शिल्पा बहुत परेशान थी और वो अब चाहती थी ,कि प्रवीण को बिना पता चले ही, उसकी समस्या का समाधान हो जाये। वो,अपनी सहेली तन्वी से कुछ पैसे उधार मांगती है और उसने ,शिल्पा की सहायता भी की किन्तु शिल्पा को, उसके पैसे भी तो वापस करने हैं इसीलिए वो चतुर को फोन करती है ताकि और पैसे उससे लेकर प्रवीण को दे सके।
पहले तो चतुर फोन ही नहीं उठाता है और जब फोन उठाता है ,तब उसे ,शिल्पा की घबराई सी आवाज उसे सुनाई दी -हे भगवान ! शुक्र है, तुमने फोन तो उठाया। कल कहाँ चले गए थे ? कल मैंने कहा था -मुझे कोई आवश्यक बात करनी है।
हाँ ,मुझे याद है ,मेरा भी आवश्यक कार्य आ गया था। बताइये !आपने मुझे क्यों फोन किया ?जबकि वो जानता था ,शिल्पा उसे फोन क्यों कर रही है ?
देखिये !आप तो जानते ही हैं, कि मैंने अपने सभी पैसे आपको दे दिए किन्तु अब मुझे बहुत ही आवश्यक कार्य आन पड़ा है ,तो..
उससे पहले कि शिल्पा कुछ और कहती , तब वो कहता है - बहन जी !आप क्या बातें कर रही हैं , एकदम से चतुर का बातचीत करने का लहज़ा ही बदल गया और बोला -वो पैसे मैंने आपसे मांगे नहीं थे ,आप स्वयं लेकर आई थीं। मैंने तो कहा था, मैं कुछ दिनों तक इंतजार कर लूंगा ,किन्तु आप तो ज़बरन ही मेरी सहायता करने पर तुली हुई थीं , आपको अपनी बात का मान रखना था। मैंने तो आपसे पैसे मांगे भी नहीं।
ये आप कैसी बातें कर रहे हैं ?आपने मुझे अपनी समस्या बताई ,मैंने उसका समाधान करना चाहा। चतुर से बातें करते हुए शिल्पा सोच रही थी -ये किस तरह का इंसान है ?इतने दिनों से मैं, इसके साथ रही हूँ ,कितने अच्छे तरीक़े से बात करता था किन्तु आज तो ऐसे बात कर रहा है ,जैसे जानता ही नहीं। एक ही पल में उसकी नजरों के सामने वो 'दृश्य ,चलचित्र की भांति घूम गए। जब वो उसकी प्रशंसा करते हुए ,उसके आगे -पीछे घूम रहा था और एक दिन... तो उन्होंने सम्पूर्ण सीमाएं ही लाँघ दी किन्तु आज ये मैडम से ,बहनजी !पर आ गया, सोचकर शिल्पा की आँखों से अश्रु बहने लगे।
आप सुन रहीं हैं ,मैं क्या कह रहा हूँ ? इतनी जल्दी 'मैं'पैसों का इंतजाम कैसे कर सकता हूं ?
जो लोग आपको पैसे दे रहे थे , उनसे माँग लीजिए ?अभी मुझे बहुत ही जरूरी है ,शिल्पा गिड़गिड़ाई।
क्या समय आ गया है ? किसी की सहायता का ये सिला मिला ,अभी कुछ दिनों पहले तक तो उसे लग रहा था कि जैसे चतुर पर उसका अधिकार है ,वो किसी भी चीज के लिए उसे मना नहीं करेगा किन्तु आज लगता है ,जैसे उसने बहुत बड़ा धोखा खाया हो और अब सम्भलने का समय ही नहीं। धीरे -धीरे अपनी गलतियों का एहसास हो रहा था।
आज ज़िंदगी की सबसे बड़ी ठोकर खाई है ,अपने जीवन में झांक रही थी ,ये उसने क्या कर डाला ?पछतावे के सिवा उसके पास कोई और उपाय नहीं है। उसने बड़े प्यार से मुझे फुसला लिया ,छोटी बच्ची होती तो किसी को मेरे साथ हमदर्दी भी होती किन्तु दो बच्चों की माँ से तो कोई ऐसी बेवकूफी की उम्मीद न करेगा। बाक़ी के पैसे किससे मांगूं ? आँखों से झर -झर अश्रु बहे जा रहे थे। अपने घर में मायके वालों से मांगू तो पूछेंगे -'किसलिए चाहिए ?आज तक प्रवीण ने कभी किसी से उधार नहीं लिया ,मेरे मायके से तो कभी नहीं।
