मोहिनी ने जैसे ही सुरंग के रास्ते जाकर वो लोहे का दरवाजा खोला , दरवाज़ा धीरे-धीरे चरमराता हुआ, खुल गया ,अंदर पूरा कमरा अँधेरे में डूबा हुआ था। सिर्फ़ एक कोने में लालटेन जल रही थी। उसकी रोशनी में एक पुरानी लकड़ी की मेज़ दिखाई दे रही थी और मेज़ पर...धूल से ढकी एक मोटी डायरी ! मोहिनी धीरे-धीरे आगे बढ़ी ,उसने देखा ,डायरी के ऊपर एक मुड़ा हुआ कागज़ रखा था। उसने काँपते हाथों से उसे खोला ,उस पर सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी थी—"अगर तुम यहाँ तक पहुँच गई हो... तो इसका मतलब है कि उन्होंने तुम्हें भी चुन लिया है।"
मोहिनी की साँस जैसे थम गई।"उन्होंने?"वह आगे पढ़ने ही वाली थी...तभी अचानक कमरे के बाहर गलियारे में किसी के कदमों की आवाज़ गूँजी - ठक...ठक...ठक...
यह एक आदमी के कदमों की धीमी आवाज़ थी लेकिन ऐसा लग रहा वो लगातार पास आती जा रही है। तब मोहिनी ने घबराकर लालटेन बुझा दी। पूरा कमरा फिर से अँधेरे में डूब गया। बाहर...कदमों की आवाज़ दरवाज़े के ठीक सामने आकर रुक गई।
कुछ सेकंड तक गहरा सन्नाटा छाया रहा।फिर...किसी ने दरवाज़े के दूसरी तरफ़ से बहुत धीमी आवाज़ में कहा—"मोहिनी...""...मुझे पता है, कि तुम अंदर हो।
मोहिनी ने ध्यान से उस आवाज को पहचानने का प्रयास किया ,वह आवाज़...न रूद्र की थी और न ही भानु की थी और न ही वह किसी ऐसे व्यक्ति की थी, जिसे मोहिनी पहले से पहचानती हो ,डर के कारण उसके हाथ से डायरी लगभग छूट ही गई थी ,उसने तीव्रता से उसे संभाला क्योंकि वो सोच रही थी -कमरे के बाहर खड़ा वह आदमी कौन हो सकता है ? जो उसका नाम जानता है।
मोहिनी का सम्पूर्ण शरीर जैसे सुन्न पड़ गया ,कमरे के बाहर खड़ा वह व्यक्ति बार -बार उसका नाम लेकर पुकार रहा था।
"मोहिनी ! मुझे पता है कि तुम अंदर हो।"
मोहिनी ने अपने मुँह पर हाथ लगाकर अपनी साँस भी रोक ली।
कमरे में अब घुप्प अँधेरा था। लालटेन बुझ चुकी थी और सिर्फ़ दरवाज़े के नीचे बनी पतली दरार से बाहर की हल्की रोशनी अंदर आ रही थी। मोहिनी ने धीरे-धीरे पीछे हटते हुए डायरी को अपनी बाँहों में दबा लिया। उसका दिल इतनी जोरों से धड़क रहा था कि उसे डर था, कहीं बाहर खड़ा आदमी उसकी धड़कन ही न सुन ले।
कुछ पल तक कोई आवाज़ नहीं आई ,फिर...दरवाज़े पर हल्की सी तीन दस्तक हुई।ठक... ठक... ठक...
"डरो मत !मोहिनी "बाहर से वही आवाज़ फिर सुनाई दी। मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूँ ,अगर दुश्मन होता ,तो दरवाज़ा नहीं खटखटाता।"
मोहिनी, कुछ नहीं बोली ,वो कमरे से बाहर निकल जाना चाहती थी ,उसने कमरे के चारों ओर नज़र दौड़ाई।क्या यहाँ से बाहर निकलने का कोई दूसरा रास्ता हो सकता है? किन्तु दीवारें तो ठोस पत्थर की बनी थीं। एक कोने में लोहे की पुरानी अलमारी रखी थी ,सामने लकड़ी की मेज़ और पीछे...एक टूटी हुई पत्थर की मूर्ति ! सामने के द्वार के अलावा ,भागने का कोई अन्य मार्ग उसे दिखलाई नहीं दिया।
बाहर खड़ा वो अनजान व्यक्ति धीरे से बोला -"तुम्हारे हाथ में जो डायरी है....उसे कभी किसी' राजवीर परिवार' के सदस्य को मत देना।"
मोहिनी की आश्चर्य से आँखें फैल गईं।उस शख़्स को कैसे पता ?कि मेरे हाथ में डायरी है ? क्या वह मुझे बाहर से देख सकता है ?उसने अनायास ऊपर देखा ,छत के कोने में एक बहुत छोटा-सा छेद था।शायद...वहीं से।
उसी समय, ऊपर पुस्तकालय में भानु अब भी उस गुप्त दरवाज़े को खोलने का प्रयास कर रहा था।उसने पूरे फ़र्श की जाँच की ,दीवारों को थपथपाया। पुरानी किताबें हटाईं लेकिन कोई दूसरा रास्ता नजर नहीं आया। वह बुदबुदाया - यहां से जाने का ,कोई न कोई तरीका तो अवश्य होगा ,जब मोहिनी जा सकती है तो मैं क्यों नहीं ?
