उर्वशी संक्षेप में, अपने पति समीर को बताती है - जिस दिन चतुर के घर का मुहूर्त था , उसी दिन पुलिस उसे लेने आ गई। कमाल की बात तो यह देखिए ! वह पुलिस इंस्पेक्टर और कोई नहीं चतुर के बचपन का मित्र ही था। जब उसका मकान बन रहा था, तब भी पुलिस आई थी और उस महिला के पति ने ही, उसे जेल भिजवाया था। सुनने में तो आया था, कि वे लोग, कोई जमीन का लेन देन कर रहे थे। 'चतुर भार्गव' ने उस महिला के साथ भी बेईमानी की। उसका झूठ भी पकड़ा गया, चतुर ने उससे ,अपने को कुंवारा बताया था।
अब उस महिला को पता भी चल गया था कि यह 'शादीशुदा 'है ,इस बात पर उसे बहुत क्रोध आया कि उसने मुझसे इतना बड़ा झूठ बोला। तब उसने क्रोध में आकर उसको जेल भिजवा दिया।
''एक सेर दूसरा सवा सेर''
क्या मतलब ? मैं, कुछ समझी नहीं।
वह महिला भी चतुर थी ,चतुर को, अपने तन के आकर्षण में, अपने घर में रोके रखना चाहती थी और ये नहीं चाहती थी, कि वो 'आत्मनिर्भर' बने ,अथवा अपने लिए कुछ सोचे ,उसका लाभ उठाना चाहती थी और यह उसका भी' गुरु' निकला। इसने, उससे पैसा भी कमाया और उस औरत को बेवकूफ बनाकर उसका शारीरिक शोषण भी करता रहा। वो भी उसके पति के सामने ,यह भी तो हो सकता है ,इसमें उसके पति की ही रजामंदी हो ,स्वयं तो कुछ कर नहीं पा रहा था ,तब अपनी पत्नी को हथियार बनाकर चतुर का लाभ उठाना चाह रहा हो , कहकर समीर हंसा।
ऐसा, तुम्हें क्यों लगता है ?
बात स्पष्ट है, वह महिला उसे अपने समक्ष रखना चाहती थी, और सोचती होगी- कि मेरे परिवार के जितने भी कार्य हैं , यही करता रहेगा ,पैसा कमाने के लिए तो उसका पति था ही....
चतुर का ये लालच था, उस महिला के पास बहुत अधिक पैसा होगा। जवानी और पैसा दोनों ही चीजें उसे बैठे -बिठाये मिल रही थीं, किंतु जब उस महिला को पता चला कि यह मुझे धोखा दे रहा है तो उसने ,चतुर से अपना बदला लिया। इन बातों से स्पष्ट है , इसमें उसका पति भी शामिल है ,मुझे उन हालातों को सुनकर तो यही लग रहा है। ये सब जो भी हो रहा था ,उसमें उस महिला के पति का पूरा सहयोग था।
वो कैसे ?
तुम ही सोचो ! एक अनजान इंसान तुम्हारे घर में आता है ,रहने लगता है ,उसकी पत्नी भी उस अनजान की तरफ आकर्षित होती है ,उनके रिश्ते आगे बढ़ते हैं। उसके पति को सब मालूम था फिर उसने उनका विरोध क्यों नहीं किया ? उस इंसान को घर से बाहर क्यों नहीं कर दिया ? जो उसकी पत्नी पर ग़लत नज़र डालता है। मैं मानता हूँ ,उसकी कोई कमज़ोरी रही होगी ,तभी ये सब देखकर भी, अनदेखा कर रहा था।
चतुर ने उनके साथ छल किया,तब भी वो अपनी पत्नी से नाराज़ होने के बदले, अपनी पत्नी के साथ खड़ा है। मुझे तो दोनों की ही मिली -भगत लग रही है।
हां, शायद ऐसा हुआ हो सोचते हुए उर्वशी ने कहा।
ख़ैर ये सब छोडो ! उनके मध्य जो भी रहा हो ,ये तो पक्का है ,उसको 'जेल' भिजवाने में दोनों पति -पत्नी का ही हाथ था, किन्तु उन्होंने ऐसा दिखलाया ,जैसे ये सब उनकी पत्नी ने किया है ,उन्हें तो मालूम भी नहीं था। वो, उसका विश्वास जीत रहे थे ,जिससे वो सारी बातें उन्हें बताता।
