प्रवीण ,शिल्पा से नाराज था ,वो उसे समझाना चाहता था कि जब से वो इस नौकरी के चक्कर में घर से बाहर निकली है। उसके व्यवहार में काफी परिवर्तन आ गया है। ये चीजें इंसान स्वयं भी नहीं समझ पाता किन्तु उस बदलाव को, उसके साथ रहने वाले लोग समझ जाते हैं। प्रवीण को भी लगा और महसूस हुआ या फिर उससे किसी ने कुछ कहा। वो शिल्पा से शायद बहुत कुछ कहना चाहता है किन्तु स्पष्ट रूप से नहीं कह पा रहा था इसीलिए शिल्पा भी नहीं समझ पा रही थी।
अब मैंने आपको पैसे देने का इंतजाम तो कर लिया है ,अब आप क्या चाहते हैं ?कुछ बताते भी नहीं पहेलियाँ बुझाये जा रहे हैं ,उसने कह तो दिया, किन्तु अंदर ही अंदर घबरा भी रही थी कहीं प्रवीण उसकी कोई सच्चाई उसके सामने न ला दे ! तब वो चुपचाप लेट गयी।
प्रवीण उसे देखता रहा और फिर करवट बदलकर सो गया। शिल्पा के मन का चोर उससे नजरें चुरा रहा था मन ही मन घबराई हुई थी ,प्रवीण को कहीं से, कुछ पता तो नहीं चल गया। न जाने ,वो कौन सी घड़ी थी ?जब चतुर मेरे जीवन में आया और मेरे मन में नौकरी की जिज्ञासा पैदा कर मेरे जीवन में ज़हर घोल गया। तब उसने मन ही मन निश्चय किया,वो अब नौकरी छोड़ देगी।
सामाजिक दृष्टि से देखा जाये तो चतुर और शिल्पा का रिश्ता अनैतिक ही था। यदि उसे स्वयं ही लगता वो अपनी जगह सही है तो इस तरह प्रवीण से नजरें न चुराती। उसे स्वयं भी लगता है ,उसका ये' रिश्ता नाजायज़ है।'
अगले दिन, शिल्पा जब स्कूल में गई , तो वह रो रही थी, उसे लगा 'चतुर को उससे हमदर्दी होगी, और चतुर ने हमदर्दी दिखलाइ भी... लेकिन साथ ही साथ यह भी कहा-' कि जब आपको मालूम था कि पैसों की जरूरत पड़ सकती है तो फिर आपको पैसे नहीं लाने चाहिए थे।' मैंने आपसे कोई जबरदस्ती नहीं की थी।आप हमारी भाभी हैं ,पहले आपको अपना घर देखना चाहिए। अब आप कपिला जी को ही ले लीजिये !वो कितने अच्छे से अपना घर -परिवार संभाल रहीं हैं ? और एक बेहतर शिक्षिका भी हैं।
उसकी बातें सुनकर शिल्पा दंग रह गई ,क्या यह वही चतुर है ? इसने एकदम से कैसे अपना किरदार ही बदल दिया ? खैर...यह सब छोड़िए ! मैं देखता हूं ,मैं क्या कर सकता हूं ?यह कहते हुए चतुर ने बात को बदल दिया। आज शिल्पा को लग रहा था ,जैसे उसका कोई अस्तित्व ही नहीं रह गया है। जब वो इस स्कूल में आई थी, कितनी प्रसन्न थी और सोचती थी -जीवन ने मुझे एक और मौका दिया है ,अपने को साबित करने का किन्तु यहाँ आकर चतुर की लच्छेदार बातों में आकर अपने लक्ष्य से भटक गयी और अपने आपको खो दिया।
आज उसे चतुर की आँखों में अपने लिए वो सम्मान ,अपनापन कुछ भी दिखलाई नहीं दे रहा था। ऐसा लग रहा था 'जैसे उसने बहुत कुछ खो दिया है। आज वो सम्मान उसे चतुर की आँखों में कपिला के लिए नजर आ रहा था। ये एहसास होते ही ,शिल्पा को बहुत बुरा लगा उसका दिल किया कि वो अभी उसकी नौकरी छोड़कर वहां से चली जाये किन्तु इसमें तो उसका ही नुकसान है। यह सोचकर उसने अपने को शांत किया किन्तु अब उसे लगने लगा,कि वो चतुर के द्वारा छली गयी है। अब उसे अपनी पिछली हरकतें मूर्खतापूर्ण लग रहीं थीं। उसकी आँखों से चतुर की लच्छेदार बातों की जैसे पट्टी उतर चुकी थी। जो उसने खोया इस बात का उसे दुःख था।
