Kiski dulhan [part 29]

 मोहिनी के इतना कहते ही ,कि उसने अपनी बंद आँखों से एक छोटी बच्ची और आग देखी है।  

यह सुनते ही ,रत्न प्रताप राजवीर के हाथों से तलवार छूट गई और विक्रम ने भी ,अपना चेहरा घुमा लिया। यह सब भानु ने भी देखा और उसने तुरंत पूछा -क्या आप लोग , इस विषय में कुछ जानते हैं  ? किन्तु उन्होंने कोई जबाब नहीं दिया। 

विक्रम भी चुप रहे ,तब भानु ने उनसे पूछा -"पापा...! जबाब दीजिये ! इस बार भानु की आवाज़ में गुस्सा नहीं...दर्द था, आपको कुछ पता है ,न ?"



विक्रम ने उसकी ओर देखा ,उनकी आँखें भर आईं ,लेकिन उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा—"कुछ सच...जानना इंसान को मजबूत नहीं करता।"कभी-कभी..उसे तोड़ देता है।"

धड़ाम !' गोल कक्ष 'का मुख्य दरवाज़ा हिल गया ,पहला वार ! फिर दूसरा ! पत्थर में दरार पड़ने लगीं ।'रक्षक मंडल' के लोग अंदर आने के लिए बेताब थे। साया ने,वो डायरी अपनी छाती से लगा ली और बोला -"अब हमें फैसला करना ही होगा।"

रत्न प्रताप ने पूछा—"किस बात का ? 

साया ने उसकी ओर देखा और पूछा - किसे बचाना है...फिर उसकी नज़र मोहिनी पर गई ...और किसे मरने देना है ?"

मोहिनी ने, उसकी आँखों में देखा ,पहली बार उसे लगा...यह आदमी उन्हें बचाने नहीं आया है। वह उन्हें एक ऐसी दिशा में धकेल रहा है, जहाँ से वापस लौटना संभव नहीं होगा और तभी...डायरी का एक पुराना पन्ना अपने-आप खुल गया। उस पन्ने पर सिर्फ़ एक वाक्य लिखा था—"जिस रात दुल्हन पहली बार गायब होगी, उसी रात पहला नाम वापस लौटेगा।''यह पढ़कर मोहिनी की तो जैसे साँस ही रुक गई।

भानु ने भी, वह वाक्य पढ़ लिया,रत्न प्रताप ने ,अपनी आँखें बंद कर लीं और साया...बस मुस्कुराता रहा।

डायरी के खुले हुए पन्ने पर लिखे शब्दों ने पूरे 'गोल कक्ष 'की हवा बदल दी थी।

"जिस रात दुल्हन पहली बार गायब होगी,' उसी रात पहला नाम वापस लौटेगा।"मोहिनी  की आँखें उस वाक्य पर जमी थीं। उसे ऐसा लग रहा था, जैसे वह सिर्फ़ किसी पुरानी डायरी का वाक्य नहीं...बल्कि उसकी अपनी ज़िंदगी का कोई ऐसा हिस्सा पढ़ रही हो, जिसे उससे वर्षों से छिपाया गया था।

भानु ने डायरी की ओर देखा और फिर मोहिनी की ओर "दुल्हन''...उसने धीमे से कहा -इसका मतलब तुम !"

मोहिनी  ने उसकी ओर देखा, लेकिन उसके पास कोई जवाब नहीं था।वह सिर्फ़ इतना जानती थी कि शादी के बाद से हर रात ठीक दो बजे उसके साथ कुछ तो ऐसा होता था, जिसे वह खुद पूरी तरह से समझ नहीं पाती थी। कभी उसे लगता था कि वह नींद में हवेली के किसी हिस्से में चली जाती है। कभी उसे कुछ धुंधली आवाज़ें सुनाई देती थीं और कभी...उसे ऐसा लगता था ,जैसे कोई उसे बुला रहा हो ,लेकिन आज पहली बार उन घटनाओं का संबंध इस हवेली के किसी पुराने रहस्य से जुड़ता दिखलाई दे रहा था।

"पहला नाम कौन-सा है ? भानु ने साये से पूछा।

साया चुप रहा

तब वो, अपने शब्दों में दबाब बनाते हुए ,बोला मैंने पूछा..." पहला नाम कौन-सा है? कहते हुए थोड़ा आगे बढ़ा। 

साये ने डायरी बंद कर दी"अगर मैं अभी बता दूँ....तो तुम वही करोगे ,जो तुम्हारे पिता ने पच्चीस साल पहले किया था।"

भानु का चेहरा सख्त हो गया  -"मेरे पिता ने क्या किया था?"

साया ने, विक्रम की ओर देखा ,"यह सवाल उनसे पूछो !"

भानु तुरंत अपने पिता की ओर मुड़ा -"पापा !ये क्या कह रहा है ?"

विक्रम ने नज़रें झुका लीं "अभी नहीं।"

"क्यों, अभी क्यों नहीं ?

"क्योंकि..."विक्रम ने भारी आवाज़ में कहा -तुम्हें पहले यह समझना होगा, कि तुम्हारे सामने कौन लोग खड़े हैं ?"

