मोहिनी उस गुप्त कक्ष से बाहर गलियारे में आती है और जैसे ही डायरी का अंतिम पृष्ठ खोलकर देखना चाहती है ,पूरा गलियारा अँधेरे में डूब चुका था। कुछ क्षण पहले तक दीवारों पर जल रही पीली बत्तियाँ एक साथ बुझ गई थीं। अब वहाँ सिर्फ़ ऊपर से आती हल्की हवा की सीटी सुनाई दे रही थी।
मोहिनी ने डायरी को अपने सीने से और कसकर लगा लिया।अँधेरे में इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसकी आँखें नहीं...उसकी सुनने की क्षमता होती है। मोहिनी ने अपनी साँसें भी धीमी कर लीं। तभी...सीढ़ियों की दिशा से किसी के उतरते हुए ,जूतों की आवाज़ उसे सुनाई दी। ठक...ठक...ठक...
हर कदम पहले से ज़्यादा स्पष्ट सुनाई दे रहा था। किसी अनजाने भय से मोहिनी तुरंत कमरे के अंदर वापस गयी और एक कोने में रखी विशाल पत्थर की मूर्ति के पीछे खुद को छिपा लिया। उसका दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि उसे लगा, कहीं सामने वाला कहीं उसकी धड़कन न सुन ले।
कुछ ही सेकंड बाद...टॉर्च की एक तेज़ सफ़ेद रोशनी कमरे में घूमी। वह रोशनी पहले मेज़ पर गई।फिर खाली कुर्सी पर और फिर फर्श पर, और आखिर में उस दरवाज़े पर, जिसके पास कुछ देर पहले मोहिनी खड़ी थी।
वह टॉर्च वाला व्यक्ति और कोई नहीं 'भानु' था। भानु ने कमरे की एक -एक चीज को ध्यान से देखा किन्तु कुछ नहीं दिखा। "कोई तो था यहाँ..."उसने धीमे स्वर में कहा।
मेज़ पर धूल बिखरी हुई थी ,कुर्सी हल्की-सी खिसकी हुई थी।फर्श पर ताज़ा पैरों के निशान भी थे, लेकिन कमरा खाली कैसे हो सकता है ? उसने टॉर्च नीचे झुकाई ताकि धूल पर पड़े निशानों से कुछ अंदाजा लग सके ,उसका शक़ सही था ,धूल में दो तरह के निशान थे -पहले..हल्के कदम !शायद किसी लड़की के थे ,दूसरे...भारी जूतों के ,और वही भारी निशान कमरे के बाहर जाकर गायब हो रहे थे।
सोचने की मुद्रा में भानु की भौंहें सिकुड़ गईं। इसका मतलब है ,"मैं अकेला यहाँ नहीं आया हूँ ।"
पत्थर की मूर्ति के पीछे छिपी मोहिनी ने यह सब सुन लिया। उसे समझ आ गया कि भानु को अब तक उसके बारे में पूरी सच्चाई नहीं पता किन्तु अब उसके मन में प्रश्न था ,वो भानु के सामने यहाँ से बाहर निकले या नहीं ? अगर वह बाहर आती है...तो क्या भानु उससे यह डायरी छीन लेगा ? मुझे उस पर भरोसा करना चाहिए या नहीं ?
क्या वो, मुझ पर भरोसा करेगा ? उसका मन अभी निर्णय ले ही रहा था कि अचानक...कड़ ...उसके पैर के नीचे पड़ा सूखा पत्थर टूट गया। उस कमरे में इतना सन्नाटा था ,वो आवाज़ पूरे कमरे में गूँज गई।भानु तुरंत मुड़ा , टॉर्च की रोशनी सीधे मूर्ति की तरफ़ गई।"कौन है ?वहाँ ! उसने पूछा।
किन्तु उधर से कोई जवाब नहीं आया " देखो !तुम जो कोई भी हो ,मैं जानता हूँ ,तुम यहीं हो ,बाहर आओ !वहां अभी भी खामोशी थी ,तब भानु बोला -तुम बाहर नहीं आते हो तो मैं उधर आ जाऊंगा ,उसने धमकी दी। भानु ने एक कदम आगे बढ़ाया और बोला -अगर तुम दुश्मन नहीं हो"...तो तुम्हें छिपने की आवश्यकता नहीं है।"
मोहिनी ने अपनी आँखें बंद कीं और सोचा -अब छिपना संभव नहीं है। वह धीरे-धीरे मूर्ति के पीछे से बाहर आई।टॉर्च की रोशनी जैसे ही उसके चेहरे पर पड़ी, मोहिनी ! तुम...उसे देखकर भानु अवाक् रह गया।
दोनों कुछ क्षण बिना कुछ बोले ,एक-दूसरे को देखते रहे। सबसे पहले भानु ने ही चुप्पी तोड़ी - तो क्या सचमुच..हर रात तुम यहीं आती हो।"
मोहिनी ने तुरंत कहा,-मैं पहली बार यहाँ आई हूँ।"
"झूठ !भानु अविश्वास से बोला।
"मैं झूठ नहीं बोल रही हूँ ,मेरा विश्वास करो !
