Beej ka svapn

 रहा !' बीज 'का स्वप्न अद्भुत !

माटी के गर्भ में सोया,

'बीज' स्वप्न देख रहा था।

 बाहर आ,'अंधकार' से,

' प्रकाश' खोज रहा था। 


 कब' मैं' माटी से बाहर,

आ.. अंकुरित होऊंगा ? 

कब मज़बूत जड़ें होगी ?

बिन,आलंबन खड़ा होऊँगा। 

अस्तित्व जुड़ा, इस माटी से,

हरी -भरी मेरी शाखाएं होगीं । 

पुष्पित,फलों सेआच्छादित होंगी। 

''अबोध बीज'' दिवास्वप्न देख रहा था। 

तब माटी ने....समझाया उसको,

 जीवन नहीं आसान, बतलाया उसको। 

समझ ले, सुख संग दुःख भी सहना होगा। 

गर्मी हो या तूफाँ ! तुझे अड़िग रहना होगा। 

शीत ऋतु आए , तुझको आश्रय देना होगा। 

परहित में ,  सर्वस्व समर्पित करना होगा। 

हरी- भरी धरा रहे ,फलो- फूलों तुम !

हृदय से' विशाल' वृक्ष, तुमको बनना होगा। 

जीवन तुम्हारा,' पर'परोपकार करना होगा।

आशीष ले ,धरा से 'बीज 'तब बाहर आया।  

 अंकुरित हुआ, बीज मन ही मन हर्षाया। 

'सूर्योदय की किरणों'' का,लाभ उठाया।  

अपनी असीम शक्ति को, जगाया। 

' परहित' कर जीवन सफल बनाया। 

देख धरा की हरीतिमा, मन ही मन हर्षाया। 

स्वप्न 'बीज' का पल्ल्वित हो,आगे वंश बढ़ाया। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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