रात के दस बज चुके थे, अभी से ही पूरी हवेली में सन्नाटा फैलने लगा। सभी नौकर भी अपने-अपने कमरों में जा चुके थे ,सिर्फ़ मुख्य प्रवेश द्वार पर सुरक्षा गार्ड तैनात हो गए थे।
'गोमती काकी' भी रसोईघर बंद कर रही थीं ,तभी उन्हें पीछे किसी की आहट सुनाई दी ,उन्होंने मुड़कर देखा ,तो कोई नहीं था, लेकिन ज़मीन पर एक मुड़ा हुआ कागज़ पड़ा था। गोमती ने कांपते हाथों से उस कागज़ को उठाया। कागज़ खोलते ही, उनका चेहरा पीला पड़ गया। उसमें सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी थी -"जिस लड़की के पास चाबी है... उसे तहखाने तक पहुँचने मत देना।"
गोमती काकी के हाथ काँपने लगे ,उन्होंने घबराकर चारों ओर देखा। रसोई पूरी तरह खाली थी, लेकिन उसे साफ़ महसूस हो रहा था...कोई तो है ,जो उसे देख रहा है। गोमती ने बिना एक पल गँवाए वह कागज़ चूल्हे की आग में डाल दिया। कागज़ जलने लगा ,लेकिन उस कागज़ में लिखे आख़िरी शब्द जलने से पहले आग में भी स्पष्ट दिखलाई दे रहे थे—"...वरना सब मर जाएँगे।"
गोमती काकी की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने धीमे से भगवान की मूर्ति की ओर देखा और विनीत भाव से प्रार्थना की "हे ठाकुरजी..! इतने साल बाद....क्या वह फिर से लौट आया है?"इसी क्षण हवेली की विशाल दीवार घड़ी ने...ग्यारह बार घंटा बजाया। ये घंटा बार -बार बजकर डराना चाह रहा है या फिर चेतावनी दे रहा है समय फिसलता जा रहा है ,अब आधी रात दूर नहीं थी।
रात के बारह बज चुके थे ,'भानुशिला' हवेली पूरी तरह से शांत थी। लंबे गलियारों में सिर्फ़ दीवार घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी। बाहर हल्की हवा के झोंके पेड़ों की डालियों हिला रहे थे और कभी-कभी किसी उल्लू की आवाज़, दूर... कहीं किसी कुत्ते के भोंकने की आवाज़, इस सन्नाटे को और भी गहरा और डरावना बना रही थी।
मोहिनी ,ने सोने का प्रयास किया किन्तु नींद न जाने कहाँ चली गयी ?तब वो बेचैनी से बिस्तर पर बैठ गयी।लेकिन उसकी नज़र बार-बार घड़ी की सुइयों पर जा रही थी। बारह...साढ़े बारह...एक...घड़ी की हर सुई के साथ उसके भीतर की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उसने कई बार खुद से ही कहा—"मैं नहीं जा पाऊँगी। यह किसी का मज़ाक भी तो हो सकता है या फिर कोई साज़िश !"
लेकिन जैसे ही वह चाबी को हाथ में लेती...उसे दादीसा की आवाज़ याद आ जाती—
"अगर इस घर में रहना... तो इस चाबी को कभी मत खोना।"
तब उसने ढृढ़ निर्णय ले ही लिया। आज वह जाएगी पता तो चले आख़िर वहां ऐसा क्या रहस्य है ?क्या मुझे अकेले ही जाना होगा ? उसके अंदर के डर ने उससे पूछा ,'हाँ ' मुझे अकेले ही जाना होगा ,उसने अपने निर्णय को और दृढ़ता दी।
उधर भानु ने अपने कमरे की सम्पूर्ण लाइटें बंद कर दीं ,ताकि बाहर से देखने पर सबको ऐसा लगे,जैसे कि वह सो चुका है, किन्तु ऐसा नहीं था वह पूरी तरह जाग कर उचित समय की प्रतीक्षा कर रहा था। उसने काली जैकेट पहनी हुई थी ,जेब में छोटी टॉर्च रखी और वही पीतल का बटन भी अपनी जेब के हवाले किया। वो अब पूरी तरह से तैयार होकर दो बजने की प्रतीक्षा में था। उसके मन में एक ही सवाल बार -बार घूम रहा था—क्या सचमुच आज रात कोई इस हवेली से गायब होगा ?या वह सिर्फ़ संयोग मात्र है?
