Shaitani sa......4

केतकी का, अपने घर जाने का मन नहीं कर रहा था , तब वह निर्मला  को साथ लेकर, एक नीम के पेड़ के नीचे बैठ जाती है। दोनों सहेलियां आपस में बातें करती हैं। उनकी बातें किसी सामाजिक मुद्दे पर नहीं थीं  ,न ही, उनकी बातों का कोई उद्देश्य था। बस ऐसे ही समय बिताना था ,जिसमें अपने दिल की बात अपनी सख़ी से कहती हैं। वो उम्र में न ज़्यादा बड़ी हैं ,इतनी छोटी भी नहीं ,कि कुछ भी समझ न सकें ,वो उम्र के उस मोड़ पर हैं ,जहाँ ज़िंदगी को समझने का प्रयास कर रही है। जहाँ बच्चों में गिनी जाती हैं किन्तु वे अपने को बड़ा समझने लगीं हैं ,विशेषरूप से केतकी ! जिसमें उस की सोच अलग ही दिशा में जा रही है। 

 केतकी ,अपनी उम्र से कुछ ज्यादा ही सोचती है। उसकी अपनी एक अलग ही सोच बनती जा रही है।वो आस -पास के वातावरण देखती है और समझने का प्रयास भी करती है।  

केतकी निर्मला से पूछती है -तू किस तरह के लड़के से विवाह करेगी ? उसके इस प्रश्न पर निर्मला शरमा  जाती है और उससे कहती है - तू ऐसी बातें क्यों कर रही है, क्या तुझे शर्म नहीं आती ?लड़कियां ऐसी बातें थोड़े ही करती हैं। 


तब केतकी उसे समझाती है - तू, पागल है ,हम क्या यहीं रहेंगे ? तूने देखा नहीं ,मेरी दोनों बड़ी बहनें ब्याह करके अपनी ससुराल गयी हैं ,तो क्या हमारा नंबर नहीं आएगा ?हम ऐसी बातें नहीं करेंगी तो और कौन करेगा ? हमारे घरवाले भी तो यही सोचते हैं। क्या मेरी बहनों ने नहीं सोच होगा ?

सोचा भी हो तो, क्या हुआ ? विवाह तो उनका वहीं हुआ ,जहाँ घरवालों ने किया। तब अत्यधिक सोचने से क्या लाभ ?

अधिक नहीं सोचना है ,अपने लिए सोचना है ,तू मत सोच !किन्तु मैंने तो सोचा है - मेरा दूल्हा भी ,उस पिक्चर की तरह सफेद घोड़े पर सवार होकर आएगा। अब तू बता ! तुझे कैसा दूल्हा चाहिए ?

मुझे नहीं पता ,मैंने नहीं सोचा ,अब घर चल ! बहुत देर हो गयी ,दिन छिपने वाला है, कहकर  वो उठी और घबराते हुए बोली -'हे भगवान !अभी मम्मी वापस न आई हों।' 

ड़रपोक कहीं की...हमेशा डरती रहती है, कहकर केतकी भी उठी ,बोली -चल, चलते हैं।  

 कहां गई थी ? जैसे ही केतकी ने अपने घर की चौखट पर क़दम रखा उसे अपने पिता की कड़क आवाज सुनाई दी। केतकी के पांव वही के वहीं थम गए और चुपचाप इधर-उधर देखने लगी। पिता ने उसके सामने आकर पूछा - कहां गई थी ?

पवन की, भाभी को बच्चा हुआ है , पवन' चाचा' बन गया ,उनके यहां गीत गाए जा रहे थे, वहीं  गई थी ,पिता को सामने देख थोड़ा घबरा गयी थी।  

 किससे पूछ कर गई थी ? उन्होंने तुझे बुलाया था ,तू घर की बड़ी है ,जो बिना किसी को कुछ बताये ,घर से निकल गयी। तूने अपनी मां से पूछा था या हमसे पूछा था या उन्होंने तुझे ही बुलाया था। 

मैं अकेली नहीं गई थी, निर्मला भी मेरे साथ थी, अपना बचाव पक्ष रखते हुए केतकी ने जवाब दिया।

उसके पिता को बहुत गुस्सा आया और बोले -तुझे पढ़ना- लिखना है या नहीं, ''त्रैमासिक परिक्षा'' में तो फेल हो गई थी और अब भी तुझे कोई फिक्र नहीं है। चल अंदर ! देर रात गांव में घूम रहती है। कहते हुए उन्होंने उसे अंदर जाने के लिए कहा। 

अंदर जाकर केतकी ने अपने कपड़े बदले और बाहर आई ,सोचा था - अब भोजन करके थोड़ी देर पढ़ने बैठ जाऊंगी।

उसे देखकर उसके पिता बोले - तुझे ,यहां रहकर पढ़ाई करनी चाहिए थी या फिर वहां गीत गाने जाना था। क्या तेरी मां ने तुझसे कहा था, तू चली जा... वो भी तो गयी थी, उसके साथ ही चली जाती ,तब भी वो तुझसे पहले घर आ गयी। केतकी'' बगलें झाँकने लगी ''अब क्या कहे ?

