Kiski dulhan [part 35]

भानु और मोहिनी ,उस कमरे से होते हुए, सुरंग से आगे बढ़ गए और दूसरा दरवाज़ा खोलने के लिए आगे बढ़ गए। दूसरी तरफ ऊपर...रत्न प्रताप उसी कमरे के बाहर खड़े थे। उनके साथ विक्रम और वो रहस्यमयी महिला थीं।

रत्न प्रताप ने धीरे से पूछा—तुमने रिकॉर्डिंग क्यों चलने दी? 

महिला ने उनकी ओर देखा और बोली -मैंने नहीं चलाई।

रत्न प्रताप चुप हो गए ,विक्रम ने बेचैनी से पूछा—तो फिर किसने चलाई ?"


महिला ने बंद कमरे की ओर देखा और बोली -जिसने पच्चीस साल पहले मोहिनी को यहाँ छिपाया था।"

विक्रम का चेहरा गंभीर हो गया,"क्या वह..."

"नहीं ,महिला ने तुरंत रोक दिया ,अभी कोई नाम मत लो !

रत्न प्रताप  ने पूछा—क्यों ?

महिला ने बहुत धीमे स्वर में कहा—क्योंकि अगर वह सुन रही है..तो हमें पता नहीं, कि वह किसके पक्ष में है।"अचानक दूर से कदमों की आवाज़ आई।

रत्न प्रताप ने तलवार निकाल ली और फुसफुसाते हुए बोला - शायद ,कोई आ रहा है।

विक्रम ने मशाल ऊँची की ,गलियारे के अंधेरे में एक आकृति दिखलाई दी।काले कपड़े...धीमे कदम...और हाथ में वही चमड़े की डायरी ,वही साया उनके सामने आकर रुक गया।

रत्न प्रताप  ने पूछा —"तुम यहाँ कैसे पहुँचे ?"

साया मुस्कुराया और बोला - तुम लोगों ने जिस रास्ते को बंद समझा ,वही मेरा रास्ता था।"उसकी नज़र कमरे के बंद दरवाज़े पर गई। क्या वे दोनों अंदर हैं ?

रत्न प्रताप ने कुछ नहीं कहा ,साया ने डायरी खोली।एक पन्ने पर उँगली रखी और बोला -तो इसका अर्थ है,आखिर दूसरा दरवाज़ा भी खुल गया।"

विक्रम चौंक गए ,तुम्हें कैसे पता?"

साया ने उनकी ओर देखा,"क्योंकि..."वह कुछ क्षण रुका ,मैंने वह दरवाज़ा पहली बार खोला था।"

रत्न प्रताप का चेहरा कठोर हो गया ,पूछा -पच्चीस साल पहले।"

साया ने सिर हिलाया और कहा -"हाँ"फिर उसने डायरी बंद की,लेकिन इस बार..."उसकी आँखों में एक रहस्यमयी चमक आई, दरवाज़ा मैंने नहीं खोला।"

नीचे सुरंग में...मोहिनी  और भानु धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे।अचानक मोहिनी  रुक गई ,सामने पत्थर की दीवार पर एक पुरानी तस्वीर उकेरी हुई थी।उसमें एक परिवार खड़ा था किन्तु चेहरे स्पष्ट नहीं थे ,लेकिन सबसे किनारे...एक छोटी बच्ची बनी थी।उसके गले में वही छोटा-सा लॉकेट था, जो मोहिनी की पायल से जुड़ा था। मोहिनी ने तस्वीर को छुआ और उसी क्षण...दीवार के भीतर से किसी बच्चे की धीमी हँसी सुनाई दी ,फिर...एक फुसफुसाहट—तुम बहुत देर से आई हो, मोहिनी !

मोहिनी ने मशाल उठाई -"कौन है? कोई उत्तर नहीं ,सिर्फ़ दीवार के दूसरी तरफ़ से...तीन बार दस्तक।ठक....ठक...ठक...मोहिनी ने धीरे से कहा—क्या कोई संकेत दे रहा है ?

भानु ने दीवार को ध्यान से देखा ,और बोला -"शायद "

मोहिनी ने उसकी ओर देखा,और बोली -तब हमें पता लगाना होगा कि..."इससे पहले कि वह वाक्य पूरा करती, उससे पहले ही ,दीवार पर एक पतली रेखा चमकी और पत्थर पर धीरे-धीरे एक नाम उभर आया—"मृणाल"उसके नीचे...सिर्फ़ एक तिथि "अगली पूर्णिमा ! मोहिनी  और भानु एक-दूसरे को देखते रह गए।उन्हें अभी यह नहीं पता था कि उस तिथि का अर्थ क्या है ? लेकिन इतना स्पष्ट था—मृणाल का रहस्य अभी खत्म नहीं हुआ था ,बल्कि...अब पहली बार उसने स्वयं उन्हें ,अपनी ओर बुलाना शुरू कर दिया था।

दीवार पर उभरा हुआ नाम कुछ क्षणों तक हल्की रोशनी में चमकता रहा—"मृणाल"

और उसके नीचे अंकित तिथि —"अगली पूर्णिमा।"मोहिनी की आँखें उसी पर टिकी थीं। उसे लग रहा था जैसे दीवार पर लिखे ये दो शब्द उसे किसी ऐसी जगह बुला रहे हों, जहाँ जाने का निर्णय उसके हाथ में नहीं था।

भानु ने मशाल ऊपर उठाई और उस नाम को देखकर बोला -"यह अभी-अभी लिखा गया है।"

मोहिनी  ने धीरे से कहा -हाँ "

"क्या यहाँ कोई है?"

