शांत मन ,'मौन' रहकर अपने आपको टटोलता है।
ज्ञान की धारा बही ,तब मौन अंतर्मन में झांकता है।
वेदना की पराकाष्ठा ,मौन रहना बेहतर समझता है।
कहने को शब्द नहीं,क्रोध को थाम धैर्य,सिखाता है।
आत्मजागृति ,ज्ञान का प्रकाश ,स्वतः मौन कर जाता है।
भीतरी कोलाहल को शांत कर तब मौन अंदर आता है।
मौन भय का हो या अंतर्मन का ,यही' प्रथम सौपान' है।
वाणी 'मौन' या उथल -पुथल करते विचारों का मौन है ?
'चंचल इन्द्रियों' का मौन या फिर' वैराग्य' का मौन है।
प्रथम सोपान निशब्द भावों का,चपल वाणी ही मौन है।
आंतरिक बवंडर भरा,' चक्षुओं' का नहीं वाणी मौन है।
आहत हुआ मौन ,साधक मौन,कौन धैर्य स्वीकारता है ?
प्रसन्नता की पराकाष्ठा 'कभी -कभी मौन कर जाती है।
बलात ही जिसे' मौन' किया क्या वो मौन कहलाता है ?
संकल्प ले, '' व्रत मौन' का काल सीमा में बंध जाता है।
स्वार्थी , लोभी रिश्तों से हताश तब मौन ही सुहाता है।
