चिड़ियों की चहचाहट के स्वर के साथ ही, केतकी की माँ की नींद खुल गयी ,बाहर आकर देखा ,दिन निकलने ही वाला है। उन्हें घड़ी देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी ,उन्हें इतना अंदाजा है ,कब, क्या करना है ?जो सभी कार्य समय पर निपट जाते हैं। तभी उन्हें स्मरण हुआ ,केतकी को भी तो जगाना है। सीधे वापस अपने कमरे में गयीं और बेटी को हिलाते हुए बोलीं - प्रेम ! उठ जा ! दिन निकल आया।
उह !इतनी जल्दी दिन कैसे निकल आया ?अंगड़ाई लेते हुए केतकी बोली।
हाँ ,जल्दी उठ जा ! मैं चाय चढ़ाने जा रही हूँ ,तेरे पापा आने ही वाले होंगे ,कहकर वो बाहर निकल गयीं।
माँ के जाते ही, केतकी निश्चिन्त हो दुबारा सोने का प्रयास करने लगी। आलस्य के कारण उठने का मन ही नहीं कर रहा था। तभी अचानक एकदम से उठ बैठी ,उसे माँ की बात स्मरण हो आई ,'तेरे पापा आने वाले होंगे।' पापा का स्मरण होते ही ,नींद न जाने कहाँ भाग गयी ?
वो उठी और उसने बस्ता खोला और अपनी किताब निकाली, उन्हें उलट -पलटकर देखने लगी। कितनी अच्छी नींद आ रही थी ? इतनी जल्दी दिन कैसे निकल आया ?सोचते हुए उसने जम्हाई के साथ अंगड़ाई ली। किताब उठाते हुए भी , उस पर जोर पड़ रहा था। न जाने क़िताब कितनी वजनी हो गयी हो ?पहला घंटा तो इतिहास का है ,इसमें क्या पढूं ?पहले उसने किताब निकाली, उसके पन्ने पलटकर देखने लगी। चित्र देखें, फिर सोचा कि प्रश्नों के उत्तर लिख लेती हूँ।
कॉपी निकाली ,उसमें देखा ,पिछले दो अध्याय भी उसने अभी तक पूरे नहीं किये हैं। इतना सारा काम ,मैं कैसे कर पाऊँगी ? कॉपी वहीँ छोड़कर बाहर आई ,अभी दिन ठीक से नहीं निकला है ,माँ से बोली -मेरे लिए भी थोड़ी सी चाय बना दो !
एक गहरी स्वांस लेकर उसने सभी प्रश्न गिने ,पिछले पाठों के दस प्रश्न लिखने अभी बाक़ी थे ,तब इस पाठ के छह प्रश्न अलग हैं। इतना जल्दी तो नहीं कर पाऊँगी ,डांट तो जब भी पड़ेगी। मन में आया, इस पाठ के प्रश्न कर लेती हूँ ,पीछे के पेज़ छोड़ दूंगी। फिर सोचा- चार पेज़ में ये प्रश्न नहीं आये तो क्या होगा ?इतनी जद्दोजहद के पश्चात इस निर्णय पर पहुंची। किताब में ही वह प्रश्नों के उत्तर पर निशान लगा लेगी। उत्तर तो जानती ही हूँ ,सोचते हुए अपनी होशियारी पर मंद -मंद मुस्कुराई।
सोचा -जब मैडम पूछेंगी - कॉपी में काम क्यों नहीं किया ? तब कह दूंगी - पुस्तक में निशान लगा दिए हैं,जब ये सही होंगे तो बाकी के मैं, घर पर जाकर कर लूंगी। यह सोचकर उसने इतिहास की किताब बंद कर दी।
तभी स्मरण हुआ , पाठ पढ़कर आने के लिए भी तो कहा था ,तब वापस से किताब निकाली। उसे कुछ देर पढा - बाबर कौन था ? मुझे इससे क्या मतलब ? वो तो मर गया ,अब उसे याद क्यों करना ?उसके घरवाले याद करें , जो होगा, देखा जाएगा। यह सोचकर उसने वह किताब फिर से बंद करके रख दी।
जब गणित का नंबर आया, गणित के अक्षर उसे गोल-गोल घूमने लगे शून्य की तरह नजर आ रहे थे। जोड़ना -घटाना अच्छे से आता था ,दुकान पर अच्छे से, मोल भाव करके लाती हूँ। किंतु यहां किताब में, माना कि जैसे, प्रश्न पढ़कर उसे नींद आने लगती है। दिमाग में कुछ नहीं भर रहा था। मजबूरी में पढ़ना पड़ रहा था ,बार -बार बाहर झांकती।
बाहर पिता जो बैठे थे ,इसीलिए बस्ते का बोझ ढ़ो रही थी। तब एक किताब को लेकर चारपाई पर बैठ गई और समझने का प्रयास करने लगी, माना कि तुम्हारे पास चार आम है , पांच आम मोहन ने तुम्हें दे दिए ! अब तुम्हारे पास कितने आम बचे ?