तब उनके वक़ील ने दोनों को सलाह दी ,कोर्ट -कचहरी के चक्कर में न पड़ें ,आपका जितना भी पैसा बनता है ये उसे चुकाएगा या फिर आपका उद्देश्य इसको' जेल' पहुंचाना ही है।
यदि हमारा पैसा मिल जाता है ,तो हमें कोई परेशानी नहीं है ,कहकर अंजलि ने चतुर से अपने सभी रिश्ते तोड़ लिए। अंदर ही अंदर अंजलि उसकी सच्चाई जानकर टूट गयी थी। चतुर सच में ही ,उसके जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुका था। ऐसे हालातों में ,उसके पति ने ही उसे संभाला। अब कुछ नहीं किया जा सकता था ,चतुर का अपना एक परिवार था ,उसके माता -पिता ,बीवी -बच्चे थे।
एक दिन एकांत में अंजलि ने उससे पूछा था -तुमने, हमें इतना बड़ा धोखा दिया ,तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी।
मैं तो, अभी भी तुम्हारा हूँ , जैसे तुम्हारे पति के रहते हम मिलते रहे हैं ,ऐसे ही कस्तूरी के रहते, हम अभी भी मिल सकते हैं ,वो कुछ नहीं कहेगी। मेरा कार्य तो आप जैसी अबलाओं के कष्ट दूर करना ही है ,उसके चेहरे पर एक ज़हरीली मुस्कान थी।
वो समझ गयी ,अब इसे, हमारी आवश्यकता नहीं ,इसीलिए अपना रंग दिखा रहा है।
चतुर को एक समय सीमा दे दी गयी ,यदि वो उस समय में, उनका पैसा नहीं चुकाता है ,तो तब इस पर फिर से क़ानूनी कार्यवाही होगी। इस सब में भी, उसे अपनी सुकून भरी ज़िंदगी में वापस लौटने में ,कम से कम छह माह लग गए थे।
तब चतुर ने, अपने घर को संभाला और एक नवीन पाठशाला की स्थापना की। मानसिक रूप से तो वह अपने आपको भावी जीवन के लिए पहले से ही तैयार कर चुका था। किंतु इस केस के चलते अब मोहल्ले और आस - पड़ोस में, 'बेईमान' शब्द उसके नाम के साथ जोड़ा जाने लगा था। लोग उसे शक की दृष्टि से देखते और उससे कतराने लगे थे।
किंतु चतुर ने हिम्मत नहीं हारी, उसने भी जिंदगी में बहुत कुछ देखा था। अब तो वह अपनी मंजिल के बहुत करीब ही था। उसने स्कूल खोल लिया था और उस स्कूल के' शुभारम्भ 'के लिए उसने, सुमित अग्रवाल को ही 'उसका 'उद्घाटन 'करने के लिए बुलाया।
वह लोगों को दिखला देना चाहता था, कि हमारे संबंध बिगड़े नहीं हैं , पहले जैसे ही हैं , बस थोड़ी सी गलतफहमी हो गई थी।
इधर सुमित अग्रवाल सोच रहे थे -यह आज भी हम पर इतना विश्वास करता है और हमें सम्मान देता है किंतु अब अंजलि उससे कोई संबंध नहीं रखना चाहती थी।
चतुर भी कम नहीं था, अपनी हरकतों पर मन ही मन मुस्कुराता था , जैसे उसकी सभी योजनाएं सफल होती जा रही हैं। उसकी वो जहरीली मुस्कान अंजलि को चुभती थी। धीरे-धीरे चतुर अपनी जिंदगी में व्यस्त होने लगा। अभी बच्चे कम ही आ रहे थे, किंतु जो भी आ रहे थे ,उससे चतुर संतुष्ट था,वो जानता था ,काम बढ़ेगा ही !
कस्तूरी ने तो अपनी पढ़ाई ही छोड़ दी थी। घर- गृहस्थी में तो जैसे वह सब कुछ भूल गई थी, किंतु चतुर ने उसे, सब स्मरण कराया, और उसे ही स्कूल की ' प्रधानध्यापिका 'बना दिया।
उसने कहा -छोटे बच्चों को पढ़ाना ही क्या होता है ? ए.बी.सी.डी. या फिर अ आ
