सागर से मिलन की आस लिए ,नदी आगे चली।
प्रीत मेरी अद्भुत, हिम शिराओं से निकल चली।
कभी इठलाती, बलखाती, टकराती बढ़ती रही।
बाधा कोई हो ,'मैं' अपने प्रियतम से मिलने चली।
खनक मेरी चाल में , कहें ,कल-कल बहती चली।
मिला ग़र सरोवर, कुछ क्षण विश्राम ले आगे बढ़ी।
तभी उछलती, कभी मचलती, टकराती तूफानों से,
कभी कंदराओं में, अपनी राह बना आगे बढ़ चली।
सींचती चली ,बाबुल की गलियाँ ,'सागर' प्रीत में बह चली।
स्मृति समेट ,बालकों की किलकारी में,जल में मेरे नाव चली।
प्यास बुझाती प्रेम से, चली रे चली ! अपने साजन की गली।
भले ही बाधाएं आएं ,हिम से टकरा जाएँ ,राह मैंने अपनी चुनी।
संकरी गली हो, या समतल, या पठार इठलाती आगे बढ़ी।
बेहाल हुए वस्त्र,बाधाओं से, स्वच्छ,निर्मल सी घर से चली।
आशीष ले ! प्यासे अधरों का अपने सागर से मिलने चली।
आये कोई ऋतू ,सेवाभाव लिए, अनवरत आगे बढ़ती चली।
दया, प्रेम, संजोये ह्रदय में प्रकृति का शृंगार कर आगे चली
चलती रही अनवरत ,सागर मिलन को बाधा न रोक सकी।
पशु -पक्षी, मानव ,जलचर ,थलचर सबसे प्रीत जोड़ चली।
जानती मैं,'सागर खारा ,सागर में प्रीत के मोती चुनने चली।
