Zeenat [part 71]

इंस्पेक्टर कविता जब ज़ीनत से पूछताछ कर रही थी ,तब वो कहती है - जब तुम्हें मालूम था ,कि तुम्हें छूत की बिमारी है ,तब तुमने, उनसे मना क्यों नहीं किया ?

 मैं क्या भूखी मरती ? मुफ़्त में ,मुझे खाने को कोई नहीं देता ,काम कोई नहीं देता ,मेरे दिमाग़ में दर्द है, कहते हुए उसने अपने माथे पर हाथ रखा। [उसके कहने का अर्थ था - जब मुझे इस तरह से खाने को मिल रहा था तब अपनी बीमारी के विषय में बताकर अपने पेट पर क्यों लात मारती ? उसके दिमाग़ में फोड़ा नहीं था ]

अच्छा ,मनोरमा ने इंस्पेक्टर कविता की तरफ देखा ,जैसे कह रही हो - ये 'पाग़ल' तो हरगिज़ नहीं है। सब जानती है और समझती भी है। बोली -जब तू ये सब जानती है तो इसका मतलब ये सब तूने जानबूझकर किया। 


मैंने किसी से कोई जबरदस्ती नहीं की ,किसी की खुशामद नहीं की। भीख नहीं मांगी पुलिस जी ! शराबियों की तो छोडो ! जो भले घरों के लगते थे। वे भी मेरे पीछे -पीछे आ जाते थे। कुत्तों को जानती हो !

इससे पहले कि वो कुछ और कहती ,इससे पहले ही मनोरमा चिल्ला उठी। ए !! चुप कर जितना पूछा जाये उतना जबाब दे !

 मेरी अब इज्ज़त कहाँ रही ? पेट तो रोटी मांगता है , इसे तो भरना ही था। कुछ तो इज्जत लूटकर भी बेइज़्जती से बाज नहीं आते थे। रात भर मैं उनकी रानी रहती ,सुबह देखते ही मुँह सिकोड़ लेते ,कहते हुए उसने घृणा से थूका। 

इंस्पेक्टर कविता , डी.एस.पी. सुनील वर्मा से बातचीत करती है। सर !ये बिमार है किन्तु' पगली 'नहीं है  इसने जो कुछ भी किया' पेट की आग बुझाने' के लिए किया। ये नाम इसे लोगों ने दिया है ,जब कोई भी इसके साथ गलत करता है ,तो ये लड़ने लग जाती है। पहनने को ठीक से कपड़े नहीं ,इसकी हालात देखकर उन्होंने इसे ये नाम दिया। 

इसके साथ इससे बुरा क्या होगा ? जो ये लड़ती है। 

इससे काम करवा लेते हैं, किन्तु जब इसे पैसे या खाने को न दें। तब ये बहुत गंदा बोलती है। वो सब जो भी इसने कहानी सुनाई थी ,सिर्फ़ सहानुभूति पाने के लिए किया था। इसके घर में इसके ही लोग इसे रहने नहीं देते इसीलिए सड़कों पर धक्के खाती फिरती है। इसके अंदर बहुत अधिक गुस्सा तो भरा है ,हो सकता है ,ये सब इसने' बदले की भावना' से किया हो किन्तु ये नहीं लगता कि इसका कोई गैंग है या इसे किसी ने भेजा है। 

इसका इस तरह सड़कों पर घूमना भी तो उचित नहीं है ,कविता जी ! एक तरीक़े देखा जाये तो ये पुरुषों के लिए 'मानव बम' की तरह ही है। जो कि बहुत ही गलत है। 

पता नहीं,वे कौन लोग हैं ? जिन्होंने इससे संबंध बनाये होंगे। अगर आप इसे देखेंगे तो इसे छूने का भी मन नहीं होगा। जिन लोगों के इसने नाम बताये हैं ,वो सभी अच्छे परिवारों से हैं। सोचकर भी घिन्न आती है ,लोग कितना नीचे गिर सकते हैं ? एक ग़रीब ,बिमार महिला को भी नहीं छोड़ा। 

वो कुछ भी कहानी बना रही है और तुम सुने जा रही हो। उसने किन लोगों के नाम बताये ? हो सकता है ,इसमें भी इसका कोई झूठ हो ,उन्हें बदनाम करने के लिए कोई इससे ऐसा करने को कह रहा हो। वैसे उनकी अपनी  निजी ज़िंदगी है ,हम उसमें दखलन्दाजी नहीं कर सकते ,जिसने भी गलत किया होगा वो अपने आप झेलेगा। 

 तुमने सोचा, वो लोग इसे क्यों छेड़ेंगे ? क्या उनका अपना  परिवार नहीं है ? इसकी शिकायतें तो बहुत है। एक महिला तो रिपोर्ट करने आई थी ,कि ये उस पर डंडे बजाने गयी थी। वो तो अच्छा हुआ, उसने अपने आगे कुर्सी अड़ा दी वरना ये उसका सर फोड़ देती। क्या वो भी कोई पुरुष था ? इसके दिमाग़ में जो बात बैठ जाती है ,उसको दोहराती रहती है। इसके अंदर क्रोध भरा होगा ,तब अपने से कमज़ोर पर उतