Adhuri padhi kitaab

 ज़िंदगी सी वो अधूरी किताब !जो जीवन जिया। 

 कुछ पन्ने पढ़ लिए , कुछ पढ़ने  अभी बाक़ी हैं ।

 उस किताब में ,कुछ पन्ने ग़म और तन्हाई के हैं।  

 कुछ पन्ने उमंगों में डूबे ,तो कुछ अश्रुओं में भीगे।



कई बार स्वप्न जगाती हैं,अनुभव सी ज्ञान दे जाती हैं। 

जब  जीवन पूर्ण नहीं, हर किताब अधूरी रह जाती है। 

अधूरे पन्ने पूर्ण होते ही , वो क़िताब भी पूर्ण हो जाती है।

 किन्तु पढ़ने को, उसकी वो किताब अधूरी रह जाती है।


कुछ पन्ने रच-बस गए ,क़िताब कई बार रूह छू जाती है  

किसी की यादों में बसी उसकी' छवि' , कौन समझा ?

 नायक का जीवन और उसको ! हर रोज़ उसे पढ़ना है।  

जाने कितनी आशा ,कितनी उम्मीदें अनकही रह जाती हैं।  


 रह जाते कुछ अरमान अधूरे, कुछ शिक़वे !कुछ ख़ामोशी !

 दफ़्न हो जाते,सिमटकर रह जाते,दास्ताँ उसके जीवन की। 

 जिन पन्नों को पढ़ा नहीं ,क़िताब में किसी ने जीवन गढ़ा नहीं , 

कितना भी पढ़ लो !' क़िताब ज़िंदगी की'अधूरी रह जाती है।


कुछ पन्ने धूमिल हुए ,कुछ वक़्त संग पीले हुए । 

करनी थी ,जो पूरी चाहतें , ख़्वाहिशें अधूरी रह जाती हैं।

पढ़नी जितनी भी चाही , वो क़िताब !अधूरी रह जाती है।

 उलझन में,उलझे ख़्वाबों की ताबीर अधूरी रह जाती है।         

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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