Ghar ka rasta

मुरली जब अपने घर पहुंचा, तो उसके माता-पिता हैरत में पड़ गए। आखिर इसका, इस तरह यहाँ आना कैसे हुआ ? इसने तो कोई सूचना भी नहीं दी। उनके अंदर उसके प्रति नाराजगी थी, वो उससे मिलना तो चाहते थे, किन्तु अब उनका प्रेम ,नाराजगी में बदल गया था। 

उन्होंने मुरली को पढ़ाया-लिखाया और इस काबिल बनाया कि वह अपने 'पैरों पर खड़ा हो सके' और किसी अच्छी सी कंपनी में काम कर सके किंतु उन्होंने यह नहीं सोचा था -कि वे  उसे पढ़ा -लिखा कर अपने ही ''पांव पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं।''


 मुरली पढ़ने के लिए बाहर निकला ,बाहर की दुनिया देख उसकी आँखें चुंधिया गयीं। उसके सपने और महत्वाकाँक्षाएँ भी बढ़ गयीं।  जब तक उसे माता-पिता की जरूरत रही तो वह उनसे मिलने भी आता और फोन पर भी बात कर लेता था। 

जैसे ही, मुरली की नौकरी लगी, उसे समय कम मिलने लगा। माता -पिता उसकी परेशानी को समझ सकते थे। सोचते -बेटे का नया -नया काम है ,मेहनत तो करनी ही पड़ती है ,उसकी उन्नति देखकर प्रसन्न होते। उससे कहते - बेटा !ज्यादा दबाब तो हम भी नहीं बनाएंगे ,किन्तु तीज -त्यौहार की छुट्टियों पर तो मिलने आ जाया कर... किन्तु अब मुरली को घर जाना अच्छा नहीं लगता।

 वह कोई भी बहाना बनाकर दोस्तों के साथ घूमने चला जाता, खूब मौज -मस्ती करता किंतु अब माता-पिता के बुलाने पर भी नहीं आता। अपने इकलौते बेटे को, कितने अरमानों से पाल-पोसकर बड़ा किया था ? माँ तो उसकी चिंता में घुली जाती थी।  पता नहीं, उसने कुछ खाया होगा या नहीं ,कहीं उसकी तबियत तो नहीं बिगड़ गयी ?अनेक ख़्याल मन में आते , पता नहीं ,ये कम्पनी वाले भी न जाने ,उससे कितना काम लेते हैं ? 

तब ,मुरली के पिता कहते -वो पढ़ा -लिखा लड़का है ,नौकरी कर रहा है ,बच्चा नहीं है ,जो तुम उसके लिए इतना परेशान हो रही हो। 

मुरली के पिताजी ,मैं सोच रही हूँ ,क्यों न अब उसके लिए कोई अच्छी सी लड़की देखकर उसका विवाह कर देते हैं ,अपनी पत्नी के साथ रहेगा ,तो उसके खाने -पीने की चिंता न रहेगी ,लड़के के भटकने का ड़र भी न रहेगा। वो तो हमें याद ही नहीं करता कोई अच्छी सी बहु मिल गयी तो वही उसे याद दिलाकर ,हमसे मिलाने  ले आया करेगी। 

आजकल कोई लड़की सास -ससुर को नहीं चाहती ,पगली !तुम भी न किन बातों को सोचती रहती हो ?

उसका ब्याह तो करना है कि नहीं ,नाराज़ होते हुए उन्होंने पूछा। 

ठीक है ,कहकर उन्होंने उसके लिए लड़की देखनी आरंभ कर दी और एक दिन फोन पर मुरली से कहा - हमने तेरे लिए एक लड़की देख ली है। एक बार आकर लड़की को देख जाना ,उन्हें यह उम्मीद थी कि कम से कम यह विवाह के लिए तो आएगा ही। 

किंतु उनके अरमानों पर पानी फिर गया,जब मुरली ने उनसे कहा  -आप लोगों से ,लड़की देखने के लिए  किसने कहा ? 

एक बार आकर देखकर तो जा... बहुत ही सुंदर प्यारी लड़की है। 

नहीं, मैं नहीं आ पाउँगा ,इस रिश्ते के लिए आप लोग, उनसे मना कर दीजिये !क्योंकि  मैंने अपने साथ काम करने वाली लड़की के साथ विवाह कर लिया है। यह सुनकर माता-पिता कुछ समझ ही नहीं पाए ,क्या करें ? उधर लड़की वाला पूछ रहा था ,'आपका बेटा कब आ रहा है ?