अभी रात्रि के ठीक दो बजने में पाँच मिनट बाकी थे , मोहिनी ने धीरे से अपने कक्ष का दरवाज़ा खोला, उसने बाहर झाँका ,गलियारा पूरी तरह खाली था। उसने चारों ओर नजर दौड़ाई ,तब वह नंगे पाँव बाहर निकली ताकि किसी भी तरह की आवाज़ न हो।
चाबी उसकी मुट्ठी में थी ,जैसे-जैसे वह आगे बढ़ रही थी...उसे लग रहा था कि हवेली पहले से कुछ अलग दिख रही है। दिन में जिन रास्तों पर लोग आते-जाते थे...रात में वही रास्ते अनजान लग रहे थे।
दूर...एक खंभे की ओट में भानु खड़ा था ,शायद मोहिनी की प्रतिक्षा में ही था। उसने मोहिनी को कमरे से बाहर निकलते देख लिया था ।
यह सचमुच..ही कहीं जा रही है ,मेरा शक़ सही थी। भानु ने तय किया कि वह भी कुछ दूरी बनाकर इसका पीछा करेगा ताकि मोहिनी को उसके पीछे आने की आहट न मिले।
मोहिनी सीधे मुख्य सीढ़ियों की ओर नहीं गई वरन वह हवेली के पुराने पुस्तकालय की तरफ़ मुड़ गई ,भानु चौंका। ये इस समय लाइब्रेरी में क्या करने जा रही है ?"ये पुस्तकालय तो वर्षों पुराना है ।
पुस्तकालय की ऊँची-ऊँची लकड़ी की अलमारियों में हज़ारों किताबें रखी हुई हैं ।दिन में भी वहाँ बहुत कम लोग आते थे। रात्रि में उधर जाने का तो सवाल ही नहीं उठता। मोहिनी उस पुस्तकालय के अंदर गई और दरवाज़ा खुला ही छोड़ दिया।
भानु चुपचाप बाहर ही रुक गया।अंदर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। कुछ सेकंड बाद...उसे बहुत हल्की-सी धातु के रगड़ने की आवाज़ सुनाई दी। खट... खट...
भानु ने सावधानी से अंदर झाँका। कमरा एकदम खाली था ,उसे वहाँ कोई दिखाई नहीं दिया "मोहिनी ! उसने बहुत धीमी आवाज़ में पुकारा किन्तु उसे कोई जवाब नहीं मिला ,साहस करके वह अंदर गया। उसने आश्चर्य से चारों तरफ़ देखा , अभी कुछ क्षण पहले तो मोहिनी यहीं आई थी ,लेकिन अब...वह गायब कैसे हो गयी ? भानु के ह्रदय की धड़कनें तीव्र हो गईं ।"वो इतनी जल्दी बाहर तो नहीं जा सकती..."उसने पूरे कमरे का निरीक्षण शुरू किया।
तभी उसकी नज़र एक विशाल लकड़ी की किताबों की अलमारी पर पड़ी ,उसके एक हिस्से पर धूल कम थी ,ऐसा लग रहा था जैसे उसे हाल ही में किसी ने छुआ हो। वह आगे बढ़ा उसने अलमारी को हाथ से दबाया।किन्तु कुछ नहीं हुआ ,उसने फिर ज़ोर लगाया ,फिर भी कुछ नहीं हुआ।
उसी समय उसकी नज़र नीचे फर्श पर पड़ी। लकड़ी के फ़र्श में बिल्कुल...चाबी के आकार का एक गोल छेद वहां नजर आ रहा था। आश्चर्य से उसकी आँखें फैल गईं। हो सकता है ...वो चाबी इसी ताले की हो उसने अनुमान लगाया "लेकिन चाबी तो मोहिनी के पास है ।
इधर...अलमारी के पीछे बने गुप्त रास्ते से होते हुए मोहिनी धीरे -धीरे नीचे उतर रही थी। संकरी पत्थर की सीढ़ियाँ ज़मीन के भीतर जा रहीं थीं। दीवारों पर लगे पुराने दीये अब बुझ चुके थे ,सिर्फ़ हर दस कदम पर लगी छोटी-सी पीली बत्ती जल रही थी।उसे समझ नहीं आ रहा था—इन बत्तियों को कौन जलाता है ?
अगर इस रास्ते के बारे में किसी को पता नहीं...तो यहाँ बिजली कैसे आ रही है ?उसका हर कदम अब पहले से अधिक सावधानी भरा था।जब सीढ़ियाँ खत्म हुईं ,उसे अपने सामने एक लंबा पत्थर का गलियारा नजर आया और उसकी दीवारों पर...'राजवीर ख़ानदान' के पुराने चित्र बने हुए थे ,लेकिन एक बात बड़ी अजीब थी। हर चित्र में...किसी एक चेहरे को जानबूझकर खुरच दिया गया था।जैसे कोई नहीं चाहता था कि उसकी पहचान बची रहे।
मोहिनी ने गलियारे के अंत में एक भारी लोहे का दरवाज़ा देखा।दरवाज़े पर वही 'दो सांप और उनके मध्य २ अंक 'उभरा हुआ वही चिन्ह था। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा ,उसने काँपते हाथों से चाबी ताले में डाली। टक...ताला खुल गया।
