जीवन ड़गर पर चल तू मुसाफ़िर ! चल वक़्त के साथ !
न वक़्त तेरा ,न ये जीवन,वक़्त पर न किसी का पहरा।
गया वक़्त !न आया हाथ ,वास्ते किसी के न ठहरा कभी।
अरमान भी मचले बहुत , ठहर गए तूफाँ' वक़्त के साथ।'
वक़्त रूप बदलता है , सुख -दुःख की छाँव में पलता है।
वक़्त एहसास दिलाता है ,चला न जो संग पिछड़ता है।
वक़्त की क़द्र न जो करे , वक़्त ही कहाँ उसे पूछता है ?
दिलों में हिलोर सी उठी, पलते रहे स्वप्न' वक़्त के साथ।
आज जीवन में छाई बदरी , कल उजास होगा।
आज है ,ग़मों का अँधियारा ,कल प्रकाश होगा।
बचपन ,जवानी ,बुढ़ापा वक़्त संग ढलता जाता है।
ठोकरें भी बहुत लगीं ,अक़्ल भी आई वक़्त के साथ।
वक़्त संग जो चला ,वक़्त उसका सच्चा हमसफ़र रहा।
देख रिश्तों के रंग, गलियों से गुजरता और कुढ़ता रहा।
वक़्त से पिछड़ गया, पछतावे के सिवा न कुछ आया हाथ।
चेहरों के मुखौटे बदलते रहे ,रंग दिखाते रहे वक़्त के साथ।
