Maun ki pehli seedhi

शांत मन ,'मौन' रहकर अपने आपको टटोलता है।

ज्ञान की धारा बही ,तब मौन अंतर्मन में झांकता है।  

वेदना की पराकाष्ठा ,मौन रहना बेहतर समझता है। 

कहने को शब्द नहीं,क्रोध को थाम धैर्य,सिखाता है।



आत्मजागृति ,ज्ञान का प्रकाश ,स्वतः मौन कर जाता है। 

भीतरी कोलाहल को शांत कर तब मौन अंदर आता है।

मौन भय का हो या अंतर्मन का ,यही' प्रथम सौपान' है।

वाणी 'मौन' या उथल -पुथल करते विचारों का मौन है ?

  

'चंचल इन्द्रियों' का मौन या फिर' वैराग्य' का मौन है।

प्रथम सोपान निशब्द भावों का,चपल वाणी ही मौन है।

आंतरिक बवंडर भरा,' चक्षुओं' का नहीं वाणी मौन है। 

आहत हुआ मौन ,साधक मौन,कौन धैर्य स्वीकारता है ?

 

प्रसन्नता की पराकाष्ठा 'कभी -कभी मौन कर जाती है। 

बलात ही जिसे' मौन' किया क्या वो मौन कहलाता है ?

संकल्प ले, '' व्रत मौन' का काल सीमा में बंध जाता है।

स्वार्थी , लोभी रिश्तों से हताश तब मौन ही सुहाता है।   

   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post