मोहिनी और वो काले कपड़ों वाला अजनबी, उस विशाल गोल कक्ष में थे, जो वहाँ फैला अँधेरा अब दीवारों पर चमकती नीली रोशनी से जीवित-सा लग रहा था।
हवेली के नीचे बनी सुरंगों का पूरा नक्शा दीवारों पर उभर चुका था।
दर्जनों रास्ते...सैकड़ों मोड़...कुछ बंद...कुछ खुले...और उन सबके बीच एक लाल बिंदु धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था।
मोहिनी की नज़र उसी लाल बिंदु पर टिक गयी, उसने पूछा - "ये... क्या है?"
काले वस्त्र पहने अजनबी ने बिना नज़र हटाए उत्तर दिया,- ये जीवित लोगों की चाल है, जैसे -जैसे वे लोग आगे बढ़ रहे हैं, ये बिंदु भी गति करते दिखलाई देंगे।
"इस नक्शे में जो भी लाल बिंदु दिखाई दे रहा है...वो इस समय हवेली के नीचे मौजूद है।"
मोहिनी ने, आश्चर्य से पूरा नक्शा देखा,उसे एक नहीं...
कई लाल बिंदु दिखाई दिए। अब वो समझ गयी ये लाल बिंदु ही कुछ रहस्यमई लोग हैं।
कुछ "सभा कक्ष" की ओर बढ़ रहे थे। कुछ उत्तरी सुरंगों में फैले हुए थे।
लेकिन एक बिंदु ऐसा था, जो बाकी सबसे तेज़ी से उनकी ओर ही बढ़ रहा था।मोहिनी ने पूछा -ये कौन हो सकता है?
अजनबी ने धीमे स्वर में कहा—"यही भानु है।"
मोहिनी की आँखों में राहत की चमक आई और मुस्कुराते हुए बोली -आख़िर "उसे पता चल ही गया कि मैं यहाँ हूँ?"
अजनबी ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया, और बोला -"नहीं, उसे सिर्फ़ तुम्हें ढूँढ़ना है...इसीलिए बेचैनी में इधर -उधर दौड़ रहा है, लेकिन वो नहीं जानता कि तुम कहाँ हो?
उसी समय नक्शे के दूसरे कोने में पाँच लाल बिंदु एक साथ चमकते दिखलाई दिये।
वे अलग-अलग सुरंगों से घूमकर उसी गोल कक्ष की ओर बढ़ रहे थे। अब उस अजनबी का चेहरा गंभीर हो गया और बोला - अब उन्होंने अपना रास्ता बदल दिया।"
"किसने?"मोहिनी ने संक्षिप्त प्रश्न किया।
"रक्षक मंडल" के लोगों ने...
"लेकिन उन लोगों को कैसे पता चला कि हम लोग यहाँ हैं,मोहिनी ने हैरानी से पूछा।
वो अजनबी कुछ क्षण चुप रहा,फिर बोला -"उन्हें इस जगह का पता नहीं है किन्तु मुझे लगता है..किसी ने उन्हें रास्ता बताया है।"
मोहिनी का घबराहट के कारण दिल धड़क उठा, कुछ भी न समझते हुए, बोली -"मतलब...
हवेली में कोई गद्दार है?"एकाएक अजनबी बोल उठा उसने तुरंत उत्तर नहीं दिया, जबाब देने से पहले शायद वो सोच रहा था। तब बोला - "गद्दार...हमेशा दुश्मन के घर में नहीं होता।"कभी -कभी अपनों में भी गद्दार मिल जाते हैं।
उधर...भानु तेज़ी से तीसरी सुरंग में दौड़ रहा था।
रत्न प्रताप ठीक उसके पीछे थे और विक्रम कुछ दूरी बनाए हुए चल रहे थे।अचानक रत्न प्रताप रुक गए।
उन्होंने मशाल दीवार के पास ले जाकर पत्थरों को ध्यान से देखा।
भानु,अधीर होकर बोला -अब "क्या हुआ,यहाँ क्यों रुक गए?
रत्न प्रताप ने ज़मीन की ओर इशारा किया और उन्होंने उसे दिखलाया,धूल पर दो अलग-अलग पदचिह्न दिखलाई दे रहे थे। एक हल्के...दूसरे भारी।
ये पदचिह्न मोहिनी के हैं।उन्होंने पहले निशान की ओर इशारा करते हुए कहा,और ये...".उस व्यक्ति के जिसने उसे यहाँ तक पहुँचाया।"
भानु ने, राहत की साँस ली और बोला -भगवान का शुक्र है, वह ज़िंदा है।"
रत्न प्रताप ने सिर हिलाया -"हाँ...लगता तो यही है ..लेकिन अभी सुरक्षित नहीं है ।"
अचानक विक्रम ने एक बात नोटिस की, धूल पर तीसरे निशान भी थे किन्तु बहुत हल्के..लगभग मिटे हुए थे, तब उन्होंने झुककर उन निशानों को ध्यान से देखा।
फिर उनका चेहरे का भाव बदल गया।
उन्होंने मन ही मन कहा -"नहीं...यह यहाँ कैसे हो सकता है?"
रत्न प्रताप ने पूछा -"क्या हुआ?"कैसे परेशान हो?
