तरु की छांव में ,बैठी युवती' पथ' निहारती।
कर्म करता पथ , कहो, सुंदरी !तुम किसे निहारती ?
तुम कितने शांत, पथ ! अडिग, धैर्यवान हो।
मंजिल तक पहुंचाते, धैर्य पर तुम्हारे बलिहारती ।
ऐसे ही अडिग़ रहो ! नज़र तुम्हारी उतारती।
सुन बाला के मुख से गुणगान ,पथ थोड़ा हताश हुआ।
बदल गया अब रूप मेरा,यह भान मुझे हर बार हुआ।
भले ही मैं कच्चा ,माटी , कीचड़वाला का' पथ 'था।
खेलते थे ,बालक मुझमें, रीझ उठता,देख छवि मुस्कान की।
पथ टेढ़ा -मेढ़ा था ,संकरा था ,सावन में माँ मुझे निहारती।
प्रतीक्षा में, बेटी की वो आएगी,बेटी मैके का पथ पुकारती।
देख ! जमाई -बेटी संग माँ ,द्वारे पे आरती उतारती।
मेरा कर्म पहले भी था यही , रूप ही बदला है।
भले ही मटमैला था, हर धड़कन दिलों को दिलों से संवारती।
अब भारी वाहन ढोता हूँ , दर्द भले ही सहता हूँ।
गया पुत्र, परदेश बूढी माँ, पथ उसका निहारती !
मिला सका न अपनों से ,धैर्य उस माँ का देख !जो आस संवारती !
भूल गए ,सब ड़गर उस घर की ,बालपन खेला जहाँ ,
जहाँ आंगन में कभी माँ, बालक को थी दुलारती।
आज पढ़ -लिख गए बालक ,लेकर आते घर, कागज़ वो अदालती।
मैं समय संग बदला हूँ ,मिलाता हूँ , ले जाता हूँ।
नन्हें पांव मुझ पर चले ,बड़े हुए , धरूं कैसे धैर्य ?
वो सुहाने दिन, प्यारी मुस्कान ,वो प्यारे रिश्ते जिनपे माँ बलिहारती।
प्रकृति का सब ताप सहकर,माँ -बहनों की नज़रें मुझे धिक्कारती।