साया हल्का-सा हँसा ,और यही तुम्हारी सबसे बड़ी गलती है, विक्रम ! तुम हमेशा चाहते हो, कि बच्चे सच सुनने से पहले बड़े हो जाएँ।"

धड़ाम! मुख्य दरवाज़े पर तीसरा वार हुआ।इस बार पत्थर की एक मोटी परत टूटकर नीचे गिर गई।दरवाज़े के पीछे से 'रक्षक मंडल' के लोगों की आवाज़ें सुनाई देने लगीं -"दरवाज़ा तोड़ो !"उन्हें बाहर निकलने का मौका मत देना !"

रत्न प्रताप ने अपनी तलवार कसकर पकड़ ली ,अब बहस का समय नहीं है।"उन्होंने साये की ओर देखा -"क्या तुम्हें यहां से निकलने का कोई रास्ता पता है।"

साया मुस्कुराया - मुझे कई रास्ते पता हैं।"

"तो हमें यहाँ से निकालो !उन्होंने तुरंत कहा। 

सबको?"साये ने पूछा।

रत्न प्रताप  की आँखें सिकुड़ गईं ,और विश्वास से कहा -"हाँ।"

साये ने मोहिनी और भानु की ओर देखा ,फिर बहुत शांत स्वर में बोला—"नहीं "

कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया ,भानु  ने तलवार की मूठ पकड़ ली -"क्या मतलब? क्या यहां से सब नहीं जायेंगे ?

साया उसके पास आया ,"तीसरी सुरंग में दो रास्ते हैं -एक रास्ता बाहर जाता है ,दूसरा...उसने मोहिनी  की तरफ देखा..उस जगह जहाँ से तुम्हारी कहानी शुरू हुई थी ,मोहिनी  के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

रत्न प्रताप ने  तुरंत कहा—"नहीं।"

साया ने उनकी ओर देखा -"क्यों?"

"क्योंकि वह दरवाज़ा बंद ही रहना चाहिए वो पच्चीस साल से बंद है। 

"हाँ ,जानता हूँ और अगर वह दरवाज़ा कभी न खुलता..."साये की आवाज़ अचानक कठोर हो गई...तो क्या तुम्हें लगता है, कि आज यह सब होता ?"

रत्न प्रताप चुप रहे।

साये ने आगे कहा—तुमने एक बच्ची को बचाने के लिए दरवाज़ा बंद किया था।"

यह बात सुनकर मोहिनी  का दिल जैसे रुक-सा गया ,बच्ची ! कौन सी बच्ची ? फिर वही शब्द ,फिर वही संकेत ! लेकिन इससे पहले कि वह कुछ पूछती...

रत्न प्रताप ने ,साया के आगे अपनी तलवार कर दी और क्रोध से गरजते हुए बोला - एक शब्द और नहीं ....तो इस बार तुम्हें बचाने वाला कोई नहीं होगा।"

साया शांत रहा ,तुम आज भी वही रत्न प्रताप हो ,"गुस्से में सच से भागने वाले।"

अचानक मोहिनी के सिर में तेज़ दर्द उठा ,उसने दोनों हाथ सिर पर रख लिए और कराहते हुए उसके मुख से निकला -"आह...!!

भानु तुरंत उसके पास पहुँचा -"मोहिनी! तुम्हें क्या हुआ ?

"मैं ठीक हूँ...उसने टालने का प्रयास किया। 

"नहीं, तुम ठीक नहीं हो।"

भानु ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोला -यहां बैठो !

मोहिनी बैठने ही वाली थी ,कि तभी उसकी नज़र दीवार पर पड़ी।वहाँ आठ गोल चिन्ह चमक रहे थे।एक...दो...तीन...चार...पाँच...छह...सात...और आठवें चिन्ह के भीतर एक बेहद हल्की लाल रेखा बन रही थी। उनको देखकर वह अनायास उठ खड़ी हुई।"यह सब क्या है ?

अजनबी ने तुरंत उसको आगे बढ़ने से रोक दिया -"उसे मत छुना !"

"क्यों ?

क्योंकि वह तुम्हें पहचान रहा है।"

मोहिनी ने उसकी ओर देखा,"कौन?"अजनबी ने उत्तर नहीं दिया,लेकिन उसकी आँखों में डर साफ़ था।

उसी क्षण...मुख्य दरवाज़ा टूट गया ,धड़ाम! पत्थरों का मलबा चारों ओर बिखर गया।धुएँ के बीच रक्षक मंडल के लोग भीतर घुस आए। सबसे आगे उनका नेता था ,उसकी नज़र सबसे पहले रत्न प्रताप  पर पड़ी।फिर विक्रम पर और फिर भानु पर और अंत में...मोहिनी पर ,वह कुछ क्षण तक उसे देखता रहा ,फिर उसकी आँखें डायरी पर टिक गईं और आदेश देते हुए बोला -"उसे हमारे हवाले कर दो।"

भानु ,मोहिनी के सामने खड़ा हो गया ,"नहीं।"

नेता ने उसे देखा ,"तुम नहीं जानते कि तुम किसकी रक्षा कर रहे हो?"

मोहिनी का ऐसा कौन सा राज है ?जो उसके पीछे 'रक्षक मंडल 'का नेता पड़ा है। आख़िर वो लोग मोहिनी से क्या चाहते हैं ?जानने के लिए पढ़िए -किसकी दुल्हन ?



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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