Kiski dulhan [part 15]

भानु ,मोहिनी और' रत्न प्रताप राजवीर 'तीनों उस कारागार में घूमते हुए ,'अभिलेख कक्ष ''में पहुंच जाते हैं।  वहां उन्हें लगता है ,शायद हमसे पहले वहां कोई था।अचानक इतने शीघ्र कहाँ जा सकता है ? यह सोचते हुए उन्होंने उस कक्ष का मुआयना किया ,तब उन्हें जाँच करने पर पता चला। उस कक्ष की एक दीवार में दरार थी। तब वो लोग उस दरार के माध्यम से उसी कक्ष से सटे दूसरे कक्ष में पहुंच जाते हैं।अब आगे - 

उस कक्ष में पहुंचकर उन्होंने देखा ,वहां एक मेज थी ,खिसकी हुई एक कुर्सी रखी थी ,जैसे कोई अभी इस कमरे से बाहर गया हो। ऐसा लग रहा था जैसे कोई लुका -छुपी का खेल, खेल रहा हो।ये लोग उसके पीछे -पीछे और वो आगे -आगे। उन्होंने आगे बढ़कर मेज़ पर रखे एक लिफ़ाफ़े को देखा,जिस पर लिखा था -भानु के लिए ! वह एक पत्र था ,जो भानु  के नाम छोड़ा गया था। 

भानु के लिए...मोहिनी एकदम से बोल उठी। 


"मेज़ पर रखा सफ़ेद लिफ़ाफ़ा कमरे की जलती लालटेन की रोशनी में साफ़ दिखलाई दे रहा था। तीनों कुछ क्षण वहीं खड़े रहे ,कमरे में ऐसी खामोशी थी कि तीनों की साँसों की आवाज़ तक सुनाई दे रही थी।

रत्न प्रताप ने अपने हाथ से भानु को इशारा किया ,भानु ने धीरे-धीरे लिफ़ाफ़े की ओर कदम बढ़ाया। इस बार रत्न प्रताप ने उसे कुछ नहीं  कहा ।

वे बस गहरी नज़रों से लिफ़ाफ़े को देखते रहे।

मोहिनी ने धीमे स्वर में पूछा -"क्या इसे खोलना ठीक रहेगा ?"

रत्न प्रताप  ने पहली बार बिना झिझक उत्तर दिया—"अगर यह तुम्हारे नाम होता"...तो मैं मना करता ,लेकिन यह भानु  के नाम है ,अंतिम निर्णय भी उसी का होगा।"

भानु कुछ क्षण सोचता रहा ,फिर उसने बड़ी सावधानी से लिफ़ाफ़ा उठा लिया।उस पर धूल का एक कण भी नहीं था ,जैसे वह कुछ ही देर पहले वहाँ रखा गया हो। 

भानु ने बड़ी सावधानी से उसकी सील खोली ,उसमें अंदर सिर्फ़ एक कागज़ था - न कोई हस्ताक्षर ,न तारीख़ ! सिर्फ़ कुछ पंक्तियाँ—"अगर यह पत्र तुम्हारे हाथ तक पहुँच गया है, तो समझो, तुमने वह रास्ता चुन लिया है जिससे अब वापस लौटना आसान नहीं।"अपने पिता से प्रेम करना...लेकिन उन पर आँख बंद करके भरोसा मत करना और सबसे बड़ी बात—जिस लड़की के साथ तुम इस समय खड़े हो...उसी की वजह से 'राजवीर परिवार' बचेगा भी... और टूटेगा भी।"ये सब पढ़कर भानु  का हाथ काँप गया। उसने धीरे से पत्र नीचे कर दिया।

मोहिनी उसकी ओर देखने लगी,आगे बढ़कर पूछा -इसमें क्या लिखा है?"

भानु ने पूरा पत्र मोहिनी को  दे दिया, मोहिनी ने पढ़ा...तो उसका चेहरा भी बदल गया।वो भी उस पत्र के विषय में क्या कहे ?

रत्न प्रताप कुछ पल तक चुप रहे ,फिर बोले -जिसने भी यह पत्र लिखा है....उसे मालूम था कि तुम दोनों यहाँ आओगे।"

उसी समय...मेज़ के नीचे से हल्की-सी टिक... टिक... टिक... की आवाज़ आने लगी। भानु  नीचे  झुककर देखने लगा। वहां एक पुरानी जेब घड़ी रखी थी ,घड़ी बंद थी...फिर भी उसकी सेकंड वाली सुई चल रही थी।

मोहिनी ने हैरानी से पूछा - यह कैसे हो सकता है ?"

रत्न प्रताप  का चेहरा भी गंभीर हो गया ,उन्होंने तुरंत वो घड़ी उठाई ,पीछे का ढक्कन खोला।अंदर घड़ी का कोई मशीनरी हिस्सा नहीं था ,उसकी जगह एक छोटी-सी चाबी लगी थी और उसके साथ एक मुड़ा हुआ नक्शा ! रत्न प्रताप ने बड़े हौले से वो नक्शा बाहर निकाला और वो नक्शा मेज पर फैलाया।

ये तो'भानुशिला हवेली ''का नक्शा है। 

भानु ने हवेली का  ऐसा नक्शा, पहले कभी नहीं देखा था।उसमें हवेली के नीचे कई गुप्त सुरंगें बनी हुई थीं।कुछ सुरंगों पर लाल स्याही से निशान लगाए गए थे। एक जगह बड़े अक्षरों में लिखा था—"सुरक्षित" दूसरी जगह—"मत जाना"और सबसे नीचे...एक गोल निशान पर सिर्फ़ एक शब्द लिखा था—"सभा।"

भानु ने कहा -सभा ,ये सभा क्या है ?

