वो अजनबी, काले कपड़ों वाला नक़ाबपोश और मोहिनी ''गोल कक्ष ''में उस मानचित्र को देख रहे थे ,उधर भानु ने भी आगे का रास्ता ख़ोज निकाला था ,तब अचानक उस कक्ष के बाहर एक आवाज गूँजी -"मोहिनी !... मैं तुम्हें लेने आया हूँ..."किन्तु इससे पहले की मोहिनी बाहर जाती ,उस नक़ाबपोश ने उसे रोक दिया और बोला - ये कोई छल भी हो सकता है।
गोल कक्ष के बाहर फिर से वही आवाज़ एक बार और गूँजी।सुनने से लग रहा था ,ये आवाज़ भानु की ही है किन्तु उसका लहजा बदला हुआ, लग रहा था।
मोहिनी का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा ,उसे आवाज भानु की ही लग रही थी किन्तु नक़ाबपोश के कहने पर ,उसको पहचानने की जद्दोजहद में फंसी थी। उसने सहज रूप से आगे कदम बढ़ाया, किन्तु काले वस्त्रों वाले अजनबी ने ,उसकी कलाई कसकर पकड़ ली और बोला -"रुको !"
मुझे लगता है ,ये भानु ही आवाज है।"
"अगर ये सचमुच भानु होता...तो सबसे पहले तुम्हारा नाम इस तरह नहीं पुकारता।"
मोहिनी ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा और पूछा -क्या तुम भानु को जानते हो?"
उस अजनबी ने कोई उत्तर नहीं दिया किन्तु उसकी नज़र दरवाज़े पर ही टिकी रही।कुछ क्षणों तक सन्नाटा छाया रहा। बाहर से फिर वही आवाज़ आई—मोहिनी !.. बाहर आओ ! अब सब ठीक है ,किन्त्तु अजनबी ने मोहिनी का हाथ नहीं छोड़ा ,बल्कि उससे धीमे स्वर में कहा -"अब ध्यान से सुनो !"
कुछ भी न समझते हुए मोहिनी ने पूछा -"क्या?"
"वही आवाज़ ! सुनने से भानु जैसी आवाज लग रही है ,लेकिन साँसों की लय अलग है ,शब्दों के बोलने में अंतर है ,ध्यान से सुनो !
मोहिनी ने आँखें बंद करके ध्यान लगाया ,उस आवाज पर ध्यान दिया तो वो चौंक गई ,और बोली - सचमुच...तुम सही थे। हर शब्द के बीच एक अजीब-सी सीटी जैसी आवाज़ आ रही थी ,जैसे बोलने वाला व्यक्ति अपनी असली आवाज़ छिपाने की कोशिश कर रहा हो।
उधर...असली भानु तीसरी सुरंग के दूसरे छोर पर पहुँच चुका था, उसके साथ रत्न प्रताप और विक्रम भी थे।
तब भानु ने ज़ोर से पुकारा—मोहिनी !"उसकी आवाज़ सुरंग में गूँजकर लौट आई ,लेकिन इस बार...उसे कहीं से भी कोई उत्तर नहीं मिला।
रत्न प्रताप ने मशाल ऊँची की ,दीवार पर ताज़ा खरोंचें दिखलाई दे रही थीं। ऐसा लग रहा था ,जैसे कोई अभी-अभी यहाँ से गुज़रा है।"विक्रम ने नीचे झुककर धूल को देखा।तीन अलग-अलग पैरों के निशान थे -मोहिनी ...काले वस्त्रों वाला अजनबी...और...एक तीसरा ,ये कौन हो सकता है ?जिसके पैरों के निशान असामान्य रूप से गहरे थे।जैसे वह सामान्य इंसान से कहीं अधिक भारी हो।विक्रम का चेहरा सख्त हो गया और उसने कहा - वह भी यहाँ आ चुका है।"
भानु ने पूछा -"कौन?"
विक्रम ने तुरंत उत्तर नहीं दिया ,रत्न प्रताप ने उनकी ओर देखा ,दोनों की आँखें मिलीं ,दोनों के दिल -दिमाग में एक ही नाम चल रहा था लेकिन कोई भी उसे ज़ुबान पर नहीं लाना चाहता था।
गोल कक्ष में..पीतल का दीपक अचानक काँपने लगा। उसकी लौ दाईं ओर झुक गई।अजनबी ने तुरंत दीपक के सामने अपना हाथ रखा।कुछ पल तक वो लौ को ध्यान से देखता रहा और फिर बोला -वे बहुत क़रीब आ चुके हैं।"
कौन ?"रक्षक मंडल "मोहिनी ने पूछा।
"नहीं,उसने धीमे से सिर हिलाया।
वे लोग इस रास्ते से नहीं आ सकते उसने पूरे विश्वास से कहा।
"फिर कौन?"
