Shaitani sa......11

केतकी बड़ी मुश्किल से ,छठवीं कक्षा उत्तीर्ण करती है किन्तु आगे पढ़ने से इंकार कर देती है जबकि उसके माता -पिता चाहते थे कि वो आगे पढ़े, कम से कम दसवीं ही पास कर ले किन्तु उसकी पढ़ाई में कोई रूचि नहीं थी। उसने स्पष्ट रूप से कह दिया,' अब वह आगे नहीं पढ़ेगी।'

 जिसके कारण उसके पिता को क्रोध आया और उन्होंने सोचा -दंड स्वरूप इसको अब घरेलू कार्यों में अपनी माँ का सहयोग करना होगा। जीवन में कितना परिश्रम करना पड़ता है ?जब उसका एहसास होगा   तो शायद ये शिक्षा के महत्व को समझ सकेगी। तब उन्होंने उससे घर के कुछ काम करने के लिए कहा किन्तु उनकी सोच के विपरीत केतकी ने वे सभी कार्य बख़ूबी पूर्ण किये।


 केशवदास जी ये सब देखकर स्तब्ध रह गए। जो कार्य इसके भाई भी सही तरीक़े से नहीं कर पाते ,इसने अपनी ज़िम्मेदारी बड़े अच्छे से निभाई। 

उन्होंने, उससे अगले दिन, भैंस का चारा काटने के लिए कहा - उसे खिलाने के लिए कहा , और उसे कई अन्य काम बतला दिए ,उन्होंने सोचा था कि अब तो यह घबरा ही जाएगी और काम करने से इनकार कर देगी। किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। केतकी ने सब काम संभाल लिया और निश्चिंत होकर खूब सोई क्योंकि अब पढ़ाई का मानसिक दबाव उस पर नहीं था।  

मां को भी उसके व्यवहार को देखकर लगता था, अजीब ही लड़की है ,न जाने किस पर गई है ?ऐसे समय में माता -पिता अपने परिवार को टटोलते हैं ,हमारे परिवार में ऐसा ज़िद्दी, अपनी बात पर अटल रहने वाला कौन था ?

अपनी ही जिद करती है और हम तो इसी के भले के लिए सोच रहे थे किंतु यह इसी में खुश है तो हम इस पर अब ज्यादा दबाव नहीं बनाएंगे।

 केतकी भी पढ़ाई छोड़कर अब निश्चिन्त हो गयी, वह खुलकर साँस ले पा रही थी।  

 उसकी सहेलियों ने भी, उससे पूछा - तूने पढ़ाई क्यों छोड़ी ?

 उसने स्पष्ट रूप से कहा - मुझे नहीं पढ़ना है ,जो मेरी इच्छा होगी, मैं वही करूंगी। उसे इस बात का दुख या पछतावा बिल्कुल भी नहीं था कि उसकी अन्य सहेलियां स्कूल पढ़ने जा रही हैं और वो इन कामों में व्यस्त है। कभी -कभी कहती -सभी पढ़ने लगेंगे तो माँ -बाप की सेवा के लिए किसी को तो आगे आना ही होगा। 

तू कब तक इनकी सेवा कर पायेगी ?एक न एक दिन तो तुझे भी अपनी बहनों की तरह इस घर को छोड़कर जाना होगा। 

तब हंसकर कहती -जब तक यहाँ हूँ ,तब तक तो संभाल ही रही हूँ ,वरना ऐसा लड़का ढूंढ़ लूँगी जो यहीं आकर रहे। 

अच्छा ! अब लड़का भी स्वयं ही ढूंढ़ लेगी ?

और नहीं तो क्या ?शहरों में लड़कियां पढ़ -लिखकर अपनी पसंद के लड़के से ही विवाह करती हैं। उसकी बातें सुनकर कभी -कभी तो ऐसा लगता वो अपनी उम्र से कुछ ज़्यादा ही सोचती है। जैसे उसने अपने जीवन की पहले से ही योजना बनाई हुई है।  

 धीरे-धीरे वह मां के घरेलू कार्यों में भी हाथ बँटाने लगी, हालांकि उसका घरेलू कार्यों को करने का मन नहीं करता था। पहले  उसकी माँ चिंता ने भी सोचा था -कि विवाह के पश्चात तो यह घर के काम ही करेंगी,क्यों बच्ची पर अभी से ज़िम्मेदारी डालना ? किन्तु अब सोचती है , जब यह पढ़ ही नहीं रही है ,तो कम से कम घरेलू कार्यों में तो उसे सहायता करवानी चाहिए।

