कच्ची मिटटी ,कभी 'पगडंडी' सी !
कभी 'संकरी' ,कभी बनी 'विस्तृत !
कभी गड्ढे ,कभी टूटी, कीचड़ भरी,
कभी उबड़ -खाबड़ ,ऊँची -नीची सी
आज है ,पथरीली , कंक्रीट की।
बनती गयीं राहें, बनती मंज़िलें !
घुमावदार हो या फिर सीधी सी।
आज लहराती कृष्ण सर्पीली सी ,
रूप बदला, अपना स्वभाव नहीं।
सहन किया सब, छोड़ा धैर्य नहीं।
राही को, उसकी मंज़िल पहुंचा।
लड़ता तूफानों से,कर्म छोड़ा नहीं।
भारी वर्षा, कभी बाढ़ को झेला,
पगों की भीड़ में ,न रहा अकेला।
तीन ऋतुओं की, मार सहन कर,
पर कभी खोया, अपना धैर्य नहीं।
कभी भारी वाहन, घायल करते।
प्रकृति की मार सुंदरता नष्ट करते।
डटा रहा, अपने कर्त्तव्य मार्ग पर ,
''पथ ने धैर्य'' अपना खोया, नहीं।
ताप से हुआ ,उसका सीना छलनी।
पथिक को छाया,तरु से थीमिलनी।
पथ ने कर्त्तव्य, अपना पूर्ण किया।
राही को मंजिल तक पहुंचा दिया।
साथ सबको ले चला,सहयोग दिया।
भटके हुओं को राह दिखा मिला दिया।
गांव हो या शहर अपनों से मिला दिया।
पथ, लघु हो या दीर्घ, कर्म भुला नहीं ,
क्या पथिक ! मंजिल पर पहुंचा नहीं ?
इंसा हो या प्रकृति सब सहन किया।
धैर्य से मंजिल पर सबको पहुंचा दिया।
