kiski dulhan [part 41]

एक कक्ष, जिसे रत्न प्रताप राजवीर ने ,पच्चीस बरस पहले बंद कर दिया था। आज उसी कक्ष में से एक आवाज आई ,जो मोहिनी को पुकार रही थी। रत्न प्रताप ने उसे अंदर जाने से मना किया किन्तु भानु ने कहा-मैं भी इसके साथ जाऊंगा। उस अँधेरे में वो दोनों अंदर जाते हैं। उनके पीछे रत्न प्रताप भी था, उन्होंने जैसे ही अंदर कदम रखा ,उन्होंने एक महिला को वहां बैठे देखा। उसे देखकर अचानक रत्न प्रताप के मुख से निकला- मृणाल ! 

मृणाल ने मोहिनी को देखकर  कहा -बेटी !तुमने आने में बहुत देर कर दी। 


उस कक्ष में समय जैसे ठहर सा गया था ,दीपक की लौ स्थिर थी ,मृणाल सामने बैठी थी।मोहिनी तो किसी मृणाल को नहीं जानती थी। रत्न प्रताप के कहने पर उसे मृणाल ही समझ लिया क्योंकि उन्होंने ही ये नाम पुकारा था। मोहिनी की आँखें, उस महिला के चेहरे से हट ही नहीं रही थीं।उसके चेहरे पर उम्र की रेखाएँ थीं, लेकिन उसकी आँखें...वे आँखें मोहिनी को परिचित सी लग रही थीं।

उस महिला ने धीरे से मुस्कुराकर फिर से कहा—"बहुत देर कर दी, बेटी !"

मोहिनी के होंठ काँपे,और पूछा -"आप...उसकी आवाज़ गले में अटक गई ,क्या आप मेरी माँ हैं ?

उस महिला ने तुरंत उत्तर नहीं दिया ,उसने सिर्फ़ मोहिनी को देखा ,फिर उसकी नज़र भानु पर गई।भानु कुछ कदम पीछे खड़ा था।उसकी आँखों में अविश्वास, क्रोध और वेदना एक साथ थे। न चाहते हुए भी वो पूछ बैठा - अगर आप मृणाल हैं ,उसने धीमे लेकिन कठोर स्वर में कहा, तो इतने सालों  से कहाँ थीं?"

महिला की मुस्कान गायब हो गई ,उसने भानु की ओर देखा ,और बोली -तुम्हें बहुत कुछ जानना है।"

भानु आगे बढ़ा -"हाँ।"

तो बैठो !इत्मीनान से बातें करते हैं। 

"मैं यहाँ बैठने नहीं आया ,उसकी आवाज़ में वर्षों का दबा हुआ गुस्सा था।मैं अपनी माँ से जवाब लेने आया हूँ ,उसके इतना कहते ही कमरे में सन्नाटा छा गया।रत्न प्रताप ने अपनी नजरें झुका लीं।

साया दरवाज़े के पास खड़ा सब देख रहा था।

मृणाल ने बहुत धीमे स्वर में कहा—"मैं ही तुम्हारी माँ हूँ, 'यह सुनकर भानु की आँखों में आँसू आ गए।लेकिन अगले ही क्षण महिला ने वाक्य पूरा किया—लेकिन जिस तरह तुम सोचते हो, उस तरह नहीं।"

भानु का चेहरा कठोर हो गया और पूछा -"मतलब?"

मृणाल ने मोहिनी की ओर देखा और उसकी तरफ देखते हुए बोली ="पहले उसे सच जानना होगा।"

मोहिनी धीरे-धीरे आगे बढ़ी ,मुझे क्या सच जानना है?"

मृणाल ने सामने रखी कुर्सी की ओर इशारा किया -"बैठो !"

मोहिनी नहीं बैठी और बोली -मैं खड़ी रहूँगी।"

मृणाल समझ रही थी ,कि इन लोगों को अभी मुझ पर विश्वास नहीं है, तब हल्की मुस्कान के साथ बोली -"ठीक है,जैसी तुम्हारी इच्छा !

कुछ क्षण पश्चात वो बोली —तुम्हें बचपन से बताया गया था -'कि तुम्हारी माँ मर चुकी है।"मोहिनी ने हाँ में सिर हिलाया। तुमने जो भी सुना ,वह सब झूठ था।"यह सुनकर मोहिनी की आँखों में आँसू आ गए। 

तो आप...कुछ भी न समझते हुए बोली। 

मैं ज़िंदा थी ,मोहिनी ने तुरंत पूछा—फिर आपने मुझे क्यों छोड़ा?"

मृणाल की आँखों में पहली बार दर्द दिखाई दिया। "मैंने तुम्हें छोड़ा नहीं था।"

"फिर?"

"मुझे तुम्हें छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था ,मैं विवश थी। 

ऐसी कैसी विवशता थी ,किसने आपको विवश किया?"मृणाल ने उत्तर देने से पहले रत्न प्रताप की ओर देखा।रत्न प्रताप अपनी आँखें बंद किये खड़ा था। मोहिनी ने समझा ,कि वो रत्न प्रताप राजवीर ही है। 

मोहिनी की बातों को समझते हुए ,तभी मृणाल ने सिर हिलाया "नहीं।"

मोहिनी चौंकी"तो किसने?"

