अपने होने का अर्थ समझाया, मुझे मेरी सांसों ने ,
मेरे अपने होने का अर्थ बतलाती है ,मेरी धडकनें।
सोचती -समझती हूं , सुनती हूँ ,रूह है ,अपने में ,
ज़मीर जिंदा रहा, एहसास दिलाया,' अंतर्मन' ने।
देखा , जब आईना मुझसे ,नज़रें मिलीं लगा''मैं हूं।''
जब अपनों ने ही नहीं, गैरों ने सराहा, तो लगा मैं हूं।
नजरों से अपने गिरी नहीं , मुस्कान कहती ,'मैं हूँ।
बुलंद आवाज़, जो लड़ती सच की लड़ाई तो 'मैं हूँ।
मैं किसी की स्मृतियों की, मुस्कान बन गई हूं।
मैं किसी के लम्हों की महक बन, महकाई हूं।
वक़्त बदला ,लोग बदले, मैं अडिग दृढ़ रही हूँ।
थामा जो हाथ किसी अपने का दर्द बांट आई हूं।
मेरे होने का एहसास! जब तुमने ,मेरे शब्दों को पढ़ा।
मेरे होने का अर्थ किसी की दुआओं में उठते हाथों में है।
साक्षी ये जमीं -आसमां जिन्हें देख मेरे दिन का आरम्भ है।
प्रतिदिन कर्मों का लेखा, मेरे होने का एहसास दिलाता है।
प्रकृति ने भी, मुझे, मेरे होने का एहसास दिलाया।
परिवर्तन ही जीवन,आदर्शों पर चलना सिखलाया।
कभी मैं, अपने लिए भी जी लेती हूँ ,मुस्कुराती हूँ।
कभी खुलकर भी हंसती,अपने आप से प्रेम करती हूँ।
