शाम को शिल्पा ने, समय से ही भोजन बना दिया ,आज सुबह समय पर भोजन न बना सकी, इस बात का उसे अफ़सोस था इसीलिए स्कूल से आते ही, आराम करने के पश्चात ,रसोई साफ करके, भोजन तैयार करती है और प्रवीण के आने की प्रतीक्षा में थी। जब प्रवीण आता है ,तब वो अपने साथ खाने के लिए 'इडली साम्भर 'लेकर आता है और बच्चों को भी बुलाता है। तब उसकी बेटी कहती है -पापा ! मम्मी ने तो खाना बनाया हुआ है।
प्रवीण ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया, और बच्चों से कहा -बर्तन लेकर आ जाओ ! प्रवीण का यह व्यवहार शिल्पा को बिल्कुल भी पसंद नहीं आ रहा था। वह तो सोच रही थी- कि जब प्रवीण आएंगे, गरमा -गरम भोजन परोस दूंगी , सुबह जो झड़प हुई थी, उसके लिए उस बात को नजरअंदाज करके हम, आगे बढ़ जाएंगे किंतु प्रवीण ने इस बात का उसे मौका ही नहीं दिया। न ही, उससे कुछ पूछा या कहा। वह क्या चाहती है ? जैसे उसे इस बात से कोई मतलब नहीं था। शिल्पा के रहने, न रहने से कोई फ़र्क ही नहीं पड़ रहा है।
तब भी शिल्पा ने, बच्चों से कहा -'इडली सांभर' में क्या पेट भरता है ?मैंने खाना बना दिया है अभी मैं रोटी बना कर लाती हूँ।' इडली सांभर' भी खा लेना !
नहीं, मम्मी मुझे तो यही खाना है , बेटे ने ज़िद की।
बच्चे अपने बर्तन और सामान लेकर अपने पिता के पास डाइनिंग टेबल पर खाने के लिए बैठ गए।
निराश होकर शिल्पा अपने लिए, रोटी बनाने लगी। उसकी आंखें नम हो आई थीं। आज खाना नहीं बनाया, आज ही देखो ! कैसे अपने ही घर में 'मैं' अजनबी सी हो गई हूं। सोचते हुए,अपने लिए रोटी बनाती है, तभी बेटे की बाहर से आवाज आई -मम्मी ! आप भी आ जाइए !
नहीं, तुम लोग खाओ ! मुझे ज्यादा भूख नहीं है ,मैंने अपने लिए खाना बना लिया है , कह कर अपने लिए दो रोटी बनाई। खाने का मन तो बिल्कुल नहीं था किंतु वह उन्हें दिखलाना चाहती थी, कि वह भी उनके लिए भूखी नहीं रहेगी। जब ये लोग, मेरे बिना रह सकते हैं ,तो मैं भी इनके बिना रह सकती हूं। प्रवीण ने अपना खाना खत्म किया और सोने के लिए अंदर कमरे में चले गए।
शिल्पा ने एक कौर रोटी का तोड़ा और एक आंसू उसकी आंख से टपका और धीरे-धीरे न जाने कब, उसकी आंखों में आंसुओं की झड़ी लग गई। वो अपने को अपमानित महसूस कर रही थी ,नौकरी ही तो कर रही हूँ। ऐसा मैंने कौन सा गुनाह कर दिया ? बच्चे भी जा चुके थे, वह अकेली ही ज़बरन उन रोटियां के टुकड़ों को निग़ल रही थी।
सम्पूर्ण जीवन इस परिवार के लिए ख़पा दिया और आज जब अपने लिए जीने का प्रयास कर रही हूँ ,अपने ही लोग, कितने बदल गए ? इन्हें तभी अच्छा लगता है ,जब इनकी इच्छा से चलते रहें ,अपनी इच्छा से चलने का परिणाम आज नज़र आ रहा है। रसोई के काम पूरे करके जब वो अपने शयनकक्ष में गयी तो प्रवीण ने करवट बदल ली। शिल्पा चाहती थी ,मैं भी यहाँ से उठकर चली जाऊँ किन्तु वो नहीं चाहती थी ,बच्चों को कुछ भी पता चले ,मम्मी -पापा का झगड़ा हुआ है। चुपचाप बिस्तर के कोने में सिमट गयी।
आज ऐसा लग रहा था ,जैसे वो नितांत अकेली है ,उसका अपना कोई नहीं ,उसकी आँखें रह -रहकर नम हुए जा रहीं थीं। उसे, अपने बीते दिन स्मरण होने लगे। इस बिस्तर पर हमने अपने जीवन के बीस बरस एक साथ बिताये हैं और आज पल भर में ही अज़नबी हो गए। मैंने ऐसा कौन सा अपराध कर दिया ?जीवन में यही तो होता आया है। जब तक पत्नी, पति के कहे में चलती रहेगी वो उसकी ,जहाँ भी उसने अपनी इच्छा से चलना आरम्भ किया तू कौन ,मैं कौन ? एकाएक रोते हुए उसकी हिचकी निकल गयी ,उसने अपने सिर तक चादर से अपने आपको ढ़क लिया ताकि प्रवीण को पता न चल सके।
प्रातःकाल जब शिल्पा उठी ,अपने को थोड़ा थका हुआ ,महसूस कर रही थी ,घड़ी में समय देखा, अभी पांच बजे हैं किन्तु वो रसोई में चली गयी। सात बजे तक उसे भी तो स्कूल में पहुंचना है। उसने पहले ही सोच लिया था, कल से जल्दी उठकर अपने काम पूरे करके जाएगी, इसीलिए उसने नाश्ता और खाना दोनों तैयार किए काम करते उसे साढ़े छह बज गए। तब तैयार होने के लिए भागी।
ये तो अच्छा है,उसका स्कूल करीब ही है ,लगभग दस मिनट में पहुंच जाएगी। जब वो स्कूल पहुंची चतुर के 'गुड़ मॉर्निंग ' से उसका स्वागत हुआ। उसने जबरन ही मुस्कुराने का प्रयास किया किन्तु उसकी नकली मुस्कान भी उसके चेहरे की उदासी को छुपा न सकी।
क्या हुआ ?मैडम !आप कुछ परेशान हैं।
नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है ,कहकर रजिस्टर में न जाने क्या देखने लगी ? वो स्वयं ही नहीं जानती। अन्य अध्यापिकाएं भी धीरे -धीरे आ रहीं थीं। शिल्पा,अपने को व्यस्त रखने का प्रयास करने लगी। जब सभी अध्यापिकाएँ अपनी -अपनी कक्षा में चली गयीं और शिल्पा भी जा रही थी। तब चतुर पैसों का हिसाब -किताब लगाते हुए, गुनगुनाने लगा -'तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो ,क्या ग़म है ? जिसको छुपा रहे हो।''
शिल्पा ने चतुर की तरफ देखा और बाहर निकल गई।
जब अपने खाली समय में अपने दफ्तर में बैठी थी ,तभी अचानक चतुर ने आकर पूछा -
किसी हसीं चेहरे की मुस्कुराहट..... न जाने कहाँ खो गयी ?
कल तक जो ,मेरे इर्द -गिर्द घूमती थी, न जाने कहाँ ग़ुम हो गयी ?
अच्छा सर !आप शायरी भी करते हैं ,शिल्पा ने अपना मुड़ बदलने का प्रयास करते हुए मुस्कुराकर चतुर से पूछा।
हम शायर तो नहीं हैं ,किन्तु चेहरों की मुस्कुराहट वापस लाने के लिए, कभी -कभी हम शायर बन जाते हैं। खिले -खिले चेहरे अच्छे लगते हैं। आप मुस्कुरातीं हैं तो कितनी सुंदर लगतीं हैं ? जैसे कोई बहार आ गयी हो । आज उदास दिखीं तो बगिया की वो रंगीन तितली न जाने कहाँ खो गयी ?
बस -बस सर!अब ज़्यादा मक्खन मत लगाइये !हंसते हुए शिल्पा बोली।
ये हुई न बात... अब दिन बन जायेगा। वैसे मुझे आपके जीवन में झाँकने का कोई अधिकार तो नहीं है ,पर क्या मैं जान सकता हूँ ? हुआ क्या था ?
शिल्पा फिर से गंभीर हो गयी।
रहने दीजिये !मुझे नहीं जानना है ,आप हमारी सबसे प्यारी भाभी हैं ,आप पर उदासी अच्छी नहीं लगती। भइया को तो खुश होना चाहिए ,उनकी बीवी इतनी सुंदर और सुघड़ है। पहले घर संभालती थी, आज स्कूल संभाल रहीं है। काश ! ऐसा हीरा हमारी क़िस्मत में होता कहते हुए उसने गहरी स्वांस भरी।
किन्तु कुछ लोग, हीरे की क़द्र ही करना नहीं जानते ,उनके लिए तो हीरा कांच है।
लगता है ,भइया ने ही कुछ कहा होगा ,वरना किसी की क्या मजाल ?हमारी भाभी को कोई कुछ कह जाये। आपकी जोड़ी तो लाखों में एक है।
अब तो शिल्पा ,चतुर के सामने बिफ़र पड़ी और बोली -दूर से सभी अच्छे लगते हैं ,वो कहावत तो आपने दुनि ही होगी ''दूर के ढ़ोल सुहावने होते हैं। ''
