Kahan kho gye

  वो मेरा बालपन, मेरा बचपन !

मेरा लड़कपन , मेरा वो भोलापन,

मेरी मासूमियत ! मुझे वापस लौटा दो !

अजनबियों भीड़ में ,न जाने कहाँ खो गए ?


सपनों की नगरी में प्यार बसता जहाँ ,

रंगों से भरी , मेरी दुनिया रंगीन थी। 

वो जज़्बात ,वो बुलंद आवाज ,वो रंग !

उत्तरदायित्वों तले दब कहाँ ग़ुम हो गए ? 

मेरे सपने सुहाने ,वो बेबाक़ सी बातें  ,

वो स्वछंद हंसी ,वो प्यार ,वो विश्वास !

 वो आंगन ,माँ की गोद ,प्यारा आँचल!

वक़्त के दरिया में ,न जाने, कब बह गए ?

ठहाके लगाना, कभी हौले से मुस्कुराना,

 दोस्तों संग अंताक्षरी तो कभी पहेलियां बुझाना।

प्रसन्न हो, कभी कोई मधुर गीत गुनगुनाना।  

प्रेम की ड़गर खोजते,'हम' न जाने कहाँ खो गए ?  

प्रेम की स्याही से लिखे वो पन्ने !

यादों की ख़ाक बनकर रह गए। 

दर्द की राहों पर चलते ,अपने वो रिश्ते,

वो मस्ती आज एहसास होता, नहीं थी ,सस्ती ! 

बेख़ुदी के वो दिन आज 'परवाज़' बनकर रह गए। 

'गफ़लत' भरे वो दिन !पल भर में' छू' हो गए। 

उत्तरदायित्वों के बोझ तले दबकर 'हम 'रह गए ? 

स्मृतियों की किताब में ढूंढती हूँ ,वो दिन कहाँ खो गए ? 

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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