Kiski dulhan [part 38]

 मोहिनी ने दरवाज़े की ओर देखा ,उसकी आँखों में भय नहीं था।अब वहाँ सिर्फ़ एक सवाल था ,बाहर से आवाज़ फिर आई—"मोहिनी, दरवाज़ा खोलो! मैं हूँ—रत्न प्रताप !"

भानु ने फुसफुसाकर कहा—"लेकिन रत्न प्रताप तो ऊपर थे।"दोनों एक-दूसरे को देखने लगे और तभी...उनके सामने रखे तीनों लिफाफों में से रत्न प्रताप के नाम वाला लिफाफा अपने-आप खुल गया।अंदर से एक पुरानी तस्वीर बाहर फिसली।तस्वीर में...रत्न प्रताप एक छोटी बच्ची को गोद में लिए खड़े थे लेकिन बच्ची के चेहरे पर एक काला निशान बना हुआ था और तस्वीर के पीछे लिखा था—"जिसे तुम बचा रहे थे, वह अकेली नहीं थी।"


मोहिनी ने तस्वीर को देखा ,उसके कानों में फिर से उसी महिला की आवाज़ गूँजी—"बेटी... पीछे मत देखना और दरवाज़े के बाहर खड़ा व्यक्ति...अब धीरे-धीरे दरवाज़े की कुंडी घुमा रहा था ,क्लिक !क्लिक।

दरवाज़े की कुंडी धीरे-धीरे घूमी।मोहिनी और भानु दोनों दरवाज़े की ओर देखते रह गए।अंदर रखी मशाल की लौ अचानक लंबी हुई और फिर काँपने लगी।भानु ने तलवार पूरी तरह म्यान से बाहर निकाल ली और मोहिनी से बोला -"पीछे हटो।"

मोहिनी ने तस्वीर अपने हाथ में कसकर पकड़ ली।बाहर से फिर आवाज़ आई—मोहिनी ! दरवाज़ा खोलो ! मैं हूँ—रत्न प्रताप ।"

भानु की आँखें सिकुड़ गईं,वो सोचने लगा - क्या यह रत्न प्रताप की आवाज़ है ?

मोहिनी  ने धीरे से कहा—"लेकिन वो तो  ऊपर थे।"

"यही बात मुझे भी परेशान कर रही है।"

दरवाज़े की कुंडी फिर हिली ,क्लिक !इस बार दरवाज़ा कुछ इंच खुल गया।भानु तुरंत आगे बढ़ा और उसे रोक दिया सख़्त लहज़े में बोला -"कौन हो?"

बाहर सन्नाटा छा गया फिर...भानु "आवाज़ बिल्कुल रत्न प्रताप जैसी ही थी।"दरवाज़ा खोलो !"

भानु ने उत्तर दिया—"अगर आप सच में रत्न प्रताप हैं, तो बताइए..."वह कुछ क्षण रुका ,मैंने बचपन में पहली बार तलवार किससे सीखी थी?"बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

भानु की आँखों में कठोरता आ गई और ढ्र्ढ्ता से बोला -आप 'रत्न प्रताप 'नहीं हैं।"

अचानक दरवाज़े के दूसरी तरफ़ से हल्की हँसी सुनाई दी ,फिर आवाज़ बदल गई।अब वह रत्न प्रताप  की नहीं थी। समझ तो गए ,किन्तु बहुत देर से समझे।"

उस आवाज को सुनकर मोहिनी का चेहरा सफेद पड़ गया।

भानु ने तलवार दरवाज़े की ओर तान दी और तेज स्वर में पूछा -"कौन हो? बताओ !

उधर से कोई उत्तर नहीं आया ,किन्तु अगले ही पल...कदमों की आवाज़ दूर जाने लगी।ठक... ठक... ठक...और फिर सन्नाटा छा गया। 

भानु ने कुछ क्षण इंतज़ार किया,जब उसे इत्मीनान हो गया ,तब बोला -शायद ,वह चला गया।"

मोहिनी ने तस्वीर की ओर देखा,देखते ही उसके मुख से निकला -"नहीं।"

"अब क्या हुआ ?"

"वो हमें डराना नहीं चाहता था।"

भानु ने उसकी ओर देखा,"तो?"

मोहिनी ने तस्वीर उठाई ,"वह चाहता था कि हम यह तस्वीर देखें।"तस्वीर में युवा रुद्र एक छोटी बच्ची को गोद में लिए हुए थे।पीछे हवेली का वही पुराना हिस्सा दिखाई दे रहा था ,लेकिन तस्वीर में एक और व्यक्ति था।बहुत धुँधला ,एक पुरुष,जो दरवाज़े के पास खड़ा था।

मोहिनी ने तस्वीर को मशाल के करीब किया "इसे देखो।"

भानु उसके  पास आया और पूछा -ये कौन है?"

"पता नहीं ,चेहरा साफ़ नहीं है।मोहिनी ने तस्वीर को थोड़ा मोड़ा।तभी पीछे से एक हल्की चमक दिखलाई दी।तस्वीर के कोने पर किसी ने बहुत छोटे अक्षरों में लिखा था—"जिसे तुम देख नहीं पा रहे, वही सब देख रहा था।"

भानु  ने कहा -यह किसी ने जानबूझकर लिखा है।"

मोहिनी ने सिर हिलाया और बोली -शायद यह तस्वीर भी जानबूझकर यहाँ छोड़ी गई थी।वह तस्वीर पलटने लगी ,लेकिन उसके पीछे कुछ और था।तस्वीर की पिछली परत थोड़ी उभरी हुई थी।

भानु ने अपनी तलवार की नोक से उसे सावधानी से उठाया।अंदर से एक और छोटा कागज़ निकला।उस पर सिर्फ़ एक वाक्य था—"रत्न प्रताप ने बच्ची को बचाया था, लेकिन उसे वहाँ से ले जाने वाला कोई और था।"मोहिनी की साँस अटक गई ,"तो वह आदमी..."

भानु ने कहा—"जिसका नाम हमें अभी नहीं पता।"

मोहिनी ने धीरे से कहा—और शायद वही आदमी मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा रहस्य है।"

उसी समय...ऊपर हवेली में रत्न प्रताप बेचैनी से गलियारे में आगे-पीछे चल रहे थे।

विक्रम ने पूछा—तुमने उन्हें नीचे क्यों जाने दिया?"

रत्न प्रताप ने कोई उत्तर नहीं दिया।

"रत्न प्रताप !इस बार विक्रम की आवाज़ में गुस्सा था ,अगर उन्हें वहाँ वह तस्वीर मिल गई तो क्या होगा ?"

रत्न प्रताप कुछ क्षण रुके और बोले - उसे तस्वीर मिल चुकी है।"

विक्रम का चेहरा बदल गया ,"तुम्हें कैसे पता?"

रत्न प्रताप ने अपनी गर्दन के पीछे हाथ रखा ,वही पुराना निशान फिर गर्म हो रहा था "क्योंकि वह जाग गई है।"

विक्रम ने धीमे स्वर में कहा -"मृणाल?"

रत्न प्रताप ने सिर उठाया और उनकी भूल को याद दिलाया -"उसका नाम मत लो !"

"क्यों?"

"क्योंकि यह हवेली नाम सुनती है।

साया, जो कुछ दूरी पर खड़ा था, हल्का-सा मुस्कुराया और बोला -"हवेली नहीं..."

रत्न प्रताप  ने उसकी ओर देखा।

साया ने कहा—कोई और सुनता है।"

विक्रम ने बेचैनी से पूछा—तुम कहना क्या चाहते हो?"

साया ने डायरी खोली - ये देखो !"एक नया पन्ना खुला था ,उस पर स्याही धीरे-धीरे उभर रही थी।पहले एक शब्द बना—मोहिनी !"फिर उसके नीचे—"भानु"और उसके नीचे...एक तीसरा नाम लिखना शुरू हुआ।लेकिन जैसे ही आख़िरी अक्षर बनने वाला था ,स्याही फैल गई ,नाम अधूरा रह गया।

विक्रम ने पूछा—ये किसका नाम है?"

