Rasiya [part 141]

 आज शिल्पा की ,मुस्कुराहट में भी, चतुर को उसका दर्द नज़र आया। उसकी ख़ामोशी में शोर नजर आया। तब वो शिल्पा से पूछ बैठता है -आखिर क्या हुआ ? शिल्पा के बार -बार टालने पर भी वो उससे ,उसकी परेशानी का कारण जानना चाहता था। तब शिल्पा अपने ह्रदय में उमड़ते तूफान को रोक न सकी।

 तब वो बोली - ''मियां -बीवी का रिश्ता कुछ ऐसा ही समझ लो ! जब तक पतिदेव की हाँ में हाँ तब तक सब अच्छा ही अच्छा है।'' शिल्पा अपने मन की बात उसे बताती है -कि जब मैंने  अपने मन की करनी चाही तो कहते हुए उसे रात्रि की सभी बातें स्मरण हो आई और उसने बताया- किस तरह प्रवीण उसे नजरअंदाज कर उससे मुंह फेर कर सो गए थे ?यह सोच कर उसकी रुलाई फूट पड़ी। 


' जख़्म' कुछ अधिक गहरा लगता है ,कहते हुए वो, शिल्पा के करीब आया। इस बात का उसने पूर्णतया ध्यान रक्खा कोई इधर आ तो नहीं रहा है। उसने शिल्पा का हाथ अपने हाथों में लिया और उन्हें सहलाते हुए बोला -''जीवन में ऐसी मुश्किलें आती हीं हैं ,जब हम अपने लिए करते या सोचते हैं, तब कोई न कोई हमें आगे बढ़ने से रोकता है या फिर मुश्किलें पैदा करता है।'' 

 ऐसा ही जीवन में मेरे साथ भी हुआ था। जब तक मैं, लोगों की नौकरी करता रहा तो उनके लिए अच्छा रहा और जब मैंने अपने लिए ,अपने परिवार के लिए सोचना आरंभ किया, तो' मैं' सब का बुरा हो गया। आप तो जानती ही होंगीं , इस कारण से मुझे, मेरे दुश्मनों ने जेल भी भेज दिया था किंतु मेरे विरुद्ध कोई प्रमाण नहीं मिल पाया इसलिए' मैं' जल्दी ही जेल से छूट भी गया। शिल्पा को लग रहा था, जैसे दोनों का दर्द एक ही है। वो भी, किसी ऐसे दर्द से गुजर चुके हैं , तब चतुर ने भी, अपना मासूम चेहरा बनाया। 

शिल्पा को, चतुर का उसके हाथों को सहलाना,आज  बुरा नहीं लग रहा था ,उसे लगा ,ये चतुर की मेरे प्रति सहानुभूति है। कोई और दिन होता तो शायद वो ,उससे दूरी बनाकर रखती  किन्तु आज वह समझ रही थी, कि' सर' उसका दर्द समझ रहे हैं।

 तभी वह पीछे हटा और अचानक से बोला - सब ठीक हो जाएगा, अभी मैं चलता हूं और दूसरे दरवाजे से बाहर निकल गया, क्योंकि इस दरवाजे से एक अध्यापिका अंदर प्रवेश कर रही थी। शिल्पा समझ गई, सर नहीं चाहते थे, कि कोई हमें साथ देखें ,उसके मन में चतुर के प्रति सम्मान और बढ़ गया। 

अब तो अक्सर उनकी आपस में एक दूसरे से बातें होने लगीं । एक दूसरे से बातें करते-करते न जाने कब बहुत करीब आ जाते, कभी चतुर उसका हाथ पकड़ लेता, तो कभी गले लगा लेता।

 प्रवीण की नाराजगी भी अपनी जगह बरकरार थी।  तब चतुर ने, शिल्पा को समझाया -'पति को इतने दिनों तक नाराज रखना उचित नहीं है वरना आपको नौकरी छोड़नी पड़ सकती है। अपनी नौकरी को बनाए रखने के लिए तो आपको, अपने पति से समझौता तो करना ही होगा।''

 चतुर  के कहने पर ,शिल्पा ने अपने आप को समझा लिया और प्रवीण से भी कह दिया था, कुछ दिन और नौकरी कर रही हूं फिर देखती हूं ,क्या करना है ?' मैं' अपना परिवार संभाल लूंगी। प्रवीण और शिल्पा के झगड़ों ने उनके मध्य चतुर को आने की जगह मिल गयी। 

वो कहते हैं ,न... 'दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर लाभ उठाता है'' ,चतुर भी ऐसा ही बंदर था। जहाँ दो पति -पत्नी में झगड़ा हुआ नहीं, कि बड़े प्यार से रोटी साफ़ ! यहाँ सवाल रोटी का नहीं ,वरन भावनाओं और रिश्तों से खेलने का है ,जिसमें दूसरा इंसान आपके जीवन में  बड़े प्यार से सहजता घुसता है और रिश्तों में सेंध लगाता है और किसी को पता ही नहीं चलता। 

शिल्पा को एहसास ही नहीं हो पाया कि उसके 'गृहस्थ जीवन 'में कब चतुर ने दरार डाल दी ? उसका इश्क -प्यार सब प्रवीण के लिए था किन्तु उसके सख़्त रवैये और उनके  झगड़े ने चतुर को वो मौका दे दिया। 

अब शिल्पा ,चतुर के साथ रहकर ,अनेक चालाकियां सीख गई थी। अब तो जब भी कभी अध्यापिकाएं अपने -अपने घर चली जातीं, शिल्पा देर तक चतुर से बातें करती रहती। जब वहां पर कोई नहीं होता था, तब चतुर उससे कहता  - आप में न जाने कितनी अच्छाइयां है ? एक अच्छी गृहणी ,एक अच्छी पत्नी !आपके पति ने कभी आपको समझा ही नहीं , मैं तो आपका कायल हो गया। इतना सब कुछ सरलता से कैसे कर लेती हैं ?

क्या सब कुछ ?

यही सब, घर संभालना ,बच्चों का ख़्याल रखना और यहाँ भी जैसे ही आप आईं ,आपने स्कूल की बाग़डोर अच्छे से संभाली है। जबकि जो भी कार्य वो करती थी ,बिना चतुर के आदेश के , वो एक डिग भी आगे नहीं बढ़ सकती थी। 

अपनी झूठी प्रशंसा सुन -सुनकर शिल्पा जैसे फूली नहीं समा रही थी। चतुर के कहने पर उसने प्रवीण से कह तो दिया ,वो स्कूल छोड़ेगी किन्तु साथ ही ,घर के सभी कार्य समय पर करके निकल जाती थी ,जिससे प्रवीण को कहने का कोई अवसर ही न मिले। इतना सब करने के पश्चात भी, अब प्रवीण से, उसकी दूरी बनी रहती क्योंकि वो अब चतुर को समय देने लगी थी। 

 इतने दिनों तक चतुर के प्यार भरे व्यवहार से शिल्पा ने, चतुर को सभी अधिकार दे दिए थे। चतुर जानता था ,यह स्कूल ही नहीं, उसका घर भी इसी में है ,तब वह सारी जांच करके आता और दफ्तर का दरवाजा बंद कर लेता। परिवार वालों से कह देता-'' हम कोई हिसाब लगा रहे हैं, कोई भी हमारे काम में व्यवधान न डाले, वरना हिसाब- किताब में गड़बड़ हो जाएगी।

उन्हें रोकता भी कौन ? बच्चे अभी छोटे थे ,कस्तूरी पढ़ी -लिखी तो थी किन्तु अभी स्कूल के विषय में कुछ नहीं जानती थी। माँ ,गांव चली गयी थी। कस्तूरी ने सोचा -हो सकता है ,दोनों मिलकर स्कूल की उन्नति के लिए कुछ कार्य कर रहे हों किन्तु वो भी एक औरत थी ,जो बातें कहीं नहीं जा सकतीं, किन्तु समझ आती हैं। 

 प्रवीण की बेरुखी और चतुर की प्रशंसा शिल्पा को उसके करीब ला रही थी और हुआ भी ऐसा ही , एक दिन उन दोनों ने संपूर्ण सीमाएं तोड़ दीं ।

 लोगों के सामने, चतुर नजर झुकाये हुए , एक स्कूल का संस्थापक था। दूसरी तरफ शिल्पा जी का प्रेमी ! उनकी प्रेम की लीलाएं अब बड़े जोरों शोरों से चल रही थीं।

यह बात कस्तूरी बहुत दिनों से महसूस कर रही थी किन्तु एक दिन उसने चतुर का कॉलर पकड़ ही लिया और उससे पूछा -ये सब क्या चल रहा है ?

क्या चल रहा है ?अनजान बनते हुए चतुर ने पूछा। 

तुम ,मुझे बहका नहीं सकते। भले ही गांव से हूँ ,ज़्यादा पढ़ी -लिखी नहीं किन्तु इंसानों के व्यवहार को समझ न सकूँ ,इतनी नादान भी नहीं। 

क्यों ? क्या तुम्हें मेरे प्यार में कोई कमी नज़र आई ? क्या मैं बच्चों के खर्चे नहीं करता ?गंभीर होते हुए चतुर ने पूछा। 

वो सब तो ठीक है ,फिर ये सब !

क्या कस्तूरी ने, शिल्पा के साथ चतुर को देख लिया या वह उसका शक ही था। क्या चतुर अपनी पत्नी शिल्पा को समझ पाया ? या फिर उसके घर में कोहराम मच गया। उसकी जिंदगी में क्या नया मोड आने वाला है ? चलिए ! अगले भाग में पढ़ते हैं। 



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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