वो मेरा बालपन, मेरा बचपन !
मेरा लड़कपन , मेरा वो भोलापन,
मेरी मासूमियत ! मुझे वापस लौटा दो !
अजनबियों भीड़ में ,न जाने कहाँ खो गए ?
सपनों की नगरी में प्यार बसता जहाँ ,
रंगों से भरी , मेरी दुनिया रंगीन थी।
वो जज़्बात ,वो बुलंद आवाज ,वो रंग !
उत्तरदायित्वों तले दब कहाँ ग़ुम हो गए ?
मेरे सपने सुहाने ,वो बेबाक़ सी बातें ,
वो स्वछंद हंसी ,वो प्यार ,वो विश्वास !
वो आंगन ,माँ की गोद ,प्यारा आँचल!
वक़्त के दरिया में ,न जाने, कब बह गए ?
ठहाके लगाना, कभी हौले से मुस्कुराना,
दोस्तों संग अंताक्षरी तो कभी पहेलियां बुझाना।
प्रसन्न हो, कभी कोई मधुर गीत गुनगुनाना।
प्रेम की ड़गर खोजते,'हम' न जाने कहाँ खो गए ?
प्रेम की स्याही से लिखे वो पन्ने !
यादों की ख़ाक बनकर रह गए।
दर्द की राहों पर चलते ,अपने वो रिश्ते,
वो मस्ती आज एहसास होता, नहीं थी ,सस्ती !
बेख़ुदी के वो दिन आज 'परवाज़' बनकर रह गए।
'गफ़लत' भरे वो दिन !पल भर में' छू' हो गए।
उत्तरदायित्वों के बोझ तले दबकर 'हम 'रह गए ?
स्मृतियों की किताब में ढूंढती हूँ ,वो दिन कहाँ खो गए ?