 उसके बनाए हाथ के खाने में बिल्कुल भी स्वाद नहीं था। टेढ़ी -मेढ़ी रोटियां जल जाती थीं ,दाल और सब्ज़ी में कभी नमक कम या फिर बहुत ज्यादा हो जाता। इसी तरह उसने दो-चार बार खाना बनाया भी, किंतु दोनों भाइयों ने खाने से इंकार  कर दिया। इसके हाथ का बना खाना नहीं खाएंगे, इसे कुछ नहीं आता है। 

 मां ने बच्चों को डांटा, अभी भोजन बनाना सीख रही है , धीरे-धीरे ही तो बनाएगी। दो वर्षों में ही केतकी ने  खेती और घर के कार्यों को अच्छे से संभालना सीख लिया। ऐसा काम तो उनके बेटे भी नहीं कर पाते थे।

 केतकी ट्रेक्टर से भी खेतों में जुताई कर लेती थी, उसको इतना काम करते हुए देखकर गांववाले भी आश्चर्यचकित रह जाते और कहते -केशवदास जी, ये तुम्हारी बेटी नहीं बेटा है। ये इतना काम करती है ,तुम्हारे बेटे भी नहीं कर पाते। 

उसकी प्रशंसा सुनकर छोटा बेटा चिढ़कर कहता -हम पढ़ते भी तो हैं ,इसे बस यही काम है।इससे पढ़ाई नहीं होती।  

किन्तु वो अब अपने सभी कामों को बखूबी संभालती, कोई क्या कह रहा है ?इसकी उसे परवाह ही नहीं थी।

 समय परिवर्तनशील है ,अब केतकी उम्र के उस पड़ाव पर थी ,जिसे 'नाजुक' और' बाली' उम्र कहते हैं। पंद्रह -सोलह बरस की नादाँ उम्र, जब एक कुंवारी लड़की अपने शहज़ादे के सपने सजाने लगती है। एक लड़का अपने जीवन में आगे बढ़ने के ख़्वाब संजोता है किन्तु केतकी को बाली उम्र से कोई लेना -देना नहीं वो तो अपने काम में व्यस्त और मस्त रहती। 

घर का बड़ा बेटा मनीष ,अपनी बाक़ी की पढ़ाई पूरी करने के लिए शहर गया था और वहीं उसकी नौकरी भी लग गयी। जब रिश्तेदारों को पता चला ,तो बड़े भाई के लिए रिश्ते आने लगे। घर में अक़्सर लड़की के विषय में चर्चा होती रहती।

 बरसात के दिन चल रहे थे ,माँ ने आज केतकी को खेतों में जाने के लिए मना किया था किन्तु वो नहीं मानी ,बोली -मम्मी !बरसात अच्छी हो रही है ,अभी खेतों की जुताई करके बीज डाल देंगे तो बीज शीघ्र ही उग जायेंगे। 

ये तू क्या कह रही है ? अगर बरसात दुबारा हो गयी तो मिटटी के साथ पानी में बीज भी बह जायेंगे। 

आज जुताई तो कर ही लेते हैं ,मौसम ठीक रहा तो बीज भी डाल देंगे ,कहते हुए केतकी बाहर निकल गयी।

 अरे !रोटी खाकर तो जा! पीछे से चिंता ने तेज स्वर में उसे पुकारा। 

माँ की आवाज केतकी ने सुन ली थी,पापा ! के हाथ खेतों पर भेज देना, उसने भी बाहर से ही जबाब दिया  और  ट्रैक्टर पर चढ़ बैठी, उसे चलाते हुए वहां से निकल गयी। 

ये कितनी मेहनत करती है ? केतकी के लिए रोटी बांधते हुए चिंता बोली। 

हाँ ,काश ! पढ़ाई में इतनी मेहनत की होती तो बात ही कुछ और होती। 

आपकी बात अपनी जगह सही है किन्तु जब से हमारी बेटी ने ये सब संभाला है ,फसल दोगुनी हो रही है। 

इस उम्र में लड़कियां फैशन करती हैं ,मेकअप करती हैं और ये.... इसे तो अपने बाल बनाने की भी फुरसत नहीं। 

देखो !अब ये सोलह बरस की हो गयी है। मनीष का विवाह होते ही, इसके लिए भी लड़का देखना शुरू कर देंगे।'' बेटी तो पराया धन है ,किसी की अमानत है ,उसकी अमानत उसे सौंप निश्चिन्त हो जायेंगे।'' उसके पश्चात ये दोनों छोटे रह जायेंगे। उनका जब होगा ,आराम से करते रहेंगे।अब लाओ !मुझे उसके लिए भोजन दे दो !भूखी ही निकल गयी।   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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