विक्रम ने तुरंत बात टाल दी,"कुछ नहीं,लेकिन उनके मन में उथल-पुथल मच चुकी थी। वे उन पदचिह्नों को पहचान चुके थे।वर्षों पहले...बिल्कुल ऐसे ही निशान उन्होंने आख़िरी बार देखे थे।
उधर...गोल कक्ष में अचानक पीतल के दीपक की लौ अपने-आप जल उठी।हालाँकि कुछ क्षण पहले अजनबी ने उसे बुझाया था।
मोहिनी चौंक गई,यह कैसे सम्भव हो सकता है ..?"
अजनबी ने तुरंत दीपक की ओर देखा,उसकी आवाज़ में घबराहट थी, तब बोला -लगता है,"किसी ने...मुख्य द्वार खोल दिया है।"
"कौन-सा मुख्य द्वार?मोहिनी ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा।
उसने उत्तर देने के बजाय,चबूतरे के पास जाकर फ़र्श पर हाथ रखा।फ़र्श पर बना गोल चिन्ह धीरे-धीरे चमकने लगा। कुछ ही सेकंड के पश्चात ...चबूतरे के पीछे की दीवार काँपने लगी -घर्ररर...
उस दीवार के पत्थर धीरे-धीरे खिसकने लगे।
मोहिनी ने सोचा,शायद कोई नया रास्ता खुल रहा है।
लेकिन...दीवार पूरी खुलने के बजाय बीच में ही रुक गई।अंदर सिर्फ़ एक संकरी दरार बन गयी ।उस दरार से तेज़ ठंडी हवा आई...और उसके साथ...अगरबत्ती जैसी हल्की सुगंध।
मोहिनी ने हैरानी से पूछा -इस तरफ़ क्या है?"
अजनबी ने बहुत धीमे स्वर में कहा—वह जगह..जहाँ कोई अपनी मर्ज़ी से नहीं जाता।"इतने में...उसी दरार के भीतर से एक धीमी आवाज़ सुनाई दी -"देर हो गई..."
आवाज़ किसी बूढ़े व्यक्ति की थी।
अजनबी तुरंत सतर्क हो गया,उसने मोहिनी को अपने पीछे कर लिया और उसे चेतावनी देते हुए बोला - मेरे पीछे ही रहना ।"
दरार के भीतर फिर वही आवाज़ आई—अगर लड़की सचमुच आ गई है,तो उसे अंदर ले आओ!
मोहिनी ने धीरे से पूछा -"ये किसकी आवाज़ है, ये कौन हैं?"
अजनबी ने बिना उनकी ओर देखे उत्तर दिया—जिस व्यक्ति को पूरा रक्षक मंडल..सिर्फ़ एक कहानी समझता है।"
उधर...भानु और रत्न प्रताप तीसरी सुरंग के अंतिम मोड़ पर पहुँच चुके थे।उन्हें सामने दूर हल्की नीली रोशनी दिखाई दी। भानु,तेज़ी से उसी दिशा में दौड़ा लेकिन तभी...रत्न प्रताप ने ज़ोर से उसका हाथ पकड़ लिया और बोला -"रुको!"
भानु, उनके इस तरह अचानक रोकने पर झुँझलाया।
"अब क्या हुआ ?"
रत्न प्रताप ने सामने की ज़मीन की ओर इशारा किया।पहली नज़र में रास्ता सामान्य लग रहा था,लेकिन जब मशाल की रोशनी पड़ी...तो पत्थरों के बीच बेहद पतले चाँदी के तार दिखलाई दिए।रत्न प्रताप की आवाज़ गंभीर हो गई वो बोला - यदि एक कदम और आगे बढ़ाया तो पूरी सुरंग ढह जाएगी।"
भानु का चेहरा सख्त हो गया, उसने पूछा - इसका मतलब...".किसी ने जानबूझकर यह जाल बिछाया है?"
रत्न प्रताप ने उत्तर दिया -"नहीं,..यह जाल आज का नहीं है।"यह उस व्यक्ति ने बनाया था..जो नहीं चाहता था कि तीसरी सुरंग तक कोई पहुँचे।"
उसी क्षण..."गोल कक्ष "की दीवारों पर बना पूरा नक्शा अचानक काँपने लगा।सभी लाल बिंदु एक साथ टिमटिमाने लगे और फिर...नक्शे पर एक सफेद रंग का नया बिंदु उभरा।
उस अजनबी का चेहरा पहली बार भय से पीला पड़ गया।उसने लगभग फुसफुसाते हुए कहा -"असंभव..यह कैसे हो सकता है?
मोहिनी ने उस अजनबी की तरफ देखकर पूछा -"क्या हुआ?"
उसने धीमे स्वर में उत्तर दिया—"लाल बिंदु जीवित लोगों के होते हैं..."...लेकिन सफेद बिंदु...वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया कि पूरे कक्ष में एक गहरी घंटी गूँज उठी— ढोंऽऽऽग...और उसी क्षण...सफेद बिंदु तेजी से उनकी ओर बढ़ने लगा।
आख़िर इस सफेद बिंदु का क्या रहस्य है? मोहिनी जिसके साथ है, वो अजनबी कौन है? शत्रु या मित्र!क्या भानु, मोहिनी तक पहुंच पायेगा? उस दरार के अंदर से किसकी आवाज़ आ रही थी? वो रहस्यमई महिला कौन थी? सभी सवालों के जबाब मिलेंगे, कहानी में बने रहिये - किसकी दुल्हन?
