कमरे की दीवार पर लगी, बड़ी घड़ी की टिक-टिक मोहिनी के भीतर चल रहे तूफ़ान से, कहीं धीमी थी।उसने अपने को शांत करने का प्रयास भी किया और सोचा शायद सोकर अशांत मन, थोड़ा शांत होगा। किन्तु वो करवट बदलती रही, किन्तु नींद ही नहीं आई। मन ही मन सोच रही थी -ये कैसी रात थी ? कुछ घंटों पहले तक तो मैं अपने रूद्र के साथ जीवन बिताने के स्वप्न सजा रही थी ,उसने अपने हाथों की मेहँदी को देखा ,जो अभी भी रूद्र के नाम के साथ उसके हाथों में जड़ी हुई थी किन्तु क्या ये मेहँदी उसके लिए ही थी ? उसमें प्रश्नसूचक चिन्ह उसे नजर आया। पूरी रात यूँ ही निकल गयी किन्तु सो नहीं पाई कभी अपने आपको समझाती, कभी अपने मन में उठ रहे सवालों से जूझती।
वो खिड़की के पास खड़ी हवेली के उस विशाल आँगन को देख रही थी। जहाँ कुछ घंटे पहले यह आँगन रोशनी, संगीत और हँसी और मेहमानों से भरा हुआ था। अब वहाँ सिर्फ़ आधे खुले मंडप, बिखरी पंखुड़ियां और बुझती हुई सजावटी लाइटें थीं ,मुरझाते फूल एक अलग ही दास्ताँ सुना रहे थे। एक ऐसा मंडप जहाँ दो दिल मिलने से पहले ही जुदा हो गए। न जाने ,हमारे प्यार को किसकी नज़र लग गयी ?
तभी उसे दादीसा की दी हुई चाँदी की चाबी का स्मरण हो आया। उस चाबी ने कुछ क्षण के लिए उसकी परेशानियों को भुलाने में उसकी मदद की। जब वो इस कमरे में आई थी ,उसने वो चाबी अच्छे से मेज़ की दराज़ में रख दी थी। उसने वो दराज़ खोली और चाबी को बाहर निकाला ,अपने हाथों में लेकर उसे ध्यान से देखने लगी। यह साधारण चाबी तो नहीं लगती है वरना दादी सा मुझे, इस तरह पकड़ाकर न जातीं , उसने चाबी को ध्यान से देखा।
उसके ऊपर बहुत महीन नक्काशी बनी थी—दो साँप एक-दूसरे की पूँछ पकड़े हुए गोलाकार आकृति बना रहे थे, और बीच में खुदा था— २
मोहिनी धीरे से फुसफुसाई - आख़िर ये किस ताले की चाबी हो सकती है ?"
तभी किसी ने कमरे का दरवाज़ा खटखटाया ,उसने जल्दी से चाबी को अपने दुपट्टे के पल्लू में बाँध लिया ।
दरवाज़ा खोला तो सामने घर की पुरानी नौकरानी, गोमती काकी, खड़ी थीं। उनकी उम्र लगभग साठ वर्ष रही होगी। सफ़ेद बाल, झुकी हुई कमर, लेकिन आँखों में एक अजीब-सी चौकन्नी चमक,दरवाजा खोलते ही वो बोलीं -"बिटिया..."उनका स्वर धीमा था ,उन्होंने कहा - मालकिन ने आपको नीचे बुलाया है।"
मोहिनी ने सिर हिलाया और बोली - मैं अभी आती हूँ।"
गोमती काकी मुड़ीं, लेकिन दो कदम चलकर अचानक रुक गईं ,उन्होंने बिना पीछे देखे कहा -"इस हवेली में...".अगर कोई चीज़ बिना वजह आपके हाथ में आ जाये ,तो समझ लेना कि उसके पीछे बहुत बड़ा कारण होता है।"मोहिनी कुछ पूछती, उससे पहले ही काकी तेज़ी से नीचे चली गईं।
मोहिनी का दिल तेज़ी से धड़कने लगा ,इन्हें कैसे मालूम मेरे पास क्या है ? क्या गोमती काकी ने ,मेरे हाथ में वो चाबी देख ली थी ?
जब मोहिनी अपने कक्ष से नीचे बैठक में पहुंची ,तब वहां पर पूरा परिवार मौजूद था लेकिन माहौल वैसा नहीं था जैसा शादी वाले घर में होना चाहिए था। होता भी कैसे ? शादी कहाँ हो पाई ? वो तो होते -होते रह गयी।
हर किसी के चेहरे पर गंभीरता थी, कुछ रिश्तेदार रात में ही जा चुके थे।बाकी लोग धीमी आवाज़ में बातें कर रहे थे ,जैसे हवेली में कोई शोक हो।
सावित्री देवी ने मोहिनी को अपने पास बैठाया ,उनकी आँखें भी, पूरी रात रोने के कारण सूज चुकी थीं।उन्होंने मोहिनी का हाथ अपने हाथों में लिया और बोलीं -"बेटी...कल जो कुछ भी हुआ..."उसके लिए' मैं' तुमसे माफ़ी भी नहीं माँग सकती।"
रात्रि की बातें स्मरण कर मोहिनी की ऑंखें भी नम हो आईं ,वह चुप रही उसका गला रुंध गया था। उसे नहीं पता था, कि वो उन्हें जवाब क्या दे ?वो तो स्वयं अपने मन में उठ रहे, सवालों का जबाब ढूंढ़ रही थी।
तभी रणवीर सिंह ने सबकी ओर देखते हुए कहा -आज सुबह दस बजे परिवार की अंतिम बैठक होगी। वहीं तय होगा, कि आगे क्या करना है।"
एक रिश्तेदार ने पूछा - क्या लड़की के घरवालों को सब बता दिया गया है ?"