तभी उसकी नज़र एक विशाल ग्लोब पर पड़ी ,बचपन से ही वह उसे पुस्तकालय की सजावट समझता आया था लेकिन आज उसने गौर किया—'ग्लोब 'पर धूल जमी थी किन्तु एक जगह भारत के नक्शे पर नहीं, जैसे किसी ने हाल ही में उसे छुआ हो ,विराज ने हाथ बढ़ाकर ग्लोब घुमाया।घर्रररर ...की आवाज के साथ अचानक पूरी अलमारी हल्की-सी काँपी ,भानु ने उत्साहित होते हुए ग्लोब को तुरंत दोबारा घुमाया।
इस बार..लकड़ी की अलमारी धीरे-धीरे एक इंच पीछे खिसकी।भानु की साँस जैसे थम गई, प्रसन्नता से उछल पड़ा ,रास्ता ,मिल गया..."लेकिन अलमारी पूरी नहीं खुली,बीच में ही रुक गई ,जैसे दूसरी तरफ़ से किसी ने उसे लॉक कर रखा हो।
नीचे,उस गुप्त कक्ष में,मोहिनी ने पहली बार साहस करके पूछा,"आप... कौन हैं ?"
कुछ सेकंड तक बाहर से कोई जवाब नहीं आया,फिर बाहर से आवाज़ आई,"नाम जान लोगी तो, शायद मुझ पर भरोसा नहीं करोगी।"
"फिर भी बताइए !
लोग मुझे मरा हुआ आदमी कहते हैं।मोहिनी के रोंगटे खड़े हो गए।
उसे दादीसा की बात स्मरण हो आई—"कुछ सच पूरे परिवार ने दफ़न कर दिए हैं।"
क्या...क्या बाहर वही व्यक्ति खड़ा है ?,
उसी क्षण गलियारे में दूसरी दिशा से तेज़ कदमों की आवाज़ गूँजी ,इस बार आवाज़ साफ़ थी।जैसे कोई दौड़ रहा था।बाहर खड़े व्यक्ति ने तुरंत धीमे स्वर में कहा -"समय खत्म हो गया ,ध्यान से सुनो !आज डायरी मत खोलना ,पहले आख़िरी पन्ना पढ़ना...पहला नहीं।"इतना कहकर वह तेज़ी से वहाँ से चला गया।
कुछ देर तक गलियारे में सन्नाटा छाया रहा । मोहिनी भी कुछ क्षण वहीं खड़ी रहकर बाहर की टोह लेती रही ,उसके हाथ काँप रहे थे।"आख़िरी पन्ना?"कोई डायरी आख़िरी पन्ने से पढ़ने को क्यों कहेगा ?क्या उसमें कोई चेतावनी थी? या कोई ऐसा सच...जो शुरुआत पढ़ने से पहले जानना ज़रूरी है ?
उधर पुस्तकालय में...अलमारी अचानक पूरी खुल गई। सामने वही संकरी पत्थर की सीढ़ियाँ थीं। भानु ने बिना देर किए टॉर्च जलाई और उन सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा। हर कदम के साथ उसका संदेह यकीन में बदलता जा रहा था। इस हवेली में...वास्तव में एक दूसरा संसार छिपा हुआ था इस बात का उसे आश्चर्य हो रहा था,इस रास्ते का उसे आज तक पता नहीं चला। वह मोहिनी से सिर्फ़ कुछ मिनट देर से पहुँचा।
मोहिनी ने डायरी उठाई ,उसकी जिल्द चमड़े की थी ,उसके मध्य में उभरा हुआ वही चिन्ह—दो साँप उनके मध्य २ ''और उनके नीचे एक नाम ,धूल साफ़ करने पर वे अक्षर दिखलाई दिए "रत्न प्रताप राजवीर"
मोहिनी ने नाम दोहराया।"रत्न"यही वह अक्षर था...जो उसने ऊपर परिवार की पेंटिंग में देखा था।"र..."
तो क्या...जिस चेहरे को पेंटिंग से मिटा दिया गया था...वह रत्न प्रताप राजवीर था और अगर हाँ...तो उसे परिवार के इतिहास से क्यों मिटाया गया ?
उसने डायरी का आख़िरी पन्ना खोलने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि अचानक पूरी सुरंग की बिजली चली गई। चारों ओर गहन अँधकार छा गया। सिर्फ़ ऊपर कहीं दूर से...भानु के टॉर्च की हल्की रोशनी सीढ़ियों पर झिलमिलाती दिखलाई देने लगी।
मोहिनी ने, घबराकर डायरी अपने सीने से लगा ली। दोनों एक-दूसरे से सिर्फ़ कुछ ही मोड़ की दूरी पर थे।लेकिन न भानु जानता था कि मोहिनी सामने है...और न ही मोहिनी जानती थी कि उसकी ओर आने वाला व्यक्ति कोई दुश्मन नहीं...बल्कि वही आदमी है, जिसकी ज़िंदगी अब इस रहस्य से हमेशा के लिए बदलने वाली थी।
