Apne hone ka arth

अपने होने का अर्थ समझाया, मुझे मेरी सांसों ने ,

मेरे अपने होने का अर्थ बतलाती है ,मेरी धडकनें। 

सोचती -समझती हूं , सुनती हूँ ,रूह है ,अपने में ,

ज़मीर जिंदा रहा, एहसास दिलाया,' अंतर्मन' ने।

 


देखा , जब आईना मुझसे ,नज़रें मिलीं लगा''मैं हूं।'' 

जब अपनों ने ही नहीं, गैरों ने सराहा, तो लगा मैं हूं।

 नजरों से अपने गिरी नहीं , मुस्कान कहती ,'मैं हूँ।

 बुलंद आवाज़, जो लड़ती सच की लड़ाई तो 'मैं हूँ।

   

मैं किसी की स्मृतियों की, मुस्कान बन गई हूं। 

मैं किसी के लम्हों की महक बन, महकाई हूं।

वक़्त बदला ,लोग बदले, मैं अडिग दृढ़ रही हूँ।  

थामा जो हाथ किसी अपने का दर्द बांट आई हूं।


मेरे होने का एहसास! जब तुमने ,मेरे शब्दों को पढ़ा।

मेरे होने का अर्थ किसी की दुआओं में उठते हाथों में है। 

साक्षी ये जमीं -आसमां जिन्हें देख मेरे दिन का आरम्भ है।   

प्रतिदिन कर्मों का लेखा, मेरे होने का एहसास दिलाता है। 


 प्रकृति ने भी, मुझे, मेरे होने का एहसास दिलाया। 

परिवर्तन ही जीवन,आदर्शों पर चलना सिखलाया। 

 कभी मैं,  अपने लिए भी जी लेती हूँ ,मुस्कुराती हूँ। 

 कभी खुलकर भी हंसती,अपने आप से प्रेम करती हूँ। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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