'प्यार' मीठे और प्यारे एहसासों का एक ऐसा दरिया है, जिसमें डूबने को दिल करता है और जब इंसान एक बार उसमें डूब जाता है तो डूबता ही चला जाता है। उबरने का मन ही नहीं करता।' प्यार की चमक' उसे 'सच्चे इश्क़ का मोती' बना देती है। जज़्बात न जाने, कितनी उड़ाने भरते हुए उस प्यार के दरिया में किलौल करते हैं। मीता और अरुण भी इश्क की नैया में बैठे ,जीने -मरने की कसमें खाते और ताउम्र साथ निभाने का वायदा करते, कॉलिज के गलियारों में साथ -साथ दिख जाते।
किसी ने ख़ूब कहा हैं -' इश्क़ और मुश्क' छुपाये नहीं छुप सकते, फूलों की महक़ कितना भी बंद कर लो किंतु उसे दबाया नहीं जा सकता, इसी तरह उन दोनों के प्यार की खुशबू भी, कॉलेज के गलियारों से निकलकर ,उनके अपने घरों तक पहुंच गई।
जब यह बात घरवालों के सामने आई और उनसे पूछा गया ,तब दोनों ने घर वालों के सामने स्वीकार भी कर लिया, घरवालों को और क्या चाहिए था ? कोई अड़चन नहीं, बिना बाधा के ही विवाह तय हो गया। जीवन में ऐसे' हमसफर' कुछ लोगों को भी मिलते हैं ,जिससे इश्क़ हुआ,उससे विवाह भी हो गया।
यही बात उनके कॉलेज के मित्र भी कहते थे, यार !तुम दोनों तो बहुत भाग्यशाली हो , ऐसा कभी -कभी देखने को मिलता है। विवाह में अब किस बात की देर थी ? शीघ्र ही कोई उचित सा मुहूर्त देखकर, विवाह की तैयारी होने लगी। मीता और अरुण खुशी में,' फूले नहीं समा रहे थे। 'विवाह वाले दिन, जब मीता को देखने के लिए उसकी सहेलियां आईं तो उसके चेहरे पर दुल्हन का श्रृंगार तो हुआ था किंतु उसके' प्यार की चमक' उसके सौंदर्य को और अधिक बढ़ा रही थी। मीता में ऐसा नूर आ गया था, जैसे कुदरत ने उसे इस दिन के लिए विशेष रूप से सजाया हो।
अरुण भी, मीता से किसी भी तरह से कम नहीं लग रहा था, दोनों की जोड़ी बहुत ही अच्छी और सुंदर लग रही थी। विवाह वाले दिन दोनों नए जीवन में प्रवेश कर रहे थे, दोनों को जीवन भर साथ रहना है, यही सोचकर उनके' प्यार की चमक' में बढ़ोतरी हो गई थी।
एक दिन मैं कॉफी हाउस में बैठी हुई थी, तब अचानक ही मेरी दृष्टि एक लड़की पर गई जो उदास लग रही थी। मुझे, उसे देखकर ऐसा लगा जैसे इसे मैंने पहले भी कहीं देखा है किंतु कहां यह समझ नहीं आ रहा था। तब मैंने उसे ध्यान से देखा, अरे यह तो 'मीता' है , मैं उठकर इस विश्वास के साथ उसके करीब गयी और धीमे स्वर में बोली -मीता !
उसने तुरंत ही ,अपना चेहरा ऊपर किया और मेरी तरफ देखा ,मैं मुस्कुराई और बोली -प्रीति !
हाँ -हाँ याद है, कहकर वो मुस्कुराई ,आ बैठ !
मैंने देखा ,उसने साधारण से कपड़े पहने हुए थे ,हाथ में मैटल की एक -दो चूड़ी ,देखने से वो साधारण लड़की थी ,जबकि वो एक विवाहिता थी, मुझे देखकर वो मुस्कुराई किन्तु उसकी आँखों का सूनापन मुझसे छुप न सका।
तू यहाँ कैसे ? मैं यहीं एक दफ्तर में साक्षात्कार के लिए आई थी ,उसमें अभी समय है तो सोचा कॉफी पी लेती हूँ।
कौन सी कम्पनी ?
यहीं समीप ही चौराहे पर एक मल्टी नेशनल कम्पनी है।
और तू बता ,आजकल कहाँ है ?
मैं उसी कम्पनी में जॉब करती हूँ ,कहकर प्रीति मुस्कुराई और वो साक्षात्कार मैं ही लेने वाली हूँ।
क्या सच में ?हाँ ,सुबह से कई लोगों से मुलाक़ात हुई ,सिर में दर्द हो गया ,थोड़ी देर के लिए मैं यहाँ आ गयी।
ये तो अच्छा हुआ ,तू यहीं मिल गयी।
नहीं ,साक्षात्कार तो वहीं होगा ,बस मुझे अपनी सहेली मीता से मिलना है ,और बता कैसा चल रहा है ?तुझे तो नौकरी करनी ही नहीं थी। हमारे जीजू यानि कि अरुण महाशय कहाँ हैं ?
मेरा प्रश्न सुनकर उसने अपनी नजरें झुका लीं किन्तु उसकी नम होती आँखों को मैं देख चुकी थी। एक गहरी स्वांस लेते हुए बोली - वक़्त का पता नहीं चलता ,कब बदल जाये ?
हुआ क्या ?कुछ बताएगी।
अपना सब कुछ छोड़कर ,मैं अरुण के घर -परिवार में बस गयी ,उसके लिए और उसके परिवार को सर्वोपरि मान मैंने अपनी नौकरी, पढ़ाई किसी पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि अरुण नहीं चाहता था कि मैं घर -परिवार और नौकरी के मध्य बंटकर रह जाऊँ ! कुछ महीने तो ख़ुशनुमा बीते किन्तु धीरे -धीरे उसकी माँ का परिवार वालों का व्यवहार बदला। जब मैं अरुण से कहती, तो कह देता -बड़े हैं ,माता -पिता हैं। मैंने उसके प्यार के लिए सब बर्दाश्त किया।
कुछ महीनों के पश्चात मैंने महसूस किया ''अब अरुण का व्यवहार भी मेरे प्रति बदलने लगा है ,मैं उससे कुछ कहती तो उसे झुंझलाहट होती,गुस्सा आता। मैं अकेली पड़ गयी, उसके बदले व्यवहार को मैं समझ नहीं पा रही थी।
कुछ दिनों पश्चात मुझे पता चला ,उसके दफ्तर की लड़की उसके साथ अलग रहती है। मेरा प्यार ,मेरा विश्वास सब समाप्त हो गया। अरुण के प्यार में अब वो चमक नहीं रही। उसका छल मुझे अंदर तक तोड़ गया। अब मैं वहां किसके लिए रहूं ?अपने आसूं पोंछते हुए मीता ने कहा।
मैं देख रही थी ,आज मीता की क्या हालत हो चुकी है ?उसके' चेहरे की चमक 'भी फ़ीकी पड़ गयी थी। वो खिली -खिली रहने वाली मीता आज जैसे बुझ सी गयी थी। तुम फ़िक्र न करो ! कल से काम पर आ जाना किन्तु अभी चलकर मेरे साथ थोड़ी औपचारिकता पूर्ण कर लेना।
मैं उसे अच्छे से जानती थी ,वो बहुत ही मेहनती लड़की है। शायद उस पहली मीता में , मैं फिर से उसका जीने का उत्साह जगा सकूं ,ये मेरा पहला प्रयास था।
