Nyay ki khoj

'न्याय की खोज' के लिए हमें कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं होती, हमारा अंतर्मन जानता है कि क्या सही है और क्या गलत है ? किन्तु जब हमारे साथ कुछ अन्याय हुआ होता है, तब हम ''न्याय की खोज'' के लिए निकल पड़ते हैं। यदि यही बात किसी अन्य के साथ हो रही होती है, तो उसके लिए हम, अनेक कारण ढूंढने लगते हैं। कई बार ऐसा होता है, कि जो बात हमें न्याय संगत लग रही है, दूसरा उस बात से इनकार कर देता है। जबकि वह भी जानता है, कि वह कार्य न्याय संगत नहीं है। तब भी अपनी बात को बड़ी रखने के लिए , वह ऐसा कार्य करेगा ही। कई बार तो ऐसा होता है, कि हम अपने घरों में ही, न्याय की उम्मीद करते हैं किंतु अपेक्षाकृत हमें न्याय नहीं मिलता।


 बाहरी अदालतों में तो न्याय पाने में सालों लग जाते हैं , किंतु जो अंदर रिश्तों में अन्याय हो रहे होते हैं उनका न्याय कौन करता है ? उनके लिए तो कोई अदालत नहीं ,हो भी तो वे अदालत तक नहीं पहुंच पाते। क्योंकि वे रिश्ते भी तो अपने ही होते हैं। दरअसल देखा ये गया है ,अन्याय तो कहीं न कहीं, किसी न किसी के साथ होता ही रहता है किन्तु जो सही में न्याय पाने के अधिकारी है ,वे तो न्यायालय तक पहुंच ही नहीं पाते। 

  अभी कुछ दिन पहले मैंने एक वीडियो देखी, उसमें एक 85 साल के बुजुर्ग को, उनकी बहू और बेटा पीट रहे थे। जिस पिता ने उनको पाल-पोसकर इस लायक बनाया, कि वह अपनी घर गृहस्थी  संभाल सके ,वो आज वह ऐसी स्थिति में है कि वह कुछ नहीं कर पा रहा है। अपने ही बच्चों से मार खा रहा है। साधारण दृष्टि से देखा जाए तो हम इसे अन्याय कहेंगे ? किंतु उन पर हो रहे अन्याय [अत्याचार ]का न्याय कौन मांगने जाएगा ? जब अपने ही यह अपराध कर रहे हैं।

 इस तरह के अपराध कहूं या अन्याय अक़्सर घरों में होते आये हैं ,वो बुजुर्ग़ सक्षम ही नहीं है , अगर सक्षम होते तो शायद उनके परिवार वाले इस तरह अन्याय नहीं कर पाते। ऐसे में 'न्याय की ख़ोज' के लिए कौन आगे आएगा ?यह एक बड़ा प्रश्न है ,घरवाला कोई आगे नहीं आएगा। बाहर वाला देखकर भी,उसको  नजरअंदाज करने का प्रयास ही करेगा। यदि वो ये क़दम उठाता भी है ,तो उसको भी अपमान और अन्य परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।  

 क्या यह अन्याय नहीं है ? एक परिवार की बहू, घर के सारे काम करती है, सब बातें सहन करती है, उसके लिए किसी के पास ,बोलने के लिए प्यार के दो शब्द भी नहीं है , उसके पश्चात भी उसको डाँटा- फटकारा जाता है। क्या यह कोई सामाजिक रीति रिवाज है ? या वह इस घर की बहू बनकर आई है, उसकी गलती है। अभी इतना नहीं, कई बार उसको दहेज के लिए प्रताड़ित भी किया जाता है और कई बार मार भी दिया जाता है।

 उसके माता-पिता अदालत के चक्कर काटते रहते हैं। , मान लीजिए उन लोगों को सजा हो भी गई , उन्हें न्याय मिल भी गया तो क्या उनकी बेटी वापस आ पाएगी ? क्योंकि यह ऐसा अपराध है , जिसका कोई सुधार नहीं है। 

इसी तरह एक लड़की, कई लोगों के द्वारा प्रताड़ित की जाती है, और वह तीन-चार दिन के बाद अपनी 'जान से हाथ धो बैठती है।' क्या यह अन्याय नहीं था ? यदि यह अन्याय था ,तो उसके साथ ऐसा क्यों हुआ ? उन लोगों को सजा मिल भी गई ,तो क्या उस लड़की को जिंदगी वापस मिल जाएगी।

