गुजरे हुए, वो पल,अब अपने नहीं बेगाने लगते हैं।
देखती हूं , पीछे मुड़कर, जो पल इंतजार में बीते।
तुम्हारा साथ पाने की चाहत में, बेक़रारी में बीते।
बिन तुम्हारे बीते वो पल,आज, अफ़साने लगते हैं।
ढूंढती हूँ , उन पलों को ,क्या कभी हम साथ थे ?
कब पूछोगे ?कैसी हो ? मैं तुम्हारा,तुम मेरी हो।
रुसवाई कम न हुई, सिलसिला यूँ ही चलता रहा।
तमन्नों की चाहत में,अरमानों का दिया जलता रहा।
कभी वक़्त से ,कभी अपने आपसे शिक़वे किये।
इक उम्मीद !इक आस! लिए , मरती -जीती रही।
हम ,हम थे ,मैं बनकर जीती, अकेली लड़ती रही।
अकेलेपन का वो एहसास,' जख़्म' पुराने लगते हैं।
ज़ख्म तो बहुत खाएं हमने ,अब दर्द का एहसास भर है।
उम्मीदों के दिए जलाये, इंतजार रहता कब तुम मेरे होंगे ?
अपने घर- परिवार के संग, कुछ पल तो मुझे भी दोगे।
लगता ,कभी -कभी आप इश्क़ हमारा आज़माने चले हैं।
समय रेत सा फिसलता गया,मन मासूमियत खोता गया।
सुख चैन खो !हमारी बेक़रारियों का आलम बढ़ता गया।
ग़म और तन्हाई संग, सिलसिला इंतज़ार का बढ़ता गया।
सोचती थी , कब कहूँगी ? आप हमारे' दीवाने 'लगते हैं।
सभी रिश्ते थे, पर मेरे साथ रहकर भी तुम नहीं थे।
ये तकिया मेरे आंसुओं में डूब साथ निभाता रहा।
वो मेरा हमराज़ बन,अकेलेपन का मेरे साथी रहा।
इंतजार करते,उम्मीदें टूटी ,साथ तेरा स्वप्न लगता है।
कभी तन्हा बैठ ,आज जब उन पलों को सोचती हूँ।
हम दूर रहे, लगता आज भी तुम्हें पहचानती नहीं।
तुमसे मिलना, मेरी ख़ुशनुमा ज़िंदगी के पल नहीं।
आज देखती हूँ ,जब आइना,अब वो हादसे लगते हैं।
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