रहा !' बीज 'का स्वप्न अद्भुत !
माटी के गर्भ में सोया,
'बीज' स्वप्न देख रहा था।
बाहर आ,'अंधकार' से,
' प्रकाश' खोज रहा था।
कब' मैं' माटी से बाहर,
आ.. अंकुरित होऊंगा ?
कब मज़बूत जड़ें होगी ?
बिन,आलंबन खड़ा होऊँगा।
अस्तित्व जुड़ा, इस माटी से,
हरी -भरी मेरी शाखाएं होगीं ।
पुष्पित,फलों सेआच्छादित होंगी।
''अबोध बीज'' दिवास्वप्न देख रहा था।
तब माटी ने....समझाया उसको,
जीवन नहीं आसान, बतलाया उसको।
समझ ले, सुख संग दुःख भी सहना होगा।
गर्मी हो या तूफाँ ! तुझे अड़िग रहना होगा।
शीत ऋतु आए , तुझको आश्रय देना होगा।
परहित में , सर्वस्व समर्पित करना होगा।
हरी- भरी धरा रहे ,फलो- फूलों तुम !
हृदय से' विशाल' वृक्ष, तुमको बनना होगा।
जीवन तुम्हारा,' पर'परोपकार करना होगा।
आशीष ले ,धरा से 'बीज 'तब बाहर आया।
अंकुरित हुआ, बीज मन ही मन हर्षाया।
'सूर्योदय की किरणों'' का,लाभ उठाया।
अपनी असीम शक्ति को, जगाया।
' परहित' कर जीवन सफल बनाया।
देख धरा की हरीतिमा, मन ही मन हर्षाया।
स्वप्न 'बीज' का पल्ल्वित हो,आगे वंश बढ़ाया।
