Path ka dhairy

  कच्ची मिटटी ,कभी 'पगडंडी' सी !

  कभी 'संकरी' ,कभी बनी 'विस्तृत ! 

 कभी गड्ढे ,कभी टूटी, कीचड़ भरी,

कभी उबड़ -खाबड़ ,ऊँची -नीची सी

 आज है ,पथरीली , कंक्रीट की। 


 बनती गयीं राहें, बनती मंज़िलें !

घुमावदार हो या फिर सीधी सी। 

आज लहराती कृष्ण सर्पीली सी ,

रूप बदला, अपना स्वभाव नहीं।

सहन किया सब, छोड़ा धैर्य नहीं। 

राही को, उसकी मंज़िल पहुंचा।

लड़ता तूफानों से,कर्म छोड़ा नहीं।   

 भारी वर्षा, कभी बाढ़ को झेला,

 पगों की भीड़ में ,न रहा अकेला। 

तीन ऋतुओं की, मार सहन कर,

पर कभी खोया, अपना धैर्य नहीं।

 कभी भारी वाहन, घायल करते। 

प्रकृति की मार सुंदरता नष्ट करते।       

डटा रहा, अपने कर्त्तव्य मार्ग पर ,

''पथ ने धैर्य'' अपना खोया, नहीं।

ताप से हुआ ,उसका सीना छलनी। 

पथिक को छाया,तरु से थीमिलनी।

पथ ने कर्त्तव्य, अपना पूर्ण किया।

राही को मंजिल तक पहुंचा दिया।

साथ सबको ले चला,सहयोग दिया। 

भटके हुओं को राह दिखा मिला दिया।    

गांव हो या शहर अपनों से मिला दिया। 

पथ, लघु हो या दीर्घ, कर्म भुला नहीं ,

क्या पथिक ! मंजिल पर पहुंचा नहीं ?

इंसा हो या प्रकृति सब सहन किया।

धैर्य से मंजिल पर सबको पहुंचा दिया।     

   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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