बाईस साल का मनीष घर का बड़ा बेटा होने के नाते अपने उत्तरदायित्व बख़ूबी समझता है ,वो सोचता है -'पढ़ -लिखकर मुझे अपने घर की ज़िम्मेदारियों को बाँट लेना है। पापा भी, कब तक अकेले काम करते रहेंगे ? अपने दोनों छोटे भाइयों को भी समझाता है और पढ़ाता भी है। अपने बच्चों को इस तरह सही राह पर चलते देख, किस माता -पिता का ह्रदय प्रसन्नता से गदगद नहीं हो उठेगा ?
केशवदास जी और चिंतामणि जी के छह बच्चों में से ' प्रेमवती' ही सबसे छोटी होने के साथ -साथ थोड़ी ,जिद्दी' और लापरवाह है। अपने मन का करना चाहती है ,कोई क्या सोचता है ,करता है या फिर कहता है ? उसे इस बात से कोई मतलब नहीं।
मनीष हमेशा उससे कहता - पढ़ना अच्छी बात है , इसमें कोई बुराई नहीं है ,इससे तुम्हें चार चीजों का ज्ञान होता है किन्तु तुम वो करो ! जो तुम्हारी इच्छा हो ,किन्तु कल को तुझे पछताना न पड़े कि काश ! मैं पढ़ लेती ,मुझे, मेरे माता -पिता ने नहीं पढ़ाया।
वे हमारे माता -पिता हैं ,उन्हें हमारी चिंता होना स्वाभविक है ,हमारी फ़िक्र वो नहीं करेंगे ,तो और किसे होगी ? माता -पिता ही अपने बच्चों के अच्छे भविष्य की कल्पना कर जीते हैं। उन्हें तो आज भी अफ़सोस रहता है ,वे अपनी दोनों बड़ी बेटियों को पढ़ा नहीं पाए ,इसीलिए अब तुम्हें पढ़ाकर ,अब अपने मन का बोझ थोड़ा कम कर लेना चाहते हैं।'' कई बार हमें अपने लिए नहीं दूसरों के विषय में सोचकर भी कार्य करना चाहिए, इससे दूसरों का ही नहीं ,हम स्वयं का भी भला कर जाते हैं।' हो सकता है ,माता -पिता की ख़ुशी के लिए ही तुम पढ़ो ! और ईश्वर तुम्हें किसी अच्छे मार्ग पर ले जाना चाहता है।
भइया ! मैं पढ़ तो लूँ किन्तु मेरा मन ही नहीं लगता।
मन लगाओगी, तभी तो लगेगा ,हमारा मन तो यही चाहता है ,जहाँ आसान राह दिखती है ,सरलता से काम हो जाता है ,उधर ही चल देता है। पढ़ने में बैठना पड़ता है ,दिमाग़ लगाना पड़ता है। तब मन क्यों लगेगा ? थोड़ी देर बैठकर देखो !और अपनी पढ़ाई को समय दो ! धीरे -धीरे मन लगने लगेगा।
मैं कोशिश करूंगी ,भाई के समझाने पर दो दिनों तक तो केतकी पढ़ने बैठी, किन्तु शीघ्र ही मन उचट जाता इसीलिए अब भाई से भी नज़रें चुराने लगी।
चलो ! सबको मम्मी ने नीचे बुलाया है ,आज सबकी गरमा -गर्म पकौड़ी और चाय की दावत है,उत्साहित होते हुए केतकी अपने भाइयों से कहा।
अच्छा, हम अभी आते हैं ,तुम चलो ! किन्तु केतकी नहीं गयी।
क्यों, अब यहाँ क्यों बैठी है ? हम आ रहे हैं , जाकर तू खा ले ! दिवाकर ने कहा।
अब केतकी उनसे कैसे कहे ! कि नीचे पापा आए हुए हैं, तब सबसे छोटे वाले मनोज ने कहा -मुझे लग रहा है, नीचे पापा है और वो इससे पूछेंगे-' सुबह से कितना पढ़ी है , क्या जवाब देगी ?
हंसते हुए दिवाकर बोला - चल ! भाई अब नीचे चलते हैं। हम तो पढ़ रहे थे, हमें डरने की कोई जरूरत नहीं है।
तब केतकी उसे घूरते हुए, बड़े भाई से बोली -देखा, भैया ! ये दोनों मेरा कैसा मजाक उड़ा रहे हैं ?
चलो ! हम सभी चलते हैं, कोई भी किसी से कुछ नहीं कहेगा, किंतु तब भी केतकी जाने के लिए तैयार नहीं थी। पिता के चले जाने पर वो धीरे से नीचे उतरती है।
घर में, मोहल्ले में या गांव में कोई भी कार्यक्रम को केतकी सबसे आगे रहती है ,उसे नए -नए कपड़े पहनने का शौक था। नया सूट सिला नहीं ,तुरंत ही उसे पहनकर बाहर निकल पड़ती थी। एक दिन तो मनिहार को ही बुला लाई।
हाँ, जी बहन जी !बताइये ! घर के बाहर खड़ा होकर वो पुकार रहा था।
चिंता जी बाहर आकर बोलीं -भइया ! किसे बुला रहे हो ?मैंने तो नहीं बुलाया।
आपकी बिटिया ने कहा था -हमारे घर आ जाना !
