सच्चाई की डगर पर यह नाव चल पड़ी है।
बुराई को पीछे धकेल आगे निकल पड़ी है।
शोर मन का अब थम न सकेगा,आएगा बाहर,
दिल की कुछ बातें, जो अब तक दबी पड़ी हैं।
माना कि ,'जलधि' सा विस्तृत'जग' पार करना है।
सच ! कब छुपता ? कोई कहता, कोई लिखता है।
सच्चाई का सौदागर बन ,पतवार [सच]में विश्वास है।
मेरी उम्मीदों के पन्नों सी ,लहराती निकल पड़ी है।
उड़ते पन्नों में मेरे शब्दों का गगन ओ संसार है।
सत्य की नैया संग ले ! मैं चला हूं , प्रेम की राह ,
परिंदों से पन्ने छा जायेंगे ,आशाओं के दिए जलाएंगे।
भेजता रहा पन्नों से, अपने सपनों की राहें कठिन हैं।
मैं रहूं ना रहूं, अब तो यही, मेरे साहस का संसार है।
हृदय पीड़ा बतलाऊं कैसे ?यह नभ -सागर ही ग़वाह हैं।
कर्म मेरा अनवरत चला रहा,ये मेरे शब्दों का संसार है।
पन्नों की पीड़ा समझा कौन ?हाथ मेरे पतवार[क़लम ]है।
उड़ते परिंदों से यह उड़ जाएंगे, संदेश मेरा ये ले जाएंगे।
भंवर में फंसा 'मैं'डूब गया, क़लम अपनी छोड़ जाऊंगा।[टाइपराइटर ]
चलता रहेगा, यूं ही जीवन,पन्नों पर 'निशां' छोड़ जाऊंगा।
