नंदिनी, छत पर कपड़े सुखाने जाती है .आज उसका मन प्रसन्न था और दीपक से, जब से उसकी बातें हुई है , उसके मन का बोझ जैसे हल्का हो गया है। वह अपने को बहुत ही हल्का महसूस कर रही है। छत पर जाती है ,इधर-उधर देखती है, तब अपनी छत पर उसे दीपक दिखलाई देता है। वह हाथ हिलाकर उसे जतलाना चाहती है, कि मैं भी छत पर ही हूं। दीपक उसे देखकर मुस्कुराता है। नंदिनी ने पूछा -क्या आज मेड नहीं आई ?
किंतु उसकी आवाज दीपक की छत तक नहीं पहुंच पाई ,दीपक ने इशारे से कहा -कि उसे कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा है। इशारे से बताता है ,कि मैं नीचे जाता हूं और तब तुम मुझसे कुछ भी पूछ सकती हो ,क्योंकि चार-पांच घर के बाद उसके घर की छत थी। कुछ देर तक उनके इशारों में बात होती हैं, नंदिनी को यह बातें बड़ी अजीब और बचकाना लग रही थीं , किन्तु अच्छा लग रहा था। छत पर कपड़े सुखाकर वो नीचे आई और नानी से बोली - नानी !आज मैं बहुत खुश हूँ ,बताओ !आज खाने में क्या बनाऊं ?
हम तो पहले भी चाहते थे ,कि तुम सभी परेशानियों को छोड़कर खुश रहो !
नानी ,वो परेशानी नहीं ,वो मेरा बेटा है ,जिसके पिता की हत्या उसी के भाई ने की है वो अभी उसी घर में है।
वो तो मैं भी जानती हूँ किन्तु समाज के नजरिये से देखा जाये तो, तुम्हारा वो रिश्ता जायज़ नहीं था। उसके साथ तुम्हारा विवाह नहीं हुआ था। अब तुम उसकी विधवा भी नहीं कहला सकतीं और तुम्हारा बच्चा जहाँ है सुरक्षित है। अपने परिवार में है ,वहां कोई उससे सवाल -ज़बाब नहीं करेगा। तुम्हारे साथ रहेगा ,तो आर्थिक समस्याएं ही नहीं ,बल्कि तुम्हारे रिश्ते पर भी उँगलियाँ उठेंगी। तभी उन्होंने सोचा ,ये कहीं फिर से विचलित न हो जाये तब बोलीं -अब तो सब सही हो रहा है। ईश्वर ने चाहा ,तो तुम अपने बेटे की अच्छे से परवरिश कर सकोगी, उसके लिए तुम्हें पहले सक्षम होना होगा।
दीपक अच्छा लड़का है ,तुम्हारी उसने पहले भी बहुत सहायता की है ,अभी भी करने के लिए तैयार है। वैसे तुम आज हमें क्या विशेष बनाकर खिलाने वाली हो ?
अब रसोईघर में जाकर देखने पर ही पता चलेगा ,रसोई में क्या है ? क्या नहीं ? अच्छा नानी आपने कभी इस दीपक से पूछा ,'ये कहाँ से आया है ?इसका परिवार कहाँ है ?
नहीं ,कभी जानने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। तुम ही कभी पूछ लेना।
मुझे भी क्यों पूछना है ,नंदिनी लापरवाही से बोली।
नहीं ,जिस व्यक्ति के तुम सम्पर्क में हो ,उसकी जानकारी होनी आवश्यक है ,आजकल पता नहीं चलता किस इंसान के मन में क्या चल रहा है ? कम से कम हमें इतनी जानकारी तो होनी चाहिए ,जिस पर हम विश्वास कर रहे हैं ,वो इंसान केेसा हैं ? ये हमारी सुरक्षा के लिए भी सही है या नहीं ,ऐसा नानी ने जानबूझकर कहा।
एक सप्ताह के पश्चात,दीपक उस स्थान से निकल रहा था ,जहाँ नंदिनी अपनी पढ़ाई करने जाती थी। छुट्टी हो चुकी थी किन्तु नंदिनी अब तक बाहर नहीं आई थी। दीपक ने सोचा ,यदि नंदिनी की प्रतिदिन इसी समय छुट्टी होती है। तब तो अच्छा रहेगा। मैं ही उसे ले जाया करूंगा। अभी वो वहां खड़ा यही सोच रहा था। तभी उसे नंदिनी आती दिखलाई दी। उसने हाथ हिलाकर नंदिनी को अपनी उपस्थिति जतलाई। नंदिनी मुस्कुराते हुए उसके करीब आई और पूछा -आज यहां कैसे ?