 किवाड़  के पास खड़ी चारपाई के बानो को हाथों से कभी आगे करती, कभी पीछे करती उसके पास अब कोई जवाब नहीं था। मन ही मन सोच रही थी बेकार में ही पढ़ाई का काम दे दिया। मुझे जब पढ़ना ही नहीं है। पढ़कर क्या हो जाएगा ? मन ही मन सोच रही थी, किंतु पिता से कहने का साहस नहीं जुटा पा रही थी। 

उधर से कोई जबाब आते न देखकर वो बोले - तू , निर्मला के साथ गई थी , तुझे पता है, निर्मला के कितने नंबर आए थे , पूरी क्लास में तीसरे नंबर पर है और तू फेल हो गई। तुझे पढ़ना है या नहीं, लोग तो अपने लड़कों को भी नहीं पढाते, काम में लगा देते हैं और हम तुझे पढ़ाना चाहते हैं। तब भी तू पढ़ना नहीं चाहती।तुझे पढ़ना है ,या नहीं .... 

केतकी चुपचाप खड़ी उनकी बातें सुन रही थी और सोच रही थी ,जो काम मुझे पसंद नहीं है ,उसे ज़बरन ही करा रहें हैं ,ऊपर से एहसान भी दिखला रहे हैं किन्तु कुछ कह न सकी क्योंकि वह जानती थी अगर उसने कहा' कि मैं पढ़ना नहीं चाहती तो, पिता के थप्पड़ भी खाने पड़ सकते हैं।' इसलिए सोचा -हां पढ़ूंगी, कहकर अपनी जान छुड़ा लूं ,वही बहुत है। उसने हाँ में गर्दन हिलाई।

ये क्या है ? क्या मुँह में 'दही जमा है ?'वैसे तो सारा दिन पटर -पटर बोलती रहती है ,डांटते हुए बोले।  

हां, मुझे पढ़ना है,अपनी इच्छा के विरुद्ध बोली।  

पढ़ना है, तो चल अंदर, कमरे में जाकर बैठ और अपनी पढ़ाई कर !

इस बेचारी को क्यों डांट रहे हो ? बच्ची ही तो है,अब आ गयी है तो पढ़ लेगी, केतकी की मां बोली। 

ये तेरे ही कारण ही बिगड़ रही है, तुझे इतना भी नहीं पता है ,कि यह कहां घूम रही है ? सारे गांव में घूमती रहती है, पढ़ाई छोड़कर सारे काम करती है।आम तोड़ने के लिए किसी के भी बाग़ में घुस जाएगी , पवन चाचा बन गया तो यह जाएगी। किसी को बच्चा हुआ है तो यह जाएगी।  किसी के यहाँ शादी हो रही है,तो ये जाएगी।  गांव की बड़ी-बूढी  यही तो रह गई है, फिर चाहे इसे कोई बुलाए या न बुलाए। 

उनकी बातें सुन रोटी का टुकड़ा अपने मुँह में रखते हुए ,उसने एक नजर अपने पिता पर डाली ,सोच रही थी ,इन्हें सब पता है। उस माली को तो मैं मिली भी नहीं, फिर मेरी चुगली किसने की ? उसका, पिता की बातों पर अब ध्यान नहीं था। उसने अपना भोजन पूरा किया और हाथ धोने नल पर चली गयी। 

उसके पीछे पिता की आवाज गूंज रही थी - तूने कभी इसे समझाने का प्रयास किया। अच्छे से पढेगी तो इसकी  ज़िंदगी संवर जाएगी , कहीं अच्छी सी जगह इसका विवाह हो जाएगा। 

ये मुझे पढ़ने पर इतना ज़ोर क्यों दे रहे हैं ? क्या मुझे ब्याह के लिए ही पढ़ना है ? मेरा जीवन इनके लिए कोई मायने नहीं रखता ,मैं क्या सोचती हूँ ,क्या करना चाहती हूँ ? इससे, इन्हें भी तो कोई मतलब नहीं है। सारा दिन यही बातें सुन -सुनकर थक गयी हूँ। 

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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