ये सब देख सुनकर ,उन्हें बहुत दुःख हुआ ,क्या इसके जीवन में हमारा कोई महत्व नहीं है ? इसने हमें यह बताना भी उचित नहीं समझा। किसी लड़की से विवाह कर लिया और उसे, हमसे मिलाने भी यहां लेकर नहीं आया। 

इसके जीवन में हमारा कोई महत्व है भी या नहीं । एक तरह से देखा जाए तो उन्हें ,अब पछतावा हो रहा था। उनके प्यार ने ,अब धीरे-धीरे गुस्से का रूप ले लिया था। अब उन्हें, उससे कोई उम्मीद नहीं रह गई थी। 

मुरली के पिता अपनी पत्नी से कहते - हमें इतनी उम्मीद नहीं थी, कि औलाद इतनी नीच पैदा होगी। हम समझ सकते हैं ,कि नौकरी में उसे समय नहीं मिला होगा ,किंतु क्या उसे बिल्कुल भी समय नहीं मिलता था ? विवाह करने का समय मिला ,दोस्तों के साथ घूमने का समय मिला ,किंतु माता-पिता से मिलने का समय नहीं मिला। हम बहुओं को बुराई दे देते हैं किन्तु कमी तो हमारी परवरिश में भी रही है ,जिस बच्चे के मन में अपने माता -पिता का सम्मान नहीं है ,उसकी बहु से ही हम क्या उम्मीद रख सकते हैं ?जिसने हमें देखा नहीं ,न ही हमसे मिली। उसके लिए तो हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं है। हो सकता है ,उसने यह भी कह दिया हो , वो अनाथ है ,कहते हुए ,उसके पिता की आँखें नम हो आईं। 

मुरली के पापा ,आप अपना दिल छोटा मत करो !वो अभी बालक समय के साथ अक़्ल आ जाएगी। 

अब बेकार की उम्मीदें लगाना छोड़ दो !

हफ्ते में एक बार तो उनकी इच्छा हो ही जाती थी ,कि अपने बेटे का हाल-चाल पूछ लें और वह भी कह देता था - आप लोगों का भी क्या रहना- सहना है यह मकान भी अब पुराना हो गया है ,इसे तुड़वाकर ठीक से बनवा लीजिए अब तो मेरा भी खर्चा नहीं है मैं अपना खर्चा स्वयं उठाता हूं। उसकी ऐसी बातें सुनकर उनका  दिल भर आता, किंतु पिता का क्रोध बढ़ जाता।

 यदि पढ़ -लिखकर बच्चे इस तरह से, अपनों से दूर हो जाते हैं। उससे तो बेहतर यही था कि हम इसे पढ़ाते ही नहीं, कम से कम हमारे नजदीक तो रहता। शिक्षा का अर्थ ,क्या अपनों से दूर होना ,या रिश्तों को नीचा दिखाना है। 

ऐसा नहीं है ,जी वो तो संसार की भूलभूलैया में खो गया है। 

उनके कितने अरमान थे ? बेटे का विवाह करेंगे ,उसकी बहू आएगी , सब मिलजुल कर रहेंगे किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ , शुरू में कुछ पैसे भेज देता था किंतु अब पैसे देने भी बंद कर दिए और आज अचानक चार साल बाद उसको ,अपने सामने देखकर , उसके पिता की त्योरियां चढ़ गई और उसकी सारी बातें उन्हें स्मरण हो आईं।

 इसने ,हमारे साथ कैसा व्यवहार किया है ? उसे देखकर व्यंग्य से बोले -साहब ! आज इस ''घर का रास्ता'' कैसे भूल गए ? जिस जगह तुम्हारा बचपन बीता। तुमने उस मातृभूमि को ही भुला दिया, उसे तो भुलाया ही ,अपनी जननी अपने पिता को भी भुला दिया। ऐसा तुमने शहर में क्या देख लिया ? जो अपने ''घर का रास्ता ''ही भूल गए। 

माँ तो चाहती थी, बड़े दिनों में मेरा बेटा आया है किंतु पिता के गुस्से के कारण कुछ कह न सकीं , तब उन्होंने बेटे से दबी आवाज में पूछा - क्या बहू को साथ नहीं लाया ?

वह नहीं आएगी, उसे ऐसी जगह में रहने की आदत नहीं है ,झुंझलाते हुए बोला।  

क्या बहू को एक बार भी हमसे नहीं मिलाएगा ?अभी वह यही कहने वाली थी ,तभी उसके पिता की आवाज गरज़ी -' तू भी इसी जगह पर पैदा हुआ है और यही पला -बढा है। उसने तुझे कैसे स्वीकार कर लिया ? जब कोई इंसान किसी को प्यार करता है तो उसकी अच्छाई -बुराई सभी उसे मिलती हैं। वैसे तू यह बता ! यहां किस लिए आया है ? अपने आने का उद्देश्य बता ! उसकी अब तक की हरकतों से वो समझ गए थे, यह अवश्य ही यहां किसी न किसी काम से ही आया होगा। 

तब मुरली बोला -मैं चाहता हूं आप लोग भी हमारे साथ, शहर में चलें वहीं पर रहें ,कब तक यहां पड़े रहेंगे ?