रत्न प्रताप ने एक गहरी साँस ली और बोले "यहीं पर...रक्षक मंडल की बैठक होती थी।"

"थी "मोहिनी ने तुरंत पूछा।

रत्न प्रताप ने उसकी ओर देखा ,या शायद...अब भी होती है।"

इतने में...कमरे के बाहर किसी धातु के गिरने की तेज़ आवाज़ आई -खननन...! तीनों तुरंत सतर्क हो गए।भानु ने टॉर्च तुरंत बंद कर दी।

रूद्र प्रताप ने लालटेन की लौ धीमी कर दी ,कुछ क्षण बाद...बाहर किसी आदमी की आवाज़ सुनाई दी - कमरा खाली है।"

दूसरी आवाज़ आई—ध्यान से देखो !

"मुझे यकीन है....वह बूढ़ा यहीं कहीं छिपा होगा।"

मोहिनी  ने घबराकर भानु की ओर देखा ,इस बार भानु ने उसका हाथ थाम लिया। उसकी पकड़ पहले से कहीं अधिक दृढ़ थी। बिना कुछ कहे उसने संकेत दिया—मैं हूँ ! न... 

रत्न प्रताप कमरे के कोने में गए ,उन्होंने दीवार में लगी, एक पतली लोहे की रॉड खींची -घर्र...

मेज़ के पीछे का पत्थर धीरे-धीरे हटने लगा ,उसके पीछे एक बेहद संकरा रास्ता दिखाई दिया। चलो ,जल्दी अंदर !तीनों उस रास्ते में घुस गए ,जैसे ही वे अंदर पहुँचे...पत्थर फिर अपनी जगह बंद हो गया। बाहर से देखने पर ऐसा लग रहा था जैसे वहाँ कोई रास्ता था ही नहीं।

कुछ ही सेकंड बाद...दो नकाबपोश आदमी कमरे में दाखिल हुए ,वे सीधे मेज़ तक पहुँचे। पहले आदमी ने खाली लिफ़ाफ़ा उठाया।उसकी आँखें सिकुड़ गईं ,लिफाफे को हिलाकर दिखाते हुए कहता है -"कोई हमसे पहले यहाँ पहुँच चुका है।"

दूसरे ने पूछा -अब क्या करें?"

पहले आदमी ने धीमे स्वर में कहा -आज रात से योजना बदल जाएगी ,लड़की को ज़िंदा पकड़ना है और उस लड़के पर नज़र रखो !"

उसे अभी कुछ नहीं होना चाहिए ,ऊपर से आदेश है ,कमरे में उन्हें और कुछ नहीं मिला ,दोनों वापस मुड़ गए।उनके कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे दूर होती चली गई।

पत्थर के पीछे बने गुप्त रास्ते में तीनों बिल्कुल चुपचाप  खड़े थे ,मोहिनी की आँखों में डर था क्योंकि उन्होंने उन दोनों आदमियों की बातें सुन ली थी। वे मुझे क्यों पकड़ना चाहते हैं ?उसने रत्न प्रताप की तरफ देखकर पूछा। 

रत्न प्रताप  ने उसकी ओर देखा ,और बोला -क्योंकि...तुम्हें अभी तक खुद नहीं पता कि तुम कौन हो ?"

मोहिनी स्तब्ध रह गई ,"क्या मतलब ?"

रत्न प्रताप ने उत्तर देने के लिए होंठ खोले ही थे...कि अचानक भानु ने दीवार पर कुछ देखा और बोला -यहाँ आइये ! यहाँ कुछ है। 

उसने उस पर टॉर्च की हल्की रोशनी डाली। वहां पत्थर पर वर्षों पुरानी एक उकेरी हुई पंक्ति थी—"राजवीर परिवार का सबसे बड़ा झूठ....खून के रिश्ते से जुड़ा है।उसके ठीक नीचे...तीन नाम खुदे हुए थे—रत्न प्रताप ,विक्रम और तीसरा नाम...जानबूझकर किसी धारदार हथियार से पूरी तरह मिटा दिया गया था।

रत्न प्रताप  की आँखें उस मिटे हुए नाम पर टिक गईं ,उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—जिस दिन यह नाम फिर से पढ़ा जाएगा...उसी दिन इस परिवार का इतिहास बदल जाएगा।"इतना कहकर उन्होंने सुरंग के और भीतर जाने का इशारा किया।

उन्हें नहीं पता था...कि कोई तीसरा व्यक्ति भी उसी गुप्त रास्ते में, उनसे कुछ ही दूरी पर, साँस रोके अँधेरे में छिपा हुआ खड़ा था...और उसकी निगाहें लगातार मोहिनी पर टिकी हुई थीं।

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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