हमारी प्रेम ने ,उन्होंने आश्चर्य से पूछा।
जी हाँ ,तभी तो आया हूँ।
उसने, मुझे तो नहीं बताया ,कहते हुए उन्होंने प्रेम ! को आवाज़ लगाई -प्रेम ! प्रेम !
हाँ, जी मम्मी जी !आज उसने बड़े अच्छे तरीक़े से पूछा। वो महसूस कर रहीं थीं ,बेटी के व्यवहार में कुछ तो बदलाव आने लगे हैं।
ये' मनिहार 'तूने बुलाया है।
तब तक वो नीचे आ गयी और उससे बोली -आओ भैया बैठो ! तब अपनी माँ से बोली -हाँ ,मैंने ही बुलाया। आपको पता है ,सावन चल रहा है ,दोनों बहनों का सिंधारा जायेगा। आपके हाथों में भी ,कुछ ही चूड़ी बची हैं। आपको तो ठीक से रहना भी नहीं आता। तब तक वो अपनी गठरी खोल चुका था। माँ ,बेटी को देख रही थी ,आज तो तुम की जगह आप बोल रही है। मुझे रहन -सहन सिखा रही है। उन्होंने चुपचाप ,अपनी बेटियों और अपने लिए चूड़ियां लीं।
तब केतकी ने अपने लिए नगों वाले कड़े लिए जो महंगे थे। तू, इनका क्या करेगी ?
तीज पर पहनूंगी ,मेरे सूट से मैच कर रहे हैं। आज माँ को एहसास हुआ ,अपने ओढ़ने -पहनने पर कुछ अधिक ही ध्यान देने लगी है। जब मनिहार अपना हिसाब -क़िताब करके चला गया।
तब उन्होंने पूछा -आज क्या हुआ ?तुझे ये सब कैसे याद आ गया ?
आज मैं सरपंच जी के यहाँ नीलिमा से मिलने गयी थी ,उनके यहाँ शहर से रिश्तेदार आये हुए थे। वो बड़ी अकड़ दिखा रही थी ,मुँह बिचकाते हुए बोली -मैंने भी सोच लिया ,हम क्या किसी से कम हैं ? कहते हुए अपने कड़े लेकर अंदर चली गयी।
चिंता ,मन ही मन सोच रही थी ,बेटी में बदलाव तो आ रहें हैं किन्तु अच्छे हैं ,'तुम' से 'आप' पर आ गयी ,आज तो' जी, मम्मी जी 'कह रही थी ,हँसते हुए अपने पति केशवदास से बोलीं।
वो सब तो ठीक है किन्तु थोड़ा सा पढ़ लेती और भी बेहतर रहता ,वैसे हमारी वे दोनों बेटियां बड़ी ही सज्जन हैं । माँ -बाप ने जैसा कहा मान लिया।
ए ,जी !मैं तो कहती हूँ ,इस छुटकी को ज़्यादा पढ़ाना भी ठीक नहीं है ,अभी से इसके तेवर इतने बदले हुए हैं ,पढ़ -लिख गयी, तो क्या होगा ? उनका तो जैसे घर में ब्याह किया ,चुपचाप अपनी ससुराल चलीं गयीं। वहां भी मेहनत करके काम करती हैं। कभी, कोई शिकायत नहीं आई। उन्होंने कभी कुछ नहीं कहा,दोनों घरों की इज्ज़त संभाली है।
ये बात तो सही कह रही हो ,चिंता की बातों पर ग़ौर करते हुए वे बोले।
मेरा तो मानना है ,ज़्यादा पढ़ जाने से लड़का मिलने में भी दिक्क़त आती है ,वैसा ही पढ़ा -लिखा लड़का भी तो चाहिए। ज़्यादा पढ़े लड़के को दहेज़ भी ज्यादा चाहिए।
तू भी न जाने, क्या -क्या सोचने लगती है ? ज़्यादा नहीं कम से कम ये दसवीं कर ले !बस उसके बाद इसका ब्याह कर देंगे। अब पहले तो मनीष का ब्याह होगा ,दोनों लड़कों का बाद में करेंगे ,उनसे पहले' प्रेम 'का रिश्ता कर देंगें। इंसान न जाने,भविष्य की कितनी -कितनी योजनाएं बनाता है? किन्तु होता वही है ,जो उसकी क़िस्मत में लिखा होता है। केशवदास और चिंता भी ऐसी ही योजना बना रहे थे किन्तु आगे क्या होता है ?ये तो समय ही बताएगा, क्योंकि आज तक भविष्य कोई नहीं देख पाया है।