हमें क्यों जाना है ? हम तो यहीं पर वर्षों से रह रहे हैं , और हमें इस घर में रहने में कोई बेइज्जती महसूस नहीं होती, सम्मान से जी रहे हैं। तेरे साथ रहकर, जीने से बेहतर है ,हम यहीं पर रहें। 

आप लोग समझ क्यों नहीं रहे हैं ? मैं आपको ले जाने के लिए आया हूं , आपको मेरे साथ चलना होगा। अकेले यहां क्या करेंगे ?

यदि हम यहां से चले जाएंगे तो इस घर का क्या होगा ?माँ ने प्रश्न किया। 

होना क्या है ? इसे बेच देंगे ,आप लोगों के चले जाने के पश्चात ,यहां तो कोई रहने वाला है नहीं, तो इस घर का करना भी क्या है ?

 ठीक है ,हम सोचते हैं, यह कहकर उसके पिता घर से बाहर निकल गए , किंतु यह बात उन्हें हजम नहीं हो रही थीं , कि उनका बेटा इतनी सरलता से उन्हें लेने आ गया है। जिसे यहां रहने में, शर्म महसूस होती थी अपने माता-पिता को बताने में शर्म महसूस होती थी और उसने, हमसे बिना बताए ही विवाह भी कर लिया। अवश्य ही बात तो कुछ है ,जो वो हमें नहीं बता रहा। 

ऐसे ही विचारों में वह टहल रहे थे ,रास्ते में मनोहर लाल मिला, उसने पूछा -कैसे हैं ? वेदप्रकाश जी !सुना है  आज तो बेटा आया हुआ है। 

हां, आया हुआ तो है, हमें शहर ले जाना चाहता है। 

क्या बात कर रहे हैं ? मैं तो सोच रहा था , आप लोगों से मिलने आया होगा। सुना था, उसने शहर में ही विवाह भी कर लिया था ,क्या अपनी पत्नी को भी साथ लाया है ?

नहीं, कह रहा है ,वह यहां नहीं रह पाएगी, आजकल की पीढ़ी ऐसी ही होती जा रही है ,जहां पैदा होते हैं किसी काबिल बन जाने के पश्चात उन्हें अपमान महसूस होता है। वैसे मैंने सुना है -'' शहर में आपका बेटा  एक बड़ा फ्लैट ले रहा है , और इसकी बीवी भी नौकरी करती है, बच्चों की देखरेख के लिए कोई तो चाहिए। 

यह आप ऐसी बातें कर रहे हैं, आप मेरे बेटे के विषय में जानते ही क्या है ?

वेद प्रकाश जी ! मैं आपके बेटे के विषय में इतना जानता हूं जितना आप भी नहीं जानते, क्योंकि मेरा बेटा भी उसी शहर में रहकर पढ़ रहा है और नौकरी भी कर रहा है। वह मुझसे हर सप्ताह बातचीत करता है। कभी मैंने आपको बताया नहीं ,उसने मुझे बताया -'आपके बेटे को ,बड़े मकान के लिए, पैसों की आवश्यकता होगी ? और घर में नौकर भी चाहिए जो उसके घर की देखभाल कर सकें और उसके बच्चों को पाल -पोस सकें। जब आप यहाँ से जायेंगे ,तभी तो वो ये घर बेच पायेगा। मेरे बेटे ने मुझे बहुत कुछ बताया है किंतु मैंने कभी आपको इसलिए नहीं बताया कि यह सब सुनकर आपको दुःख होगा। 

तभी मैं सोचूं , आज वह अपने 'घर का रास्ता 'कैसे भूल गया ? चार साल के बाद अचानक कैसे आ गया ?  जब एक बार उसकी मां बीमार हुई थी ,उसने एक बार भी नहीं पूछा -मां ! कैसी हो ? या उसे इलाज के लिए शहर में ले जाऊं और आज अचानक शहर में लेने आ गया। 

तब वेद प्रकाश जी ने निर्णय लिया , हम में से कोई भी उसके साथ नहीं जाएगा , जिस रास्ते से आया है उसी से वापस लौट जाए ,उसके लिए यही बेहतर होगा। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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