कागज़- क़लम हाथ ले ,सोचा था ,आज...
लिखकर कह दूंगी ,सब उनसे दिल की बातें !
मम्मी के आ जाने से, वो' ख़त अधूरा' रह गया।
बयाँ कर पाती, हाल ए दिल ' ख़त अधूरा' रह गया।
सोचा था, अकेले अपने को पाऊँगी, लिख दूंगी।
कह दूंगी, अनकहे अल्फ़ाज़! आज बयाँ कर दूंगी।
लिखने को तेरा नाम ,हाथों में थोड़ा कंपन हुआ।
बयाँ करूं कैसे ?हाल ए इश्क़ ख़त अधूरा रह गया।
अल्फाज़ न जाने कहाँ ग़ुम हुए ?या ख़ामोश हो गए।
हाल ए दिल बयाँ कैसे करूं ?रुसवा तो न कर दोगे।
क्या लिखूं ? ख़ामोशी मेरी, क्या तुम, समझ लोगे ?
इज़हार ए इश्क़ का दोगे,ज़बाब ख़त अधूरा रह गया।
सोचकर तेरी बातों को, यादों में तेरी' मैं 'खो गयी।
न भेज सकी वो ख़त ! कुछ बातें अधूरी रह गयीं।
विवाह मंडप में बैठी रही ,'अश्रु 'तेरी यादों के थे।
काश ! लिख पाती ख़त !तुम्हें ,जो अधूरा रह गया।
तेरी यादों की 'गठरी' अपनी धड़कनों में बसा ,
इश्क़ को ख़ामोशी से ,'रूह' में समा लिया है।
आ जातीं, कभी यादें !जो स्वप्न सुहाना रह गया।
तेरे लिए लिखा था, जो ख़त कभी, अधूरा रह गया।
