कोई भी... पीछे मुड़कर मत देखना।"रत्न प्रताप राजवीर ने, बहुत धीमी आवाज़ में दोनों को चेतावनी दी थी, उसमें ऐसा भय था, कि मोहिनी और भानु दोनों वहीं ठिठक गए।
गलियारे में फिर वही कदमों की आवाज़ गूँजी -ठक...ठक...ठक...
अजीब बात यह थी, कि आवाज़ बिल्कुल उनके पीछे से आ रही थी, लेकिन तीनों को अपने पीछे किसी की साँस तक महसूस नहीं हो रही थी।
डर के कारण मोहिनी का गला सूख गया, उसने धीरे से पूछा-"रत्न प्रताप जी...ये कौन हो सकता है? हमारा मित्र या शत्रु "
रत्न प्रताप ने कोई उत्तर नहीं दिया ,उन्होंने सिर्फ़ अपना दाहिना हाथ उठाकर चुप रहने का इशारा किया।करीब तीस सेकंड तक तीनों बिल्कुल स्थिर खड़े रहे।फिर...कदमों की आवाज़ आना अचानक बंद हो गई।पूरा कारागार फिर उसी गहरे सन्नाटे में डूब गया।
सिर्फ़ छत से टपकती पानी की बूँदें सुनाई दे रही थीं ,टप...टप...टप...
रत्न प्रताप ने बहुत धीरे से कहा -अब तुम लोग मुड़ सकते हो।"
भानु सबसे पहले पलटा ,जैसे ही उसने पीछे मुड़कर देखा तो पीछे लंबा गलियारा खाली था ,न कोई आदमी ,न कोई परछाईं ,न ही कोई दरवाज़ा खुला। ऐसा लग रहा था ,जैसे वहाँ कभी कोई था ही नहीं। ऐसा कैसे हो सकता है ,जो हमारे पीछे -पीछे चल रहा था ,वो अचानक ग़ायब कैसे हो सकता है ?
मोहिनी ने भी, राहत की साँस ली, लेकिन उसके चेहरे पर उलझन स्पष्ट नजर आ रही थी।"अगर कोई नहीं था...तो फिर वो कदमों की आवाज़ ?"दोनों ने अपने प्रश्न का उत्तर जानने के लिए रत्न प्रताप सिंह की तरफ देखा।
उनको इस तरह अपनी ओर देखते हुए रत्न प्रताप कुछ क्षण चुप रहे ,फिर बोले - इस' कारागार' की सबसे बड़ी ताकत इसकी दीवारें नहीं...इसकी बनावट है।"
क्या ??जैसे उन्हें कुछ समझ नहीं आया ,दोनों अपना जबाब पाने के लिए उनकी ओर देखने लगे।
"यह पूरा हिस्सा इस तरह बनाया गया है कि आवाज़ें कई बार दिशा बदल देती हैं। जो आवाज़ आगे से आती है....वह पीछे सुनाई देती है।"जो ऊपर होती है..."...वह नीचे महसूस होती है।"
भानू ने गहरी साँस ली ,तो इसका मतलब...कोई इंसान तो था।"
रत्न प्रताप ने सिर हिलाया -"हाँ"और वह हमसे ज़्यादा दूर भी नहीं है।"
तीनों आगे बढ़े ,अब गलियारा पहले से चौड़ा हो चुका था।दीवारों पर पुराने लोहे के हुक लगे थे, जिन पर कभी लालटेन टांगी जाती होगी। कई जगहों पर दीवारों में छोटे-छोटे खाने बने थे [पुराने ज़माने में सामान रखने के लिए दीवार में ही ऐसा स्थान बनाया जाता था ,जिनमें सामान रखा जा सकता था ,उन्हें वो लोग ''आला ''बोलते थे ] ऐसी ही यहाँ भी दीवार में छोटे -छोटे कई खाने बने हुए थे ,उनमें कुछ पुराने मिट्टी के बर्तन रखे हुए थे।
एक जगह मोहिनी रुक गई।दीवार पर किसी ने वर्षों पहले नाखून से खुरच कर एक तारीख़ खोदी थी—17 अगस्त 1998
उसके नीचे लिखा था—"आज मुझे यहाँ लाए, तीन दिन हो गए। अगर कोई यह पढ़े... तो मेरी बेटी से कहना 'कि उसका पिता चोर नहीं था।'मोहिनी की आँखें नम हो गईं ,और बोली - निरपराध होते हुए, इन लोगों ने कितना कुछ सहा है, आखिर इन लोगों का अपराध क्या था?"
रत्न प्रताप ने बहुत धीमे स्वर में कहा -"सवाल पूछना,"बस इतना ही।"
भानु ने उनकी ओर देखा ,आप कहना क्या चाहते हैं? कि इस परिवार ने निर्दोष लोगों को यहाँ कैद किया है ?"
