Waqt ke sath

जीवन ड़गर पर चल तू मुसाफ़िर ! चल वक़्त के साथ !

 न वक़्त तेरा ,न ये जीवन,वक़्त पर न किसी का पहरा। 

गया वक़्त !न आया हाथ ,वास्ते किसी के न ठहरा कभी।

 अरमान भी मचले बहुत , ठहर गए तूफाँ' वक़्त के साथ।'

  


वक़्त रूप बदलता है , सुख -दुःख की छाँव में पलता  है। 

वक़्त एहसास दिलाता है ,चला न  जो  संग पिछड़ता है। 

वक़्त की क़द्र न जो करे , वक़्त ही कहाँ उसे पूछता है ?

दिलों में हिलोर सी उठी, पलते रहे स्वप्न' वक़्त के साथ। 

 

आज जीवन में छाई बदरी , कल उजास होगा। 

आज है ,ग़मों का अँधियारा ,कल प्रकाश होगा।

 बचपन ,जवानी ,बुढ़ापा वक़्त संग ढलता जाता है।

ठोकरें भी बहुत लगीं ,अक़्ल भी आई वक़्त के साथ।

 

 वक़्त संग जो चला ,वक़्त उसका सच्चा हमसफ़र रहा।

देख रिश्तों के रंग, गलियों से गुजरता और कुढ़ता रहा। 

 वक़्त से पिछड़ गया, पछतावे के सिवा न कुछ आया हाथ।  

चेहरों के मुखौटे बदलते रहे ,रंग दिखाते रहे वक़्त के साथ। 

  

 

    

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post