यहां से गुजर रहा था ,सोचा , कई दिन हो गए ,तुमसे मिलता चलूँ और पूछ भी लूंगा -'कुछ समझ आ रहा है या नहीं।'
मिलकर कहाँ जाना है ? मैं भी तो वहीं रहती हूँ ,दोनों ही साथ चलते हैं। क्या तुम भूल गए ?हम पड़ोसी हैं।
हाँ ,मैं भी ,वही सोच रहा था।
तुम भी न जाने क्या -क्या सोचते रहते हो ? इसमें सोचना क्या था ?बल्कि मैं तो कहूंगी ,'ये सब तुमने देर से सोचा। ''जल्दी सोचना चाहिए था ,कहते हुए हंसने लगी।
दीपक उसे देख रहा रहा था ,अब नंदिनी के चेहरे पर कितनी चमक थी ?इसी तरह खुश रहा करो !मुस्कुराते हुए तुम बहुत अच्छी लगती हो। नंदिनी ने एक नजर दीपक की तरफ देखा और नजरें नीची कर लीं। क्या तुम्हें, मेरे साथ प्रतिदिन आना अच्छा लगेगा ?
क्यों ऐसा क्यों पूछ रहे हो ? मैं तो तुम्हें लेने प्रतिदिन आ सकता हूं किंतु तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा।
इसमें बुराई क्या है ? यदि हम लोग, साथ में जा रहे हैं, तो मुझे तो नहीं लगता कि इसमें कुछ बुराई है। मैंने जिंदगी में इतना कुछ देख लिया है ,मुझे अब लोगों के परवाह नहीं। इसको जो समझना है ,समझे !जब हम सही हैं ,तो किसी से क्या ड़रना ?
तुम्हारी बात अपनी जगह सही है ,दीपक महसूस कर रहा था ,नंदिनी अब उसे 'आप' नहीं तुम कहती है। वह उससे बहुत कुछ पूछना चाहता था किंतु इसी ड़र के कारण कुछ पूछ नहीं पाता था। पूछते हुए ,डर भी लगता था अभी नंदिनी की अपनी परेशानियां हैं। थोड़ा वक्त देना उचित समझा। जाने क्यों जब से नंदिनी उससे छत पर मिली थी, उसे अच्छा लगा किंतु उसने अपने को रोके रखा और उससे ज्यादा नहीं मिला।
वो नंदिनी के प्रति अपना खिंचाव महसूस कर रहा था। मन में कई बार उसके प्रति ख्याल आता, वह छुप-छुपकर उसे, जाते हुए देखता था किंतु उसके सामने नहीं गया। आज अचानक उसका मन किया और वह उसके सामने पहुंच गया।
तभी नंदिनी ने पूछा -बताओ ! इतने दिनों से कहां थे ? इस तरह से तो मुझे लेने पहले भी आ सकते थे।
हां आ तो सकता था, कह कर चुप हो गया
अच्छा यह बताओ क्या तुम्हारा कोई परिवार नहीं है ?
कुछ क्षण वो चुप रहा ,तब बोला - मेरा परिवार तो है। यह सुनकर नंदिनी चुप हो गई , तब दीपक बोला -मेरी मां है ,मेरे पिता है और दो बहने हैं, जिनकी शादी हो गई।
अच्छा-अच्छा कहते हुए ?जैसे उसने अपने आप को समझाया। उनका घर नजदीक आ गया था तब नंदिनी बोली -अब तुम ,मुझे अपनी मोटरसाइकिल से उतार सकते हो ! तुम्हारा धन्यवाद ! इस सफर को यादगार बनाने के लिए कहते हुए उसकी मोटरसाइकिल से उतरकर अपने घर की तरफ बढ़ चली।
दीपक सोच रहा था, एक बार भी इसने पलट कर नहीं देखा, अभी वह यह सोच ही रहा था तभी नंदिनी उसके क़रीब आकर बोली -आज शाम को क्या कर रहे हो ?
कुछ खास काम तो नहीं है , क्या बात थी ?
आज शाम का खाना ,हमारे घर खाने आ सकते हो। जहां दो खाते हैं, वहां तीन खा लेंगे।
देखता हूं, यह कहकर वह जाने ही वाला था ,तभी नंदिनी ने, फिर से आकर पूछा -बस एक बात बताओ ! तुम्हें खाने में क्या पसंद है ?
खाने में.... वह जैसे सोच में पड़ गया, तब बोला -कुछ विशेष नहीं, कुछ भी अच्छा खाने को मिल जाए वही बहुत है।
नंदिनी फिर से आगे बढ़ गई , वह भी आगे बढ़ रहा था, फिर उसे न जाने क्यों लगा ? कि नंदिनी फिर से आएगी ? और उसने पीछे मुड़कर देखा, लेकिन तब तक नंदिनी जा चुकी थी।
