दीपक क़ी बातें सुनकर,नंदिनी का मन थोड़ा शांत होता है। तब दीपक उसे जीवन में आगे बढ़ने क़ी सलाह देता है। तब नंदिनी उससे सुझाव मांगती है और उसका "धन्यवाद" भी करती है।
अब उसका मन एकदम शांत हो गया था, उसे लग रहा था। जैसे उसके दिलों दिमाग़ से कितना भारी बोझ उतर गया है, उसे हल्का महसूस हो रहा था।
ज़ब दीपक उसके "धन्यवाद" के लिए मना करता है, तब वो मुस्कुराते हुए कहती है - ये धन्यवाद मन के उस बोझ को हल्का करने के लिए है, जो अभी तुमने उतारा, सच कहूँ,तो मैं बहुत परेशान थी। मैं अपने बेटे के लिए चिंतित थी किन्तु अब लगता है, मुझे उन लोगों को समझने का एक अवसर देना चाहिए।
उन्हें ही नहीं, तुम्हें अपने आपको भी समझाना होगा और ध्यान से,धैर्य से आगे बढ़ना होगा।
ज़ी गुरूजी! आप जैसा कहेंगे, वैसा ही होगा।
तब कल मिलते हैं, मैं अपने दोस्त से सम्पूर्ण जानकारी लेकर मिलता हूं।
ठीक है, कहते हुए नंदिनी ने उससे विदा ली।
नंदिनी ने मुस्कुराते हुए घर में प्रवेश किया, उसका चेहरा देखकर नानी को कुछ समझ नहीं आया और नंदिनी से पूछा - क्या तुम ठीक हो ?
हाँ, नानी मैं बिल्कुल ठीक हूं, आप परेशान मत होइए!अब मैं जीवन में आगे बढूँगी।
नानी सोच रही थी, ये इतने दिनों से परेशान थी और आज अचानक इसे क्या हुआ? किन्तु पूछने का साहस न हुआ, कहीं कुछ ग़लत न समझ ले।
तब नंदिनी बोली -नानी! आज रात्रि में, भोजन मैं बनाउंगी।
ठीक है, कहकर वे चुप हो गयीं किन्तु उनके मन में हलचल मची थी।
शाम को नंदिनी ने भोजन बनाया, अपने घरवालों से बात की।
अगले दिन दस बजे के क़रीब किसी ने दरवाज़ा खटखटाया। नंदिनी तुरंत दौड़कर बाहर गयी, जैसे उसे पहले से ही मालूम हो कोई आएगा। बाहर से उसकी आवाज़ आ रही थी -अरे! तुम इतनी जल्दी! क्या आज दफ़्तर नहीं जाना था।
नानी कल से वैसे ही परेशान थी, इस लड़की का व्यवहार अचानक इतनी जल्दी कैसे बदल गया? बाहर न जाने किससे बातें कर रही है?कहीं ये पगला तो नहीं गयी।अभी वे ये सब सोचकर, अपने स्थान से उठकर बाहर जाने ही वाली थीं। तभी दीपक और नंदिनी ने अंदर प्रवेश किया।
अरे! दीपक तुम.... आज यहाँ कैसे? उन्होंने पूछा।
माँजी! कल मैं, इससे बगीचे में मिला था, ये बड़ी परेशान थीं, कुर्सी पर बैठते हुए बोला - तब मैंने इससे इसकी परेशानी का कारण जानना चाहा। पहले तो बता ही नहीं रही थी। बाद में बताया, अब इसकी समस्या का समाधान लेकर आया हूं।
कैसा समाधान?
इसको कुछ दिनों के लिए एक काम सीखना है और तब इसकी एक अच्छी नौकरी लग जाएगी, ज़ब ये "अपने पैरों पर ख़डी होगी "तब आगे इसे जो करना है कर लेगी। इसका आत्मनिर्भर बनना आवश्यक है, तभी अपने बेटे के लिए कुछ कर सकती है। बेचारे!अंकल भी कब तक करते रहेंगे?
दीपक की बातें सुनकर अब उन्हें नंदिनी के बदले व्यवहार का रहस्य नज़र आया वो तो कुछ और ही समझे बैठी थीं, अपनी ही सोच पर मुस्कुरा दीं और बोलीं - बेटा! ये तो तुमने बहुत अच्छा किया, जो इसे समझाया, हम तो इसे समझा - समझाकर थक गए थे, किसी की सुनती ही नहीं थीं।
तब वो मुस्कुराई और बोलीं - तुमने न जाने इसे, क्या समझाया? शुक्र है, इसे अक़्ल तो आई। मन ही मन सोच रहीं थीं, ये लड़का इतने दिनों से हमारे पड़ोस में रह रहा है किन्तु मैंने कभी इससे ये भी नहीं पूछा - तुम कहाँ से हो? तुम्हारे परिवार में कौन -कौन है? किन्तु इसने पहले भी इसने,हमारी बहुत सहायता की है और आज भी आकर खड़ा हो गया।
तब उन्होंने पूछा - दीपक! तुम्हारे घर में और कौन -कौन है?