फिर तुम्हारे पास इस जगह की चाबी कैसे आई ? यह सवाल सुनते ही मोहिनी चुप हो गई।उसे दादीसा की बात याद आई "चाबी कभी मत खोना..."उसने तय किया...अभी वो दादीसा का नाम नहीं लेगी।
भानु ने उसकी आँखों में देखा ,उसे महसूस हुआ...मोहिनी उससे कुछ छिपा रही है लेकिन वह डर के कारण छिपा रही है...या किसी वादे की वजह से....यह समझना मुश्किल था। वो बाद में पता कर लेंगे सोचकर उसने पूछा - यह तुम्हारे हाथ में क्या है?"
उसकी नज़र डायरी पर पड़ी ,मोहिनी ने सहज ही उसे पीछे कर लिया,"कुछ नहीं।"
"अगर कुछ नहीं है....तो छिपा क्यों रही हो?"
"क्योंकि मुझे खुद ही नहीं पता यह क्या है।"इस बार उसके स्वर में झुंझलाहट नहीं...सच था।
भानु ने गहरी साँस ली -"देखो...मैं यह नहीं जानता कि इस हवेली में क्या चल रहा है ? लेकिन इतना समझ गया हूँ कि कोई हम दोनों से सच्चाई छिपा रहा है। मोहिनी ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा।उसे वहाँ न ही लालच दिखा और न ही डर ! सिर्फ़ जवाब तलाशता हुआ, एक इंसान !
क्या मैं, तुम पर भरोसा कर सकती हूँ ... उसने धीरे से पूछा ? और क्या तुम भी, मुझ पर विश्वास करोगे?"
भानु ने बिना एक पल गंवाए जवाब दिया -"कोशिश करूँगा।"
यह जवाब सुनकर मोहिनी हल्का-सा मुस्कुराई ,सोचा -"कम से कम मुझसे झूठ तो नहीं बोला।"
भानु भी अनजाने में मुस्कुरा दिया। शायद ,पहली बार दोनों के मध्य बिना टकराव के बातचीत हुई थी।लेकिन अगले ही पल... सुरंग के अंदर कहीं दूर से लोहे की जंजीरों के हिलने की आवाज़ आई।खड़... खड़... खड़...दोनों तुरंत सतर्क हो गए।
तुमने कुछ सुना? मोहिनी ने फुसफुसाकर पूछा।
"हाँ ! भानु ने टॉर्च उस दिशा में घुमाई ,सामने अँधेरा था,लेकिन हवा अब पहले से ठंडी हो गई थी।
दोनों सावधानी से आगे बढ़े ,कुछ दूर तक जाने के पश्चात सुरंग दो हिस्सों में बँट गई।
बाईं ओर पत्थर की दीवार पर एक निशान बना था -१ दाईं ओर—२
भानु ने धीमे स्वर में कहा -"तहखाना... एक और दो।"
मोहिनी की उँगलियाँ अनायास चाबी पर कस गईं ,उसकी चाबी पर भी तो यही अंक था—२
उसी समय डायरी उसके हाथ में हल्की-सी खुल गई ,शायद हवा से।दोनों की नज़र अनायास उसी खुले पन्ने पर पड़ी। उस पर स्याही से सिर्फ़ एक वाक्य लिखा था—
"अगर यह डायरी भानु राजवीर के हाथ लगे... तो उसे सच कभी मत बताना।"
कुछ सेकंड तक दोनों स्तब्ध रह गए, भानु का चेहरा कठोर हो गया ,उसने धीरे से पूछा -"इसका... क्या मतलब है?"
मोहिनी के पास कोई उत्तर नहीं था,लेकिन इससे पहले कि वह कुछ कहती...दाईं ओर वाली सुरंग से किसी बूढ़े आदमी की दर्दभरी आवाज़ गूँजी—
"भानु "अगर ज़िंदा रहना चाहता है....तो तहखाना नंबर दो में मत आना।
उस आवाज को सुनकर दोनों के शरीर में सिहरन दौड़ गई क्योंकि वह आवाज़...सीधे उसी दिशा से आ रही थी,जिसके दरवाज़े की चाबी इस समय मोहिनी की मुट्ठी में थी।
वो दोनों गलियारे में खड़े एक -दूसरे को देख रहे थे,आखिर अब हमें क्या करना चाहिए ? जिधर से यह आवाज आई थी ,उसकी आवाज सुनने से लग रहा था ,जैसे -वो कोई बुजुर्ग और कमज़ोर इंसान हो सकता है। अब क्या किया जाये ? अब पीछे भी नहीं लौट सकते थे ,मन में जिज्ञासा थी ,आखिर ऐसा क्या रहस्य हो सकता है ? जो हमसे छुपाया जा रहा है।
जो इंसान हमें चेतावनी दे रहा है ,हो सकता है ,वही हमारी समस्या को सुलझा दे ! ये भी हो सकता है ,उसे हमारी सहायता की आवश्यकता हो ,यही सब सोचते हुए मोहिनी और भानु तहखाना नंबर - २ की तरफ बढ़ चले।