साया ने डायरी बंद कर दी -"अभी नहीं।"

रत्न प्रताप ने कठोर स्वर में कहा—"तुम जानबूझकर हमें आधा सच बता रहे हो।"

"क्योंकि पूरा सच..."साया ने उनकी आँखों में देखते हुए कहा,जिसके पास है, वह अभी हमारे बीच नहीं है।"

उधर नीचे...मोहिनी और भानु कमरे में मौजूद तीनों लिफाफों को देख रहे थे।रत्न प्रताप  का लिफाफा खुल चुका था।अभी विक्रम वाला बंद था और मोहिनी वाला...उसके हाथ में था।

भानु ने पूछा—क्या तुम बाकी दोनों लिफाफे खोलना चाहती हो?"

मोहिनी ने नहीं में सिर हिलाया।

''क्यों?"

"क्योंकि जिस व्यक्ति ने ये रखे हैं...उसने उन्हें क्रम से रखा है।"पहले मेरा ,फिर रत्न प्रताप का ,फिर शायद..."

भानु ने तीसरे लिफाफे की ओर देखा ,उस पर "विक्रम"लिखा था ,बोला -पापा !

मोहिनी  ने कहा—"हाँ"लेकिन सवाल यह है कि हमें किस क्रम में सच बताया जा रहा है।"

भानु कुछ क्षण सोचता रहा ,फिर बोला—अगर हम विक्रम का लिफाफा खोलें तो शायद..."

"नहीं " मोहिनी ने रोक दिया ,"अभी नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि बाहर जो भी था...उसकी आवाज़ धीमी हो गई।वह चाहता था, कि हम डरकर जल्दबाज़ी करें।"

भानु ने उसकी ओर देखा।

"तुम बदल गई हो।"

मोहिनी, हल्की मुस्कान के साथ बोली -"इस हवेली ने बहुत जल्दी बहुत कुछ सिखा दिया।"

तभी...कमरे की दीवार पर वही चाँदी की रोशनी उभरी।इस बार वह सीधे एक पुराने चित्र की ओर जा रही थी।चित्र में एक परिवार का दृश्य बना था।मोहिनी ने मशाल ऊपर की।चित्र के नीचे एक नाम लिखा था—"देवगढ़ परिवार — वर्ष 2001"

विराज ने कहा—"यह तो..."

मोहिनी ने चित्र में चेहरों को ध्यान से देखा ,रत्न प्रताप ,विक्रम ,एक महिला और...एक छोटा बच्चा !

भानु ने भी तस्वीर को देखा ,"यह मैं हूँ।"

मोहिनी ने पूछा—"क्या तुम्हें यकीन है?"

"हाँ"उसने अपनी उँगली बच्चे के चेहरे पर रखी,"यह तस्वीर मेरे बचपन की है।"

मोहिनी ने बाकी लोगों को देखा,महिला के चेहरे पर धूल की परत थी।उसने हाथ से चित्र साफ़ किया।चेहरा स्पष्ट होते ही...भानु पीछे हट गया और बोला -"यह..."

मोहिनी ने पूछा—"क्या हुआ?"

भानु कुछ बोल नहीं पाया।

मोहिनी  ने भी महिला के चेहरे को ध्यान से देखा ,उसे लगा जैसे उसका दिल अचानक रुक गया हो।

क्योंकि वह चेहरा...उसे बहुत क़रीब से कहीं देखा हुआ लग रहा था।शायद बहुत पहले....उसने चित्र को छुआ और उसी क्षण...उसके सिर में तेज़ दर्द उठा। दृश्य बदल गया ,वह महिला ,एक कमरे में है ,उसकी गोद में एक छोटी बच्ची है और सामने एक छोटा लड़का खड़ा है ।

वह महिला दोनों बच्चों के सिर पर हाथ रखकर कह रही थी—"एक दिन तुम दोनों को एक-दूसरे की रक्षा करनी होगी।"दृश्य बदल गया -आग ! चीखें ! भागते हुए लोग !फिर वही महिला...एक बच्ची को किसी के हाथ में देते हुए।"इसे ले जाओ !


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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