ज़िंदगी सी वो अधूरी किताब !जो जीवन जिया।
कुछ पन्ने पढ़ लिए , कुछ पढ़ने अभी बाक़ी हैं ।
उस किताब में ,कुछ पन्ने ग़म और तन्हाई के हैं।
कुछ पन्ने उमंगों में डूबे ,तो कुछ अश्रुओं में भीगे।
कई बार स्वप्न जगाती हैं,अनुभव सी ज्ञान दे जाती हैं।
जब जीवन पूर्ण नहीं, हर किताब अधूरी रह जाती है।
अधूरे पन्ने पूर्ण होते ही , वो क़िताब भी पूर्ण हो जाती है।
किन्तु पढ़ने को, उसकी वो किताब अधूरी रह जाती है।
कुछ पन्ने रच-बस गए ,क़िताब कई बार रूह छू जाती है
किसी की यादों में बसी उसकी' छवि' , कौन समझा ?
नायक का जीवन और उसको ! हर रोज़ उसे पढ़ना है।
जाने कितनी आशा ,कितनी उम्मीदें अनकही रह जाती हैं।
रह जाते कुछ अरमान अधूरे, कुछ शिक़वे !कुछ ख़ामोशी !
दफ़्न हो जाते,सिमटकर रह जाते,दास्ताँ उसके जीवन की।
जिन पन्नों को पढ़ा नहीं ,क़िताब में किसी ने जीवन गढ़ा नहीं ,
कितना भी पढ़ लो !' क़िताब ज़िंदगी की'अधूरी रह जाती है।
कुछ पन्ने धूमिल हुए ,कुछ वक़्त संग पीले हुए ।
करनी थी ,जो पूरी चाहतें , ख़्वाहिशें अधूरी रह जाती हैं।
पढ़नी जितनी भी चाही , वो क़िताब !अधूरी रह जाती है।
उलझन में,उलझे ख़्वाबों की ताबीर अधूरी रह जाती है।
