Nadi ka safar

 सागर से मिलन की आस लिए ,नदी आगे चली। 

प्रीत मेरी अद्भुत, हिम शिराओं से निकल  चली।

कभी इठलाती, बलखाती, टकराती बढ़ती रही। 

बाधा कोई हो ,'मैं' अपने प्रियतम से मिलने चली। 



 खनक मेरी चाल में , कहें ,कल-कल बहती चली।

 मिला ग़र सरोवर, कुछ क्षण विश्राम ले आगे बढ़ी।

तभी उछलती, कभी मचलती, टकराती तूफानों से,

कभी कंदराओं में, अपनी राह बना आगे बढ़ चली।

 

 सींचती चली ,बाबुल की गलियाँ ,'सागर' प्रीत में बह चली।

स्मृति समेट ,बालकों की किलकारी में,जल में मेरे नाव चली।  

 प्यास बुझाती प्रेम से, चली रे चली ! अपने साजन की गली। 

भले ही बाधाएं आएं ,हिम से टकरा जाएँ ,राह मैंने अपनी चुनी।

 

संकरी गली हो, या समतल, या पठार इठलाती आगे बढ़ी। 

बेहाल हुए वस्त्र,बाधाओं से, स्वच्छ,निर्मल  सी घर से चली। 

आशीष ले ! प्यासे अधरों का अपने सागर से मिलने चली। 

आये कोई ऋतू ,सेवाभाव लिए, अनवरत आगे बढ़ती चली।

 

दया, प्रेम, संजोये ह्रदय में प्रकृति का शृंगार कर आगे चली  

चलती रही अनवरत ,सागर मिलन को बाधा न रोक सकी।

पशु -पक्षी, मानव ,जलचर ,थलचर  सबसे प्रीत जोड़ चली।

जानती मैं,'सागर खारा ,सागर में प्रीत के मोती चुनने चली।       

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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