Rishton ka aaina

 कुछ रिश्ते रक्त से जुड़े होते हैं ,तो कुछ रिश्ते, भावनाओं से जुडे  होते हैं।  भावनाएं जो हृदय से उत्पन्न होती हैं। जैसे मित्रता का रिश्ता ! कितना साफ- सुथरा, स्वच्छ रिश्ता होता है। पारिवारिक रिश्तों से हम बचपन से ही जुड़े होते हैं। संसार में आने के पश्चात ,सबसे पहले हमारा परिचय इन रिश्तों से ही होता है। उनमें कोई उसका चाचा ,बाबा ,पिता इत्यादि रिश्ते जिनसे रक़्त संबंध होता है।  ये सब मेरे अपने हैं। उस इंसान को इस बात का एहसास रहता है। 

रिश्ते जहाँ  शीशे की तरह नाजुक होते हैं, तो वहीँ प्रेम के बंधन से बंधे मजबूत भी होते हैं।  भावनाओं से, विचारों से, अपनी बातों से , हम इन रिश्तों को आईने की तरह , स्वच्छ रखना चाहते हैं, ताकि वे, हमें पारदर्शी आईने की तरह दिखलाई  दें ।


 किंतु जिंदगी इतनी सरल भी नहीं है। यह रिश्ते दिखाई देते हैं कि हमारे अपने, सभी हमारे साथ खड़े हैं। सुख में और दुख में यही हम परिवार में रहकर सीखते हैं और यही महसूस भी करते हैं। किंतु समय और परिस्थितियाँ  सबकी एक जैसी नहीं रहतीं। जीवन में उतार-चढ़ाव तो आते ही रहते हैं। इतने लम्बे जीवन के अंतराल में, तब हमें रिश्तों की सच्चाई का भान होता है ,जब ये रिश्ते हमारे साथ खड़े नजर नहीं आते।  ये रिश्ते इतने नाजुक हैं ? तनिक सी भी गलफ़हमी उनमें दरार डालने में समय नहीं लगाएगी। 

देखा जाये तो...इनमें कितना स्नेह होता है ,अपनापन लिए ये रिश्ते, एक समय पर  खोखले नज़र आने लगते हैं। तब लगता है ,यही  रिश्ते हमें भृमित किये हुए थे। तब वो 'आइना धुंधला' नज़र आता है। 

 रिश्ते इंसानों से जुड़े होते हैं ,इंसान ही एक सामाजिक प्राणी है।  वही इंसान , जिसके अंदर  प्रेम के साथ-साथ कड़वाहट ,घृणा , द्वेष, मोह  छल इत्यादि भावों के साथ -साथ  उसका अहं भी भरा  होता है। 

ऐसे में सच्चे और अच्छे रिश्तों की पहचान ही वह 'आइना' हमें करवाता है। तब हमें पता चलता है हमारे दुख में हमारे साथ कौन खड़ा है ? पहले तो हम इन रिश्तों को हृदय से जोड़ लेते हैं और अपना समझ बैठते हैं।छल रहित  भावनाओं से जुड़ जाते हैं। सुख हो या दुःख  इनकी परख ये रिश्तों का आइना ही करवाता है। 

आईने में तो इंसान का प्रतिबिम्ब नज़र आता है किन्तु 'रिश्तों के आईने' में उनका व्यवहार ,उनका प्रेम ,पारिवारिक मजबूती सब नजर आता है।  रिश्ते प्रेम से मजबूत होते हैं और  ईमानदारी से चमकते हैं। यदि इन रिश्तों में छल ,द्वेष ,लोभ इत्यादि का तनिक भी बाल आ जाये तो इस आईने को चटकने में देर नहीं लगती ,जिसके कारण वो' आइना' विकृत हो जाता है। ' रिश्तों का आइना 'प्रेम, त्याग और सच्चाई से चमकता है। थोड़ी सी सूझबूझ ,समझदारी इस आईने को और चमका देती है। अविश्वास ,झूठ ,रिश्तों को धुंधला करने में देर नहीं करते।  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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