तभी उसे कल सुबह की घटना स्मरण हो आई और मुस्कुराई, मन ही मन बुदबुदाई - मैंने तो तीनों आम खा लिए , निर्मला को एक भी नहीं दिया। सोच कर मुस्कुराई और धीरे-धीरे किताब उसके चेहरे पर आ गई कुछ ही मिनट में वह निंद्रा की गोद में चली गई।
केतकी के पिता ने ,उसकी माँ से पूछा - प्रेम, क्या कर रही है ?
अंदर बैठी पढ़ रही है ,जब से आपने डांटा है ,परेशान है।
परेशान क्यों है ? उसे पढ़ने के लिए ही तो कह रहे हैं। उसी में उसका मन नहीं है। उसके दोनों भाई अच्छे नंबरों से पास हुए हैं। पढ़ रही है तो अच्छा ही है। उसकी हरक़तों से लगता नहीं है ,उस पर डांट का कुछ असर हुआ होगा।
मुझ पर विश्वास नहीं है ,तो जाकर आप ही देख आइये और उसे भी चाय दे आइये !कहते हुए पतीले से चाय गिलास में करके उनके हाथ में पकड़ा दी।
जब वो चुपचाप चाय लेकर आगे बढ़े तो सोचने लगी ,ये इतने बुरे भी नहीं हैं ,सारा दिन काम करते हैं। इसीलिए बच्चों की चिंता करते हैं ,बच्चे क़ाबिल हो जायें ,हमें और क्या चाहिए ?
तभी अंदर से तेज स्वर सुनाई दिया ,अब न जाने अब क्या हो गया ? साग चूल्हे पर रखकर तुरंत ही तेजी से अंदर की तरफ दौड़ पड़ी। अब पता नहीं ,इस लड़की ने क्या कर डाला ?
अंदर जाकर देखा तो ,वो केतकी पर चिल्ला रहे थे -तेरी नींद ही पूरी नहीं होती ,रात को देखो !जब सो जाती है। हम बाहर बैठे सोच रहे हैं ,वो पढ़ाई कर रही है ,अपनी पत्नी को आते देख बोले -देख लो !कैसी पढ़ाई कर रही है ? तुम कह रहीं थीं ,'ये परेशान है। '
क्या तुम्हें ये परेशान नजर आती है ''अरे ये परेशान होने वाली पार्टी नहीं ,परेशान करने वाली पार्टी है। ''जी में तो आ रहा है , कहते उसे थप्पड़ मारने के लिए आगे बढ़ते हैं।
तभी चिंता ने आगे बढ़कर उनका हाथ थाम लिया ,' ये आप क्या कर रहे हैं ? अभी बालक है ,बेटियों पर क्या कोई बाप हाथ उठाता है ? अब इसने क्या कर दिया ?
वो वहीँ रुक गए और बोले -जब मैं यहाँ आया तो किताब मुँह पर रक्खे सो रही थी।
रात में देर रात्रि तक पढ़ती रही ,इसीलिए आँख लग गयी होगी ,बेचारी ! पढ़ तो रही है।इसकी क़िताबों का बोझ ही कुछ ज्यादा है। क़िताबों को देखते हुए ,कहती है -आप ही देखिये ! कितनी सारी क़िताबें हैं ? इसके दिमाग़ पर तो, वैसे ही बोझ पड़ रहा है।
इसके लिए क्या अलग से किताबें छपती हैं ?या स्कूलवालों को इससे कोई दुश्मनी है ?सभी के लिए है ,सभी पढ़ रहे हैं। इसे समझा लो ! मेरा खाना खेत पर भिजवा देना, मुझे देर हो रही है कहते हुए केशवदास जी बाहर निकल गए।