प्रवीण के साथ जो झगड़े हुए ,उन्हें सोचकर उसे अपने आप पर ग्लानि हो रही थी। उसे अफ़सोस हो रहा था वो कैसे उसकी बातों के जाल में फंस गयी ? अपने ही हाथों से अपना घर उजाड़ने चली थी। कुछ दिनों तक उसे दुःख रहा किन्तु उस विद्यालय में प्रतिदिन आती और अपना काम करती।
एक दिन चतुर वहां नहीं था ,शायद काम करते हुए अचानक बाहर चला गया। विद्यालय का सम्पूर्ण हिसाब -किताब वो स्वयं ही रखता था। उसके लिए उसने किसी भी, अध्यापिका को नियुक्त नहीं किया था।उसकी मेज और दराज़ अलग थी ,जिस पर हमेशा ताला लगा रहता था। संयोग से उस समय चतुर वहां नहीं था। तब शिल्पा ने ,उस रजिस्टर की जाँच की और पाया। सभी बच्चों का शुल्क नियत समय पर आ चुका था। शिल्पा ने तीन -चार महीने की आमदनी आय -व्यय का ब्यौरा जाँच करने पर पाया। चतुर ने उससे सब झूठ बोला था।
तब वो क्या चाहता था ?शिल्पा परेशान हो उठी ,मैंने व्यर्थ में ही भावुकता में उससे हमदर्दी जतलाई। उस समय तो शिल्पा के मन में चतुर के प्रति प्रेम था। उसका सुख -दुःख उसे अपना नजर आ रहा था। आज उसे मालूम पड़ रहा था। सब कुछ एक छल था। वहां कुछ पैसे भी रखे थे। शिल्पा तुरंत उस स्थान से हटी और खिड़की से झाँक कर देखा कोई आ तो नहीं रहा है। तब वो फिर से वहीं जाती है और अपने बीस हज़ार लेकर वहां से चली जाती है।
किन्तु उसकी अंतरात्मा कह रही थी -यह तो चोरी हुई, किन्तु उसने अपने आपको समझाया ,चोर के घर चोरी करना चोरी नहीं है ,वो भी तो लोगों को ,तभी अपने शब्दों में सुधार किया महिलाओं की भावनाओं के साथ खेलकर ,उनकी अस्मत और सम्मान को कुचलता है।
किन्तु चोरी तो नहीं करता ?
उसने मुझसे झूठ बोलकर मेरे सामने ही मुझसे पैसे लिए ,वो शब्दों से खेलता है ,उसने अपने शब्दों के जाल में मुझे फंसाया और अब मैं उस जाल से मुक्त होना चाहती हूँ। हो सकता है ,वो मेरे पैसे ही न दे ,बात पैसे की भी नहीं ,मैं तो उसके लिए सब कुछ न्यौछावर करने के लिए तैयार थी किन्तु अब लगता है ,सब कुछ मेरा भ्र्म और उसका आडंबर था और अब यही जाल वो कपिला पर डालना चाहता है। अब उसे क़ामयाब नहीं होने दूंगी। बहुत देर तक अपने आपसे लड़ती रही अपने आपको समझाती रही ,धीरे से पिछले दरवाजे से निकलकर अपनी कक्षा में पहुंच गयी।
चतुर जब वापस आया ,अपना सामान देखकर उसे स्मरण हुआ वो जल्दबाज़ी में ऐसे ही छोड़कर चला गया था। तब उसने सारा सामान समेटा और दराज़ में ताला लगा दिया। उसने सोचा भी नहीं होगा कि किसी ने उसके पैसे हटा लिए हैं क्योकिं अभी अध्यापिकाएं अपनी -अपनी कक्षा में थीं।
शिल्पा सारा दिन घबराती रही, कि कहीं चतुर को पैसों पर शक न हो जाये ,पैसे उसके बैग में ही थे। घर पहुंचकर सबसे पहले उसने पैसे अपनी सहेली तन्वी के बैंक अकाउंट में डलवाये और एक ,लम्बी गहरी साँस ली। अब उसे कोई फ़िक्र नहीं थी ,जिसका पैसा था ,उसके पास पहुंच गया और उसका पैसा भी वापस आ गया ,हालाँकि उसने सोचा था ,जब मेरे पैसे मुझे वापस मिल जायेगें ,तो नौकरी छोड़ दूंगी किन्तु अब उसके पैसे उसे वापस तो मिले हैं किन्तु अभी नौकरी नहीं छोड़ना चाहती है।
अगले दिन जब शिल्पा विद्यालय पहुंची ,तब सभी अध्यापिकाएं और बच्चे प्रार्थना स्थल पर उपस्थित थे।