अपने मन को समझाया और पुनः चतुर को फोन लगा दिया ,इससे पहले कि वो कुछ कहता ,उससे पहले ही शिल्पा बोल उठी ,प्लीज़ !फोन मत काटना और मेरी बात ध्यान से सुनो !पूरे पैसे नहीं कम से कम मुझे पंद्रह हज़ार तो दे ही सकते हो, उतने से ही काम चल जायेगा।
उधर से आवाज़ आई , देखता हूं ,कुछ पैसे मेरे पास पड़े हो तो मैं दे दूंगा। मैंने ,आपसे पैसे देने से कब मना किया ? मुझे तो आपके पैसे देने ही हैं ,किन्तु अभी 'हाथ तंग ही है ',यह कहते हुए उसने शिल्पा पर एहसान जतलाते हुए उसे ₹15000 देने का वादा किया।
वायदा नहीं करना है ,तुरंत मेरे अकाउंट में भेज दो ! बहुत जरूरी है।
शिल्पा के अकाउंट में पैसे आ जाने पर ,वो मन ही मन प्रसन्न हो गयी। मन का कितना बड़ा बोझ उतर गया हो ? जैसे ... उसने गहरी -गहरी स्वाँसे अपने सीने में भरीं। सुकून से बैठकर चाय पी। अभी कुछ देर पहले उसने कितनी दर्द भरी और ड़री हुई ज़िंदगी का सामना किया था। चाय के हर घूंट के साथ ,मन ही मन कुछ सोच रही थी।
शाम को शिल्पा ने, अपने पति से कहा - पैसों का इंतजाम तो हो गया है। आपको जब भी आवश्यकता हो ले सकते हैं।
उसके पति को, उस पर बहुत क्रोध आया और बोला - अपने घर में पैसा होते हुए भी, किसी से मांगना पड़ रहा है। आखिर तुम ऐसा क्यों कर रही हो ?आज तक मैंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया।
तब बोला -मैंने अब तक तुमसे पैसे इसीलिए नहीं मांगे थे कि तुम अपने पास पैसे जोड़कर रखती थीं लेकिन मुझे क्या मालूम था ?तुम सब बर्बाद कर दोगी।
इतनी बड़ी रकम भी तो नहीं है, उसके डाँटने पर शिल्पा बोली।
जब इतनी बड़ी रकम नहीं है, तो करो ! इंतजाम सहेली से उधार मांगे हैं या उसे उधार दिए थे।
यह सुनकर शिल्पा एकदम से चुप हो गयी और मन ही मन सोचने लगी ,प्रवीण को कैसे पता चला ?
तब बोली -आप ,ऐसा कैसे कह सकते हैं ?
क्या मुझे तनिक भी समझ नहीं ? तुम मुझे क्या समझती हो ?इतना बड़ा कारोबार संभाल रहा हूँ ,क्या मुझे इतनी भी समझ नहीं ?
पहेलियाँ मत बुझाओ ! आपको क्या लग रहा है ?मैंने क्या किया है ?आपको पैसे चाहिए मैंने उनका प्रबंध कर दिया है और क्या चाहिए ?
बस ,बात पैसों तक ही सीमित है,क्या कुछ और नहीं है ?
प्रवीण के इतना कहते ही ,वो घबरा गयी। वो समझ ही नहीं पा रही थी कि आख़िर प्रवीण कहना क्या चाहता है ?
तुम नौकरी करती हो,पैसे कमाती हो ,फिर भी पैसे इधर -उधर से मांगने पड़ रहे हैं। इसका अर्थ समझती हो या तो तुम्हारे मन में उस धन का कोई महत्व नहीं ,जो तुमने इतने परिश्रम से कमाया या फिर तुम्हारी ज़िंदगी में कोई उससे भी ज़्यादा क़ीमती है।
प्रवीण के शब्द सुनकर ,शिल्पा का चेहरा सफेद पड़ गया और मन ही मन सोचने लगी -कहीं ,ऐसा तो नहीं प्रवीण को मेरे और चतुर के रिश्ते की भनक लग गयी हो। भगवान का स्मरण करने लगी।हे प्रभु ! इस बार इस संकट से बचा लो !आगे से ऐसी कोई भी गलती नहीं होगी। बात इतनी ही नहीं थी ,उसे प्रवीण की बातें भी समझ नहीं आ रही थीं। तब उसने सोचा ,कहीं तन्वी ने तो कुछ नहीं बता दिया।
मुझे यही लग रहा है ,तुम झूठ पर झूठ बोले जा रही हो ,अपने परिवार को छोड़कर दूसरों की परवाह करने लगी हो।
आखिर मैंने क्या किया है ?कुछ पता तो चले।
ये तो तुम अच्छे से जानती हो ,घर -परिवार ,पति -पत्नी का रिश्ता ये सब विश्वास पर टिकते हैं।