वो कुछ बताता,उससे पहले ही, नंदिनी चाय लेकर आ गयी और बोली -लीजिए, गरमागरम चाय और नाश्ता!
अरे! इसकी क्या आवश्यकता थीं?
क्यों नहीं है? सुबह -सुबह तुम मेरे लिए, यहाँ आये हो तो क्या मेरा कुछ भी क़र्तव्य नहीं बनता है ? इसमें मैं कोई बड़ा काम तो नहीं कर रही, अपने एक मित्र को चाय ही तो पिला रही हूं।
दीपक ने नंदिनी की तरफ देखा, सोच रहा था, रिश्ते बिन आवाज़ ही कैसे बदलने लगते हैं? अब तक हमारी बातचीत में कितनी औपचारिकता थी किन्तु इन दो दिनों की मुलाक़ात में ही दोस्ती तक पहुंच गया।
नानी, नंदिनी को देख रहीं थीं, दीपक की बातों ने इस पर कैसा जादू किया है? जो कल तक रोये जा रही थी, अब कितनी चहक रही है? कहीं इसे,मेरी ही नज़र न लग जाए, यह सोचकर उन्होंने अपनी नज़र फेर ली।
उन्होंने दीपक से पूछा -अब इसे, क्या करना होगा? इसके क्या जादू का पिटारा लाये हो?
नानी! कोई जादू का पिटारा नहीं है, इसकी समस्या का समाधान है, वैसे तो इसे,मैं भी इसे सिखा सकता था किन्तु मेरे पास इतना समय नहीं है। देर -सबेर समझने में मुझसे जितना बन पड़ेगा इसकी सहायता कर दिया करूंगा। इसे वही बताने आया था, कहां जाना है और कबसे जाना शुरू करना है? कहते हुए दीपक ने कुछ कागज नंदिनी के हाथों में थमा दिये और बोला -इन्हें ठीक से पढ़ लेना, सोच -समझकर ये फॉर्म भरना और जमा कर देना।
ठीक है, कहकर नंदिनी अंदर जाने लगी, तब वो बोला -ऐसा करो! आज इसे भरकर शाम को मुझे ही दे देना, कोई कमी या गलती हुई तो मैं ठीक कर दूंगा, जो समझ न आये उसे छोड़ देना कहकर जाने लगा।
बैठो! बेटा! उसका आना नानी को भी अच्छा लग रहा था, वो देख और अनुभव कर रहीं थीं -"नंदिनी ने, कैसे अचानक उसे अपना मित्र बोल दिया और आज ही मैं दीपक की माँजी से नानी बन गयी सोचकर मुस्कुरा दीं।
नहीं, नानी!अब चलूँगा आज छुट्टी है, घर भी तो सम्भलना और कपड़े भी धोने हैं। सप्ताह भर कुछ नहीं कर पाता, अब सब निपटाना होगा।
ठीक है, तुम्हारा आना अच्छा लगा, आते रहा करो!ऐसा कैसे हो सकता है? एक माँ अपने बच्चे को भूल जाए? नंदिनी, ने आज से ज़िन्दगी को नए तरीके से देखना आरम्भ किया किन्तु बीच -बीच में अपने बच्चे की याद में एक हुक सी उठती, दिल बेचैन हो उठता, तारीख देखती, उसे देखे बगैर कितने दिन हो गए? न जाने वो कैसा होगा? किन्तु इस दर्द को सीने में छुपाये रखती, वो जानती है, कोई कुछ नहीं कर पायेगा। सभी के पास एक ही चीज है। बस समझाना जानते हैं, वैसे दीपक ने भी सही कहा -मुझे धैर्य रखना होगा। सोचते हुए, उसने एक गहरी स्वास भरी, शायद थोड़ा दर्द कम हो।उसने कपड़े धोये और बाल्टी उठाकर छत पर चली गयी। ज़ब वो छत पर गयी, उसने आस -पास देखा, शायद दीपक भी छत पर आया था। नंदिनी ने हाथ हिलाकर, उसे एहसास कराया, वो भी कपड़े सुखाने के बहाने यहाँ अपनी यादों को भुलाने आई है।