मृणाल ने कहा—तुम्हारे अपने पिता ने।"

कमरे में एकदम से सन्नाटा छा गया ,मोहिनी का चेहरा सफेद पड़ गया ,उसके मुख से निकला "मेरे पिता !"उसकी आवाज़ टूट गई।

मृणाल ने सिर झुका लिया ,"हाँ वही "

भानु ने तुरंत पूछा—इसके पिता कौन थे ?"

मृणाल ने उसकी ओर देखा और बोली -"यह सवाल अभी मत पूछो !"

भानु ने गुस्से से कहा—"फिर वही रहस्य! वही आधी -अधूरी बात !अधूरा सच !

साया ने बीच में कहा—मृणाल, अब आधा सच और खतरनाक हो सकता है।"

मृणाल ने उसकी ओर देखा और बोली -"मुझे पता है,मैं क्या कर रही हूँ ?"

फिर उसने मोहिनी की ओर देखा और उसे समझाते हुए बोली -यदि  पूरा सच एक साथ जानोगी तो...वह कहते -कहते रुक गई।

"तो क्या ?मोहिनी ने अधीरता से पूछा। 

"तुम खुद तय नहीं कर पाओगी कि किस पर विश्वास करना है ,किस पर नहीं....?

मोहिनी  ने दृढ़ता से कहा —मैं अब दूसरों के बताए हुए ,सच पर विश्वास नहीं करूँगी।"

रत्न प्रताप अचानक बोले—"मोहिनी !.."

मोहिनी ने उनकी ओर देखा और पूछा - आपने ,मुझसे और क्या -क्या छिपाया है ?"

रत्न प्रताप ने कुछ क्षण उसकी आँखों में देखा और बोले -"बहुत कुछ।"

"क्यों?"

क्योंकि मैं ,तुम्हें बचाना था।"

मोहिनी की आँखों में गुस्सा भर गया ,आपने मुझे बचाने के नाम पर मेरी पूरी ज़िंदगी ही झूठ बना दी?"रत्न प्रताप चुप रहे। मुझे यह तक नहीं बताया ,'कि मेरी माँ ज़िंदा है!"

रत्न प्रताप ने धीमे स्वर में कहा—अगर तुम्हें पता चल जाता तो तुम उसे खोजने निकल पड़तीं।"

"तो क्या, मुझे अपनी माँ को ढूँढना नहीं चाहिए था ?"

 रत्न प्रताप ने सिर हिलाया,"नहीं,उनकी आवाज़ में ऐसा डर था कि मोहिनी  कुछ क्षणों के लिए चुप हो गई  और पूछा -"क्यों?"

रत्न प्रताप ने मृणाल की ओर देखा ,क्योंकि जिस आदमी से हम उसे बचा रहे थे...उन्होंने वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

साया ने पूरा किया—वह अभी भी ज़िंदा है।"

मोहिनी के शरीर में सिहरन दौड़ गई -"कौन?सभी एक दूसरे का मुँह देख रहे थे ,किन्तु कोई उत्तर नहीं मिला 

अचानक कमरे का दीपक बुझ गया ,सम्पूर्ण कमरा अंधकारमय हो गया। 

मोहिनी ने तुरंत भानु का हाथ पकड़ लिया और आवाज दी -"भानु !"

मोहिनी ,मैं यहीं हूँ ,तुम्हारे साथ ,तुम्हारे पास। दूर कहीं धातु गिरने की आवाज़ आई ,खनन्! फिर किसी के दौड़ने की आवाज़ ,साया ने तुरंत मशाल जलाई।कमरे में मृणाल अपनी जगह पर नहीं थी।वह गायब हो चुकी थी। यह देखकर मोहिनी स्तब्ध रह गई सभी के चेहरों पर एक ही प्रश्न था ,वो कहाँ गई?"

भानु ने कमरे के चारों ओर देखा और कहा - यहाँ कोई दूसरा रास्ता होगा।"

रत्न प्रताप तुरंत पीछे की दीवार की ओर गए ,उन्होंने एक पत्थर दबाया।तुरंत वो दीवार खुल गई और एक संकरी सुरंग नजर आई ।

मोहिनी ने पूछा—अचानक वो कहाँ गई?"

रत्न प्रताप ने कहा—जहाँ वह हमेशा जाती है।"

"कहाँ?"

रत्न प्रताप ने उत्तर दिया—उस जगह..जहाँ से उसे कोई वापस नहीं ला सकता।"

मोहिनी ने बिना सोचे, सुरंग में आगे कदम बढ़ाया भानु उसके पीछे ही था।साया भी साथ चल पड़ा।

रत्न प्रताप ने उन्हें रोकना चाहा -"रुको!"लेकिन तब तक वे तीनों आगे बढ़ चुके थे।

सुरंग के भीतर कुछ दूर जाने पर उन्हें एक लोहे का दरवाज़ा मिला।दरवाज़े पर एक निशान था—दो साँप !

मोहिनी ने उस चिह्न को देखते ही पहचान लिया और बोली -ये ही निशान मुझे पहले भी मिला था।"

साया ने कहा—"हाँ ,जानता हूँ। 

यदि आप इसके विषय में जानते हैं ,तब इसका क्या मतलब है?"

साया ने कुछ क्षण चुप रहकर कहा—"ये देवगढ़ परिवार की पुरानी निशानी है।"

भानु ने उसकी ओर देखा,"दो साँप ? एक रक्षा का प्रतीक और दूसरा ?साया ने कोई उत्तर नहीं दिया।

मोहिनी ने उस दरवाज़े को धक्का दिया ,दरवाज़ा खुल गया।अंदर...एक छोटा कमरा था उस कमरे की दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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