विक्रम सिंह ने गहरी साँस ली,और अपराध बोध से बोले -नहीं ,फिलहाल उन्हें यही बताया गया है कि दूल्हे की तबीयत अचानक खराब हो गई है , इसीलिए शादी टालनी पड़ी।"
"लेकिन हम ज़्यादा दिन इस सच को नहीं छिपा सकते।
मोहिनी ने पहली बार धीमे स्वर में पूछा - क्या मुझसे... किसी ने यह पूछा, कि मैं क्या चाहती हूँ।"
पूरा कमरा उसकी ओर देखने लगा।
रणवीर सिंह बोले- बेटी...! यह सिर्फ़ तुम्हारी शादी का ही मामला नहीं है।"
मोहिनी ने उनकी बात बीच में ही काट दी ,लेकिन मेरी ज़िंदगी का मामला तो है।"
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया, भानु उस कमरे में रहकर भी , दूर खिड़की के पास खड़ा हुआ था।
उसने पहली बार मोहिनी की आवाज़ में डर नहीं...बल्कि साहस देखा।
कुछ देर बाद बैठक समाप्त हुई ,मोहिनी अकेली ही उस कक्ष से बाहर निकल आई। वह हवेली के लंबे गलियारे से गुजर रही थी कि तभी अचानक उसकी नज़र एक बड़ी-सी पेंटिंग पर पड़ी। उसमें 'राजवीर परिवार की चार पीढ़ियाँ बनी थीं। वही 'राजवीर' जिसके नाम से आज भी यह ख़ानदान जाना जाता रहा है ,उन 'राजवीर' के नाम से ही संस्थाएं अभी भी चल रहीं हैं। वह ध्यान से उन चेहरों को देखने लगी।तभी उसे एक अजीब सी बात दिखलाई दी।
सबसे पीछे, तीसरी पंक्ति में...एक युवक का चेहरा बाकी लोगों से मिलता-जुलता था लेकिन उसकी तस्वीर पर हल्का-सा काला रंग फेर दिया गया था। जैसे जानबूझकर उसकी पहचान छिपाई गई हो।नीचे नाम की जगह सिर्फ़ एक अक्षर बचा था—"र..."बाकी हिस्सा खुरच दिया गया था।
मोहिनी ने हाथ आगे बढ़ाकर तस्वीर को छूना चाहा ,तभी पीछे से एक कठोर आवाज़ आई -उसे मत छूना।"वह घबराकर मुड़ी और उसने अपने पीछे देखा ,वहां' भानु' खड़ा था।
कुछ क्षण दोनों एक-दूसरे को देखते रहे ,यह उनकी आमने -सामने खड़े होकर पहली मुलाक़ात थी।
मोहिनी ने धीरे से पूछा - यह तस्वीर किसकी है?"
भानु ने बिना पेंटिंग की ओर देखे जवाब दिया - जिसका नाम इस घर में लेना मना है।"
"क्यों?"
क्योंकि कुछ लोग मरने के बाद भी, इस घर का पीछा नहीं छोड़ते।"उसका स्वर बिल्कुल सपाट था। जैसे वह कोई कहानी नहीं, एक सच्चाई बता रहा हो।
मोहिनी ने गौर किया, भानू की आँखों के नीचे काले घेरे बन गए थे ,उसकी आँखों में भी नींद की कमी स्पष्ट झलक रही थी। शायद वह भी पूरी रात नहीं सोया था।
कुछ पल बाद भानू ने कहा -कल रात बगीचे में जो कुछ भी हुआ..."...उसके लिए मुझे अफ़सोस है।"
मोहिनी ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा ,उसे उम्मीद नहीं थी कि इतना कठोर दिखने वाला यह आदमी माफ़ी भी माँग सकता है।
लेकिन उसने सिर्फ़ इतना कहा - इसमें आपकी गलती नहीं थी।"
भानू हल्का-सा मुस्कुराया, शायद पहली बार,लेकिन वह मुस्कान एक पल से ज़्यादा नहीं टिक सकी।
एक बात पूछूँ? मोहिनी ने धीरे से कहा।
"पूछिए।"
क्या आप सच में इस शादी के लिए तैयार हैं? भानू ने कुछ क्षण उसकी आँखों में देखा,फिर बोला -"नहीं।"
मोहिनी चौंक गई।
"मैं किसी ऐसे इंसान से शादी नहीं करना चाहता....जो किसी और से प्यार करता हो।"उसने एक गहरी साँस ली और मैं किसी की मजबूरी भी नहीं बनना चाहता।"
