Ek adhura khat

  कागज़- क़लम हाथ ले ,सोचा था ,आज...

 लिखकर कह दूंगी ,सब उनसे दिल की बातें !

मम्मी के आ जाने से, वो' ख़त अधूरा' रह गया।

बयाँ कर पाती, हाल ए दिल ' ख़त अधूरा' रह गया।

 


सोचा था, अकेले अपने को पाऊँगी, लिख दूंगी। 

कह दूंगी, अनकहे अल्फ़ाज़! आज बयाँ कर दूंगी।

लिखने को तेरा नाम ,हाथों में थोड़ा कंपन हुआ।

बयाँ करूं कैसे ?हाल ए इश्क़ ख़त अधूरा रह गया।


अल्फाज़ न जाने कहाँ ग़ुम हुए ?या ख़ामोश हो गए। 

हाल ए दिल बयाँ कैसे करूं ?रुसवा तो न कर दोगे।   

क्या लिखूं ? ख़ामोशी मेरी, क्या तुम, समझ लोगे ?

इज़हार ए इश्क़ का दोगे,ज़बाब ख़त अधूरा रह गया। 

  

सोचकर तेरी बातों को, यादों में तेरी' मैं 'खो गयी। 

न भेज सकी वो ख़त ! कुछ बातें अधूरी रह गयीं। 

 विवाह मंडप में बैठी रही ,'अश्रु 'तेरी यादों के थे। 

काश ! लिख पाती ख़त !तुम्हें ,जो अधूरा रह गया।

 

तेरी यादों की 'गठरी' अपनी धड़कनों में बसा ,

इश्क़ को  ख़ामोशी से ,'रूह' में समा लिया है।  

आ जातीं, कभी यादें !जो स्वप्न सुहाना रह गया। 

तेरे लिए लिखा था, जो ख़त कभी, अधूरा रह गया।


  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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