कबीर हताश, निराश, टहलते हुए , सागर किनारे आकर बैठ गया। मन ही मन सोच रहा था, इस जीवन का क्या करूं ? जो चाहता हूं, वह होता नहीं है , जो करना चाहता हूं, पर कर नहीं पाता हूं। माता-पिता की इच्छाओं को भी पूर्ण नहीं कर पा रहा हूं। उन पर जैसे बोझ बन गया हूं। कई विचार उसके मन में आ जा रहे थे , वह जीवन से निराश हो चला था।
कबीर पढ़- लिखकर कुछ बनना चाहता था। वो अपने परिवार के लिए कुछ करना चाहता था। इतने परिश्रम से माता-पिता ने उसको, पढ़ाया लिखाया किंतु जब नौकरी ढूंढने के लिए निकला तो नौकरी नहीं मिली। न जाने किस्मत कहीं जाकर सो गयी या फिर मेरी शिक्षा में ही कोई कमी रह गयी। हालाँकि वो इन विचारों को मानता नहीं है किन्तु निराशा ,न जाने क्या -क्या सोचने पर विवश कर देती है ?उसे लगता पढ़ाई में तो कोई कमी नहीं है, 90% अंक लाकर उसने, अपने आप को इस मुकाम तक पहुंचाया है किन्तु मंज़िल अभी भी दूर नजर आ रही है। मेरी शिक्षा में कैसे कमी रह सकती है ? मेरे परिश्रम में भी कोई कमी नहीं थी किंतु जितनी बार भी, साक्षात्कार के लिए जाता, निराश होकर वापस लौट आता, न जाने, इन लोगों को कैसा उम्मीदवार चाहिए ?
जब भी, वह साक्षात्कार के लिए जाता उसे अगली कंपनी में कुछ नई ही मांग उसके लिए होती, समझ ही नहीं आ रहा था मेरे साथ क्या हो रहा है उधर माता-पिता की उम्मीद पर जैसे वह खड़ा नहीं उतर रहा था। इस कारण वह और निराश हो जाता, प्रतिदिन मां और पिता उम्मीद लगाए उसकी तरफ देखते, कई बार पूछते -बेटा !नौकरी का क्या रहा ? लेकिन उसके पास कोई जवाब नहीं था। कैसे कहता ? अब नौकरी मिलना इतना सरल नहीं है।
हर इंसान नौकरी करना चाहता है। मैं व्यापार भी कर लूं तो व्यापार के लिए पैसा भी तो चाहिए। अब माता-पिता ने इतना पढ़ा लिखा कर इस लायक़ बनाया है कि ''अपने पैरों पर खड़ा हो सकूँ।'' अब मैं काम भी क्या करूंगा ? ऐसा कोई काम तो मुझे आता ही नहीं है।
देखते ही देखते दो बरस बीत गए, अब तो उम्मीद भी थकने लगी थी। आज तो कबीर निराशा ही हो गया था। सागर की लहरें, धीरे से आतीं, उसके पैरों को छूकर वापस लौट जातीं , किंतु कबीर का उसकी अठखेलियों में कोई ध्यान नहीं था। वह तो निराशा से उस सागर तट पर आकर बैठ गया था।
धीरे-धीरे पानी के ठंडीं लहरों का उसके पैरों को आभास होने लगा। अब वह अपनी परेशानियों से उबर कर, उन्हें देखने लगा, एक' छोटी लहर' आती, वह उसे छू न पाती, तब दूसरी एक बड़ी लहर आती, और उसके पैरों को छूकर वापस लौट जाती, उनकी यह छेड़छाड़ देखकर कबीर का मन,प्रफुल्लित हो उठा ,वो कुछ देर के लिए ही सही, अपनी परेशानी को भूलने लगा ,उसके मनोभाव परिवर्तित होने लगे ।
लहरों का इस तरह उसके साथ खेलना अब उसे अच्छा लग रहा था। कुछ पल के लिए वह अपनी परेशानियां भूल गया था। तभी उसे लगा -जैसे कोई लहर उससे बात कर रही है ,वो कह रही है - कबीर क्यों परेशान हो ?
देखो ! मैं तो ''छोटी सी लहर'' हूं , इतने बड़े सागर में भी खुश रह लेती हूं। मैं, तुम्हें छू नहीं पा रही थी किंतु मैंने अपनी सखी को साथ में लिया और बड़ी लहर बन गई , और मेरी जिद्द तुम्हें छूना था और तुम्हें छू भी लिया। ऐसी परेशानियां तो हर मनुष्य के जीवन में आती हैं , किंतु वो प्रयास करना तो नहीं छोड़ते, निराश नहीं होते। जीवन तुमसे कभी सुख के साथ कभी दुख के साथ खेलता है तुम्हें निराश नहीं होना चाहिए। यही समय है ,तुम्हें और मजबूत होना होगा। अपने मम्मी -पापा का तो ख़्याल करो !जो तुमसे उम्मीदें लगाए बैठे हैं।
तुम अपनी ही नहीं अपने माता-पिता की भी तो सोचो ! वो मां प्रतिदिन तुम्हारे लिए प्रातः काल उठकर भोजन बनाती है ,पिता कमाने निकल जाते हैं , तुम उनकी इकलौती संतान हो। मैं जानती हूं, सागर किनारे तुम निराश होकर आए थे। हो सकता है, तुम्हारा इरादा कुछ और भी हो ,मैं समझ सकती हूं, मेरे किनारे बहुत से लोग हताश होकर यहाँ आते हैं ,कई बार जान दे भी देते हैं। किंतु मेरा तो यही प्रयास रहता है ,मैं उन्हें एक सकारात्मक सोच के साथ वापस लौटा दूँ किंतु बहुत से, बहुत जिद्दी होते हैं मेरी सुनते ही नहीं।
किंतु फिर भी मैं निराश नहीं होती और अपना कर्तव्य नहीं भूलती,मनुष्य को हमेशा प्रयत्नशील रहना चाहिए। तुम्हें अपने माता-पिता के लिए, अपनी नई शुरुआत के लिए वापस लौटना ही होगा। अपने लिए नहीं अपने माता-पिता के लिए ही वापस लौटना होगा। नए उत्साह के साथ, तुम फिर से अपना प्रयास जारी रखो ! और देखना , एक दिन तुम'' बड़ी लहर ''बन जाओगे तब मुझे भूल मत जाना ! तब भी तुम मेरे करीब आना और अपनी खुशियां बाँट लेना, मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी।
कबीर एकदम से उठा ,जैसे सोते से जागा हो। वो सोच रहा था ,क्या सच में लहर मुझसे बात कर रही थी ? उसने सच ही तो कहा है ,जीवन में उतार-चढ़ाव तो लगा ही रहता है। मुझे एक बड़ी लहर बनना है , यह सोचकर वह फिर से नए उत्साह के साथ अपने घर की तरफ लौट पड़ा।
