बाहर और अंदर एकदम सब कुछ शांत था। नेहा ने इधर -उधर देखा ,किन्तु उसे कुछ दिखलाई नहीं दे रहा था। कमरे में 'स्याह अंधेरा'छाया हुआ था। हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। न जाने, वो कहाँ है ? कौन मुझे यहाँ लेकर आया है ? उसके मन में प्रश्न उभरा।
वो अंधेरे में आगे बढ़ी ,उसका तन काँप रहा था ,वो आगे बढ़ती रही। आखें होते हुए भी, उस अंधकार के कारण नेत्रहीन की तरह आगे बढ़ रही थी। हाथों से कोई रास्ता ढूंढते हुए ,आगे बढ़ने का प्रयास कर रही थी।
किसी तरह खिड़की के क़रीब पहुंची,उसने बाहर झाँकने का प्रयास किया, किन्तु बाहर भी कोई रौशनी नहीं थी। आज शायद चाँद भी इस' स्याह रात्रि' के कारण आया नहीं या छुप गया। सब कुछ खामोश था। न ही हवा चल रही थी , न ही किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आ रही थी।
दूर कहीं कोई रौशनी दिख रही थी किन्तु उसकी दूरी इतनी थी। उसके होने का आभास मात्र ही था। उस रौशनी से, नेहा को कोई लाभ नहीं था। न ही उस कमरे में उससे रोशनी हो सकती थी और न ही नेहा के मन के अंधेरे में उस रोशनी से कोई लाभ था ?
उसके भीतर भी,भयंकर अंधकार छाया था, ऐसा सन्नाटा जो भीतर तक हिला दे !अपने भीतर के अंधकार को टटोल रही थी। वो उस भयावह सन्नाटे से ड़र रही थी। दूर-दराज़ तक कोई आहट नहीं थी। कोई है, जो मुझे बचाएगा ! चिल्लाते हुए उसने उस खिड़की से बाहर देखा।
उसकी आवाज भी उस अंधकार में, अकेली घूम फिरकर वापस आ गई। उसकी सहायता के लिए भी वहां पर कोई नहीं आया । उसे इस कमरे में बंद कर दिया गया था। यह रात उसके जीवन भर की' स्याह रात्रि ' बन गई।
उसे स्मरण हुआ, जब वह अपनी सहेली के घर से अकेली वापस घर आ रही थी। गली के मोड पर ही, अचानक किसी ने उसके चेहरे को ढक दिया और वो 'स्याह अँधेरा ' उसके जीवन पर छा गया।
न जाने कितने लोग थे ? वो कुछ देर तक संघर्ष करती रही ,तब किसी ने उसके सर पर कुछ मारा और वो बेहोश हो गयी। जब आँख खुली तो उसने अपने को इस अँधेरे कमरे में पाया।
वे लोग कौन थे ,मेरे साथ क्या हुआ ? वो कुछ नहीं जानती किन्तु इतना तो अवश्य जानती है ,उनका उद्देश्य सही नहीं था ,उसके साथ कुछ तो गलत हुआ है। यह सब सोचकर वो रोने लगी। इतनी' स्याह रात ' ने उसके जीवन में भी अपना असर छोड़ दिया है। जिसको चाहकर भी वो ,मिटा नहीं सकती।