मोहिनी ने सिर हिलाया ,"मुझे नहीं पता ,दोनों कुछ क्षण चुप रहे। सुरंग इतनी शांत थी कि उन्हें अपनी साँसों की आवाज़ तक सुनाई दे रही थी।फिर..दीवार के दूसरी तरफ़ से वही आवाज़ आई—ठक... ठक... ठक...तीन बार। मोहिनी ने तुरंत दीवार पर हाथ रख दिया और प्रश्न किया "तुम कौन हो?"

उधर से कोई उत्तर नहीं आया ,भानु ने, उसे पीछे खींचना चाहा। मोहिनी ! पीछे हटो।"लेकिन तभी दीवार के भीतर से बहुत धीमी आवाज़ आई—"भानु ..."अपना नाम सुनकर जैसे भानु वहीं स्थिर हो गया।  

उसने मोहिनी की ओर देखा और बोला - उसने मेरा नाम लिया।"

मोहिनी  ने धीरे से कहा -"मैंने सुना ,फिर आवाज़ आई—"उसे लेकर मत आना..."

भानु की भौंहें सिकुड़ गईं ,उसे कुछ समझ नहीं आया ,तब उसने पूछा -"किसे?"

कुछ क्षण सन्नाटा रहा,फिर—"जिसे तुम अपना समझते हो..."आवाज़ अचानक गायब हो गई।

भानु ने दीवार पर हाथ मारा -"आख़िर तुम कौन हो?"

उधर से कोई जवाब नहीं आया ,उसने फिर ज़ोर से कहा—"सामने आओ!"

मोहिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।"भानु !"नहीं ,उसकी आवाज़ में पहली बार बेचैनी थी ,तब बोली -यह कोई खेल खेल रहा है।"मोहिनी  ने शांत स्वर में कहा—

"शायद !"लेकिन उसने मेरा नाम लिया और उसने मुझे चेतावनी दी।भानु उसकी ओर मुड़ा और पूछा -"तुम्हें ,किस बात की?"

मोहिनी ने कुछ नहीं कहा ,क्योंकि उसके मन में एक ही सवाल घूम रहा था "जिसे तुम अपना समझते हो..."क्या वह भानु  के बारे में था या...मोहिनी  के बारे में?

 सुरंग में आगे बढ़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।दोनों आगे चल पड़े ,कुछ दूर जाने के बाद सुरंग दो हिस्सों में बँट गई।बाईं तरफ़ जाने वाली सुरंग पर एक छोटा-सा चिह्न बना था—साँप ! दाईं तरफ़ वाली सुरंग पर...चाँद।

भानु ने दोनों रास्तों को देखा और मोहिनी से पूछा -"अब?"

मोहिनी कुछ सोचती रही,फिर उसकी नज़र अपनी जेब में रखी उस छोटी पीतल की चाबी पर गई, जो उन्हें कमरे में मिली थी।उसने चाबी बाहर निकाली। जैसे ही उसने उसे हाथ में लिया...चाबी की नोक पर हल्की रोशनी चमकी और रोशनी सीधे दाईं ओर बने चाँद के निशान पर पड़ी।

भानु ने कहा—"चाँद वाला रास्ता।"

मोहिनी  ने समर्थन में सिर हिलाया ,दोनों उसी तरफ़ बढ़ गए ,लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि पीछे...अंधेरे में कोई उन्हें देख रहा था। एक परछाईं ,जो तब तक स्थिर रही...जब तक वे मोड़ के पीछे गायब नहीं हो गए।

उधर हवेली के ऊपर...रुद्र, विक्रम और साया उसी पुराने कमरे में खड़े थे।साया के हाथ में वही डायरी थी।विक्रम बेचैनी से पूछ रहे थे—"तुमने कहा था' कि दूसरा दरवाज़ा तुम्हें पता है।"

"हाँ ,पता है।"

"तो वे किस रास्ते से गए हैं ?"

साया ने डायरी बंद कर दी ,"जहाँ उन्हें जाना था,वो पहुंच जायेंगे। 

रुद्र ने कठोर स्वर में कहा—"पहेलियाँ बंद करो।"

साया उनकी ओर मुड़ा और पूछा -"तुम्हें सच चाहिए?"

"हाँ।"

"तो सुनो..."साया एक कदम आगे आया, मोहिनी जिस रास्ते पर गई है..वह रास्ता हवेली से बाहर नहीं जाता। 

विक्रम ने घबराकर पूछा—"तो?"

साया ने धीमे स्वर में कहा—"वह रास्ता उस जगह जाता है ,जहाँ मृणाल आख़िरी बार देखी गई थी ,कमरे में सन्नाटा छा गया।

विक्रम ने दीवार का सहारा लिया,"नहीं 'ऐसा नहीं हो सकता। 

रत्न प्रताप  ने साया को घूरा "क्या तुम्हें यकीन है?"

"इतना ही..साया ने कहा -जितना तुम्हें पच्चीस साल पहले पता था कि वह मर चुकी है।"

रत्न प्रताप की आँखों में गुस्सा चमक उठा ,क्रोध से उन्होंने साया की कॉलर पकड़ ली और चिल्लाते हुए बोले -"मैंने उसे मरते हुए नहीं देखा था।"

"बस! साया ने उनका हाथ हटाया ,यही तो समस्या है।"

रत्न प्रताप  कुछ नहीं बोले।

साया ने बहुत धीमे कहा—"तुमने उसे मरते नहीं देखा,"तुमने उसकी लाश नहीं देखी ,फिर भी तुमने सबको बता दिया..."कि मृणाल खत्म हो चुकी है।"



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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