जब 'रक्षक मंडल 'का नेता मोहिनी के लिए कहता है -'उसे हमारे हवाले कर दो !'तब भानु उनके मध्य आ जाता है। वो नाराज होते हुए ,भानु से कहता है -तुम जानते नहीं ,किसकी रक्षा कर रहे हो ?
मुझे इतना पता है..कि जो लोग किसी को बिना उसकी गलती बताए पकड़ना चाहते हैं, उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता ,भानु ने जबाब दिया।
नेता की आँखों में हल्की कठोरता आई "तुम अपने पिता की तरह बोल रहे हो।"
भानु ने तुरंत पूछा -मेरे पिता को आप कितने समय से जानते हैं?"
नेता ने उत्तर नहीं दिया।
रत्न प्रताप ने इस बार तलवार नीचे कर दी ,उन्होंने सबकी ओर देखते हुए कहा—"अब यह बात यहीं खत्म होगी "कोई मोहिनी को हाथ नहीं लगाएगा।"
नेता मुस्कुराया -आप अभी भी आदेश दे रहे हैं?"
"नहीं , रत्न प्रताप ने अपनी आवाज़ में नम्रता लाते हुए कहा -''मैं इस बार चेतावनी दे रहा हूँ।"
साया धीरे-धीरे पीछे हट गया ,उसने डायरी का एक पन्ना फाड़ लिया।
मोहिनी चौंक गई -"तुम क्या कर रहे हो?"
साया ने पन्ना मोड़ा ,"जिस चीज़ को सब पढ़ना चाहते हैं ..उसे किसी एक के पास नहीं रहना चाहिए।"उसने पन्ना मोहिनी की ओर बढ़ाया -"इसे रखो !"
मोहिनी ने हिचकिचाते हुए पन्ना लिया ,उस पर सिर्फ़ एक नाम लिखा था—"मृणाल ! "नीचे तारीख थी ,पच्चीस वर्ष पुरानी और उसके ठीक नीचे...एक दूसरी पंक्ति आधी जली हुई थी।मोहिनी ने उसे पढ़ने का प्रयास किया।सिर्फ़ तीन शब्द स्पष्ट थे—"उसकी माँ को..."बाकी हिस्सा आग में जल चुका था। मोहिनी ने ऊपर देखा और साया से पूछा -"मृणाल कौन है?"
साया ने उत्तर देने के बजाय ,पीछे की दीवार की ओर देखा ,फिर कहा—"यही वह नाम है...जिसे तुम्हारे घर में पिछले पच्चीस वर्षों से कोई ज़ोर से नहीं बोलता।"
विक्रम के चेहरे का रंग उड़ गया।
रत्न प्रताप ने आँखें बंद कर लीं और रक्षक मंडल का नेता...पहली बार घबरा गया।
भानु ने तुरंत यह सब महसूस लिया ,उसने अपने पिता की ओर देखा और उनसे पूछा -क्या आप, 'मृणाल' को जानते हैं।"विक्रम ने कुछ नहीं कहा ,"पापा !जबाब दीजिये ! भानु की आवाज़ इस बार काँप रही थी ,"कौन है ? मृणाल !"
विक्रम ने आखिरकार सिर उठाया ,उनकी आँखों में वर्षों पुराना दर्द था "मृणाल..."उन्होंने धीमे स्वर में कहा -..तुम्हारी माँ की छोटी बहन थी।"
मोहिनी का दिल जैसे, धड़कना भूल गया ,तुम्हारी माँ....
लेकिन विक्रम किसकी माँ की बात कर रहे थे? भानु की या...मोहिनी की?
कमरे में मौजूद किसी ने भी कुछ नहीं कहा,साया ने बस मोहिनी की ओर देखा ,उसकी आँखों में एक ऐसा रहस्य था...जिसे वह अभी खोलना नहीं चाहता था।
अचानक...मोहिनी की मुट्ठी में पकड़ा हुआ, कागज़ गर्म होने लगा "आह!" वो उसकी तपन से तड़प उठी ,उसने उसे गिरा दिया। कागज़ फर्श पर पड़ा था ,उस पर लिखे अक्षर धीरे-धीरे बदलने लगे।
"मृणाल"के नीचे एक नई पंक्ति उभर आई—"पहला नाम वापस आ चुका है और फिर...सिर्फ़ मोहिनी को सुनाई देने वाली एक फुसफुसाहट उसके कान के पास आई—अब दूसरा नाम तुम्हें खुद ढूँढ़ना होगा...मोहिनी ने तुरंत पलटकर देखा ,उसके पीछे कोई नहीं था ,लेकिन फर्श पर...चाँदी की धूल से एक रास्ता बना हुआ था। वह रास्ता सीधे...हवेली के उस हिस्से की ओर जा रहा था जहाँ उसकी शादी की पहली रात से ही उसे जाने की मनाही थी।भानु ने भी, उस चमकती रेखा को देख लिया। उसने मोहिनी की ओर हाथ बढ़ाया और विश्वास से बोला -"चलो !"
