंने मुझे किसलिए बुलाया है ?क्या कोई कार्यक्रम है ,जन्मदिन की पार्टी है ,मुझे क्यों बुला रहीं हैं, तब 'मैं' उससे क्या कहूंगी ?
नानी, सोचने लगीं , इससे पहले कि वो कुछ कहतीं, नंदिनी गीत गुनगुनाने लगी -'' शायद मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है ,इसीलिए नानी ने मेरी तुम्हें चाय पर बुलाया है ,''कहते हुए जोर-जोर से हंसने लगी और बोली -क्या नानी !आप मुझे इतना मूर्ख समझती हो कि मैं आपकी बातों का अर्थ ही नहीं समझ पाऊंगी।
जब तू इतनी ही समझदार है, तो फिर मुझसे क्यों पूछ रही है? कोई भी अच्छा सा बहाना बनाकर उसे खाने पर बुला लेना , नानी ने कहकर बात की इति की । फिर उन्होंने सोचा ,कहीं ऐसा न हो, ये उसे बुलाये ही न... तब बोलीं -तू तो मूर्ख भी नहीं है ,तू तो बहु प्यारी बेटी और एक बच्चे की प्यारी माँ है। अपने अधिकारों के लिए लड़ना जानती है ,भला !तुझसे समझदार कौन होगा ?
जानती हूँ ,कहकर नंदिनी बाहर निकल गयी।
नानी जी !वास्तव में खाना बहुत ही स्वादिष्ट बना है। आपके हाथों में तो जादू है, जादू !भोजन करने के पश्चात दीपक बोला।
ये खाना मैंने नहीं ,नंदिनी ने बनाया है ,तुम्हें क्या लगता है ?अब इस उम्र में इतनी देर तक खड़े रहकर मैं खाना बना पाऊँगी।तुम्हें नंदिनी को धन्यवाद कहना चाहिए। दीपक ने नंदिनी की तरफ देखा और मुस्कुराकर बोला -इतने बेहतरीन और स्वादिष्ट भोजन के लिए धन्यवाद !