अजनबी ने उत्तर देने के बजाय दीवार पर बने नक्शे की ओर इशारा किया।सफेद बिंदु अब गोल कक्ष के बिल्कुल बाहर पहुँच चुका था ,लेकिन...अभी तक कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
उसी समय...पूरा कमरा बर्फ़ जैसा ठंडा हो गया। दीपक की नीली लौ अचानक बुझ गई।चारों ओर ऐसा अँधेरा छा गया कि अपना हाथ भी दिखाई नहीं दे रहा था। फिर...ठक...जैसे किसी ने लकड़ी की छड़ी ज़मीन पर टिकाई हो। एक कदम...ठक...दूसरा कदम...आवाज़ धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रही थी।उस अँधेरे में भी महसूस हो रहा था कोई उसकी तरफ बढ़ रहा है ,मोहिनी की साँसें डर के कारण जैसे थम गईं।
अजनबी ने फुसफुसाकर उसे चेतावनी दी -चाहे जो भी हो जाये ,उसकी आँखों में मत देखना।"
"क्यों?"
"क्योंकि...वह तुम्हें वही दिखाएगा ,जिससे तुम सबसे ज़्यादा डरती हो।"
उधर...भानु ने भी वही आवाज़ सुनी। ठक... ठक... ठक...वह चौंककर बोला -"यह किसकी आवाज़ हो सकती है?"
रत्न प्रताप का चेहरा पहली बार पीला पड़ गया ,उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा -"यह...लकड़ी की छड़ी नहीं है।"
"तो?"
"किसी पुरानी तलवार की म्यान...जो पत्थर से टकरा रही है।"
विक्रम ने तुरंत मशाल बुझा दी।
भानु हैरान रह गया ,तब उसने विक्रम से पूछा -आपने ऐसा क्यों किया?"
विक्रम ने फुसफुसाकर कहा - अँधेरे में शायद वह हमें न देख पाए..लेकिन रोशनी में ,हम उसके लिए आसान निशाना बन जाएँगे।"
गोल कक्ष के बाहर...अचानक अँधेरे में दो हल्की सुनहरी आँखें चमकीं ,फिर एक लंबा साया दरवाज़े पर आकर रुक गया ,चेहरा अब भी दिखाई नहीं दे रहा था।बस उसकी भारी साँसें सुनाई दे रही थीं।कुछ क्षण तक वह बिना हिले खड़ा रहा।फिर उसने धीमी, मगर स्पष्ट आवाज़ में कहा—"पच्चीस साल...मैंने इसी दिन का इंतज़ार किया है।"
मोहिनी का ह्रदय धड़क उठा,जैसे बाहर ही आ जायेगा यह आवाज़...पहले कभी नहीं सुनी थी।साया एक कदम आगे बढ़ा।अब उसकी उँगलियों में पहनी एक पुरानी चाँदी की मुहर दीपक की बची-खुची रोशनी में चमकी।अजनबी ने वह मुहर देखते ही, लगभग अपनी साँस रोक ली।
उसके होंठों से अनायास निकला -"असंभव..."
मोहिनी ने धीमे स्वर में तुरंत पूछा - क्या तुम, इसे पहचानते हो?"
अजनबी ने काँपती आवाज़ में कहा -हाँ "अगर यह वही मुहर है...तो इसका मतलब...वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया।साया धीरे-धीरे मुस्कुराया,"इतने वर्षों के बाद भी...तुम मुझे पहचान गए।"
मोहिनी ने गौर किया ,उस व्यक्ति की मुस्कान में न क्रूरता थी...न दया।बस एक अजीब-सी शांति और तभी...उसने अपना दायाँ हाथ आगे बढ़ाया।उसकी हथेली में वही पुरानी चमड़े की डायरी थी...जो' सभा कक्ष 'से चोरी हुई थी। उसने वो ,डायरी हवा में हल्की-सी उठाई और बोला—"जिसे तुम सब खोज रहे हो...वह इसमें नहीं है।"कमरे में सन्नाटा छा गया ,फिर उसने एक और वाक्य कहा—"असल रहस्य डायरी के लिखे हुए शब्दों में नहीं... बल्कि उन पन्नों में है जो वर्षों पहले फाड़ दिए गए थे।",
यह सुनते ही...रत्न प्रताप जो अभी-अभी गोल कक्ष के दूसरे प्रवेश-द्वार तक पहुँच चुके थे...अनायास बोल उठे—तो... तुम सचमुच ज़िंदा हो।
साया धीरे-धीरे उनकी ओर मुड़ा ,कुछ क्षण तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।फिर साये ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—"हाँ, रत्न प्रताप !..तुम्हारा अधूरा अतीत आज तुम्हारे सामने खड़ा है।"