 हम' न्याय की खोज' में कहाँ-कहाँ तक घूमते फिरेंगे ? कई बार तो हम खुद ही अन्याय करते हैं, किंतु अपने अंदर झांक कर नहीं देखते, हमारा अंतर्मन हमें समय -समय पर चेताता रहता है। वह न्याय किसी रिश्ते के प्रति भी हो सकता है किसी बाहरी व्यक्ति के प्रति भी हो सकता है। यह अन्याय शारीरिक ही नहीं, मानसिक अन्याय भी हो सकता है, किसी को मानसिक रूप से प्रताड़ित करना भी, एक तरीके से अन्याय ही है। जि सके प्रमाण न्यायालय में भी पेश नहीं किये जा सकते।

देखा जाये तो ,न्याय -अन्याय एक तराजू के दो पलड़े हैं किन्तु अन्याय का पलड़ा हमेशा भारी रहा है और कानून की आँखों पर पट्टी ! न्याय की खोज़ के लिए तो वही निकलेगा ,जिसका अंतर्मन ,अंतरात्मा जाग्रत हो। ''वही सही और ग़लत को समझ उचित निर्णय ले पाएगा। ''

''बाहरी न्यायालय तो प्रमाणों का मोहताज़ है ,कई अपराध ऐसे हो जाते हैं ,जिनका कोई प्रमाण भी नहीं मिल पाता और प्रमाणों के अभाव में उचित न्याय की आस कैसे लगा सकते हैं ? 

हम कहां-कहां भटकेंगे ? अपने आसपास ही इतने अन्याय होते देखकर, हम अपने ज़मीर को मारकर बैठ जाते हैं, इनके पचड़े में कौन पड़े ? बात भी सही है कई बार, किसी के लिए न्याय मांगने जाते हैं और'' लेने के देने पड़ जाते हैं।''

 न्याय- अन्याय की कोई परिभाषा नहीं है लेकिन सामाजिक और मानसिक दृष्टि से देखा जाए, जो भी गलत हो रहा है वहीं अन्याय है क्योंकि कुछ लोगों की दृष्टि में वह तर्क और न्यायसंगत हो सकता है किंतु कुछ की दृष्टि में अन्याय होगा। 

जैसे झूठ की भी कोई परिभाषा नहीं है, एक झूठा किसी को बचाने के लिए बोला जाता है , तो दूसरा झूठ किसी को मारने के लिए भी बोला जा सकता है। अन्याय तो हर व्यक्ति कभी ना कभी, किसी न किसी के साथ कर ही देता है। कभी दफ्तर का अधिकारी बनकर ,कभी घर में पति के रूप में ,तो कभी अमीर का ग़रीब पर अत्याचार ! अत्यधिक अत्याचार होने पर तब व्यक्ति'' न्याय की खोज़ ''में भागता है।

 ऐसा नहीं है कि हर गरीब ही अन्याय सहन करता है, कई बार तो लोग, इज्जत और सम्मान की खातिर उस अन्याय के लिए आवाज भी नहीं उठा पाते किंतु अन्याय  तो अन्याय ही है, हर चीज के लिए अदालत में नहीं भागा जाता।

 कई बार 'मानसिक रूप' से इतना प्रताड़ित किया जाता है ,तब हम न्याय की गुहार लगाते हैं , उम्मीद करते हैं कोई तो हमारे साथ खड़ा हो किंतु आज के समय में किसी को किसी के पास समय देने के लिए ,समय ही नहीं है। न्याय और अन्याय के विषय में सोचने की फुर्सत ही किसे है ?अब पैसा सर्वोपरी हो गया है ,यदि ऐसा न होता तो असमय ,पुल और सड़कें न टूटतीं।  कुछ केस तो ऐसे होते हैं जो अदालत तक पहुंच जाते हैं और न्याय मिलते-मिलते सालों लग जाते हैं, जिसका कोई औचित्य नहीं रह जाता है। 

कुछ लोग न्याय के लिए, या उचित बात के लिए, परिवार में ही लोगों का मुंह ताकते रहते हैं, कोई तो हमारे साथ खड़ा हो, कोई तो न्याय की बात करें और इस न्याय की उम्मीद में दिन, महीने और साल यूं ही बीत जाते हैं। एक उम्र गुजर जाती है, किंतु 'न्याय' नहीं मिलता। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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