मोहिनी ने उसका हाथ थाम लिया ,लेकिन इस बार...वह उसके साथ डरकर नहीं...सच जानने के लिए चल रही थी और पीछे खड़ा साया उन्हें जाते हुए देख रहा था। उसने डायरी बंद की और बहुत धीमे स्वर में कहा—अब तो,असली खेल शुरू हुआ है।
हवेली के उस हिस्से की ओर जाती चाँदी की चमकती रेखा धीरे-धीरे मंद पड़ रही थी।मोहिनी और भानु उसके पीछे-पीछे चल रहे थे।और उनके पीछे रत्न प्रताप, विक्रम और बाकी लोग भी थे, लेकिन कुछ कदम दूर जाकर रत्न प्रताप ने हाथ उठाकर सबको रोक दिया और आदेश दिया - इससे आगे सिर्फ़ मोहिनी और भानु ही जाएँगे।"
भानु ने तुरंत पलटकर देखा और पूछा -"क्यों?"
रत्न प्रताप की निगाह उस चाँदी की रेखा पर थी ,क्योंकि यह रास्ता तुम्हारे द्वारा खुद चुना गया है।"
"और अगर यह जाल हुआ? तब भी..."
रत्न प्रताप ने गंभीर स्वर में कहा -"शायद वही जाल हमें उस सच तक ले जाएगा, जिसे हम पच्चीस साल से छिपाते आए हैं।"
विक्रम ने उनकी ओर देखा,और बोले -रत्न प्रताप !ये क्या कह रहे हो ?
"अब रोकने की कोशिश मत करो !रत्न प्रताप ने धीरे से कहा -"बहुत कुछ पहले ही बहुत देर से छिपाया जा चुका है। अब इन्हें सच के क़रीब पहुंचना ही होगा।
विक्रम ने कुछ नहीं कहा।मोहिनी ने यह बातचीत सुनी, लेकिन इस बार उसने कोई सवाल नहीं किया।उसे महसूस हो रहा था कि वह जिस दरवाज़े की ओर वह बढ़ रही है...उसके पीछे सिर्फ़ हवेली का कोई पुराना कमरा नहीं था। वहाँ उसके अतीत का कोई हिस्सा बंद था। वो गलियारा बाकी हवेली से बिल्कुल अलग था।यहाँ दीवारों पर कोई तस्वीर नहीं थी ,न ही कोई सजावट ! न कोई दीपक !बस दोनों तरफ़ लंबे पत्थर के स्तंभ और उनके बीच जालीदार खिड़कियाँ।हवा में बंद पड़े कमरे की सी सीलन थी।
मोहिनी ने धीरे से पूछा - क्या यह हिस्सा हमेशा से ही इतना सुनसान रहता है?"
भानु ने उत्तर दिया -बचपन से मैंने भी इसे बंद ही देखा है।"
"क्या तुम ,कभी अंदर नहीं गए?"
"नहीं।"
वह कुछ क्षण के लिए रुका और स्मरण करते हुए बताता है -"हाँ ,हमें बताया गया था ,'कि यहाँ पुरानी हवेली का हिस्सा है और इसकी संरचना कमजोर है।"
मोहिनी ने उसकी ओर देखा और तुम्हें कभी शक भी नहीं हुआ ?"
भानु हल्का-सा मुस्कुराया और बोला - इस घर में जितनी चीज़ों पर शक करना चाहिए था ,उनमें से आधी को हमने परंपरा समझकर स्वीकार कर लिया।"
उसकी बात सुनकर मोहिनी के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई ,लेकिन अगले ही पल वह मुस्कान गायब हो गई।गलियारे के अंत में...एक विशाल लकड़ी का दरवाज़ा दिखाई दे रहा था। उस पर मोटी लोहे की जंजीरें लगी थीं और उसके बीच...वही चिन्ह था -'दो साँप और उनके बीच एक चाबी।
मोहिनी की जेब में रखी चाबी अचानक गर्म हो गई ,वह वहीं रुक गई।
भानु ने पूछा,"क्या हुआ?"
मोहिनी ने चाबी बाहर निकाली और बोली - यही है ,उस दरवाज़े की चाबी "
भानु ने उस दरवाज़े को देखा और अविश्वास से पूछा - तुम्हें यकीन है?"
"पता नहीं "
मोहिनी ने चाबी, ताले के पास ले जाकर देखी ,ताला बिना छुए ही हल्का-सा काँप उठा -टक !
यह देखकर आश्चर्य से भानु की आँखें फैल गईं और आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता से बोला - मोहिनी ,देखो !चाबी, अपने-आप घूम गई ,क्लिक !
दरवाज़े पर चढ़ी जंजीरें ढीली होकर अपने आप ज़मीन पर गिर पड़ीं। दोनों कुछ क्षण तक बिल्कुल स्थिर खड़े रहे ,उन्हें जैसे अपनी आखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। फिर दरवाज़ा...अपने-आप खुलने लगा - घर्ररर...
कमरे के भीतर घना अंधेरा था ,लेकिन वह अंधेरा सामान्य नहीं था ,जैसे कई वर्षों से वहाँ सूर्य की रोशनी पहुँची ही न हो। तब भानु ने, अपनी जेब से मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई ,उसकी रोशनी दीवारों पर घूमी। एक पुरानी लकड़ी की अलमारी दिखलाई दी। कुछ बंद संदूक और एक टूटी हुई ,कुर्सी !और सामने...एक बड़ा-सा आईना ! आईने पर सफेद कपड़ा पड़ा था।
मोहिनी ने कमरे में कदम रखा, तभी उसके पैर के नीचे कुछ आया ,यह देखने के लिए वह झुकी ,वो एक पुरानी पायल थी। उसने ,उस पायल को उठा लिया।