रत्न प्रताप ने सीधे उत्तर नहीं दिया ,उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा -जिस परिवार के पास पैसे की ताकत होती है....''वह कई बार कानून से पहले अपना फैसला सुनाने लगता है ,मेरा मतलब है ,कानून को भी अपने हाथ में ले लेता है। "
कुछ दूर चलने के बाद उन्हें एक बड़ा लोहे का फाटक दिखाई दिया।फाटक पर जंग लगी थी।ऊपर पीतल की पट्टिका लगी थी।उस पर लिखा था—"अभिलेख कक्ष"
भानु ने आश्चर्य से पूछा -"क्या जेल में भी' रिकॉर्ड रूम' होता है ?"
रत्न प्रताप हल्का-सा मुस्कुराए और बोले - यहाँ हर कैदी का हिसाब रखा जाता था। उसका "नाम ! अपराध ,सजा !और...जिस दिन वह यहाँ से गायब हुआ।"
"गायब ! मोहनी ने तुरंत पूछा - मरा नहीं ?या उसकी सज़ा कभी पूरी नहीं हुई। रत्न प्रताप की आँखों में एक अजीब-सी चमक आई ,बोला -यही तो सबसे बड़ा सवाल है।"
फाटक अंदर से बंद नहीं था ,भानु ने उसे धीरे से धक्का दिया -चर्रर...दरवाज़ा खुलते ही धूल का बादल हवा में फैल गया।कमरे के अंदर चारों तरफ़ लकड़ी की ऊँची -ऊँची अलमारियाँ थीं। हर अलमारी में सैकड़ों मोटी फ़ाइलें रखी थीं। उन पर साल लिखे थे। सन 1972 से लेकर 1978, सन 1985से लेकर 1991और 1998
मोहिनी की नज़र सीधा आख़िरी शेल्फ़ पर गई।वहाँ सिर्फ़ एक ही फ़ाइल रखी थी।उस पर मोटे अक्षरों में लिखा था—"गोपनीय"वह आगे बढ़ी ,लेकिन जैसे ही उसने फ़ाइल उठाने के लिए हाथ बढ़ाया—
रत्न प्रताप ने उसका हाथ पकड़ लिया -"रुको।"
"क्यों?"
"पहले यह समझ लो ! कि तुम क्या उठाने जा रही हो।"उन्होंने धीरे से कहा -यह सिर्फ़ कागज़ नहीं है..."यह ऐसे लोगों के नाम हैं जिन्हें दुनिया भूल चुकी है।"
उसी समय भानु की नज़र कमरे के दूसरे कोने में गई। वहाँ एक पुरानी लोहे की अलमारी थी ,लेकिन उस पर धूल बिल्कुल नहीं थी। जैसे उसे हाल ही में खोला गया हो।उसने धीरे से उसका हैंडल घुमाया।अलमारी खुल गई।अंदर फ़ाइलें नहीं थीं,सिर्फ़ एक पुराना कोट टंगा हुआ था और एक लालटेन और मेज़ पर रखा था—एक चाय का कप ! कप को छूते ही, भानु चौंक गया।
"रत्न प्रताप जी..."
"यह...अभी भी गर्म है।"कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया।
मोहिनी ने अविश्वास से कप को देखा ,इसका मतलब साफ़ है ,हमारे यहाँ आने से कुछ ही मिनट पहले...कोई इस कमरे में मौजूद था।
भानु का चेहरा अचानक गंभीर हो गया। उसने बिना समय गंवाए कहा -हम देर कर चुके हैं ,वह यहाँ था...".और शायद अभी भी यहीं कहीं है।"
तभी...कमरे के बिल्कुल पीछे वाली दीवार से किसी के खाँसने की आवाज़ आई।तीनों एक साथ उधर मुड़े।दीवार बिल्कुल सपाट थी ,न कोई दरवाज़ा ,न कोई खिड़की ,लेकिन खाँसी दोबारा सुनाई दी।
खँ... खँ...
भानु ने टॉर्च दीवार पर डाली ,तभी उसे ईंटों के मध्य एक बहुत महीन दरार दिखाई दी ,जैसे उसके पीछे कोई और कमरा हो।
रत्न प्रताप धीरे-धीरे उस दीवार के पास पहुँचे ,उन्होंने हाथ से एक ढीली ईंट दबाई।अचानक पूरी दीवार काँपने लगी ,घर्ररर...पत्थर धीरे-धीरे एक तरफ़ खिसकने लगे।दीवार के पीछे...एक और कमरा था।
लेकिन यह कमरा बाकी कारागार से बिल्कुल अलग था ,यह साफ़-सुथरा था।मेज़ पर ताज़ा जलती हुई लालटेन रखी थी। कुर्सी पीछे खिसकी हुई थी,जैसे कोई अभी-अभी उठकर गया हो और मेज़ के बीचों-बीच...एक सफ़ेद लिफाफ़ा रखा था।उस पर सिर्फ़ तीन शब्द लिखे थे—
"भानु के लिए..."तीनों की साँसें एक साथ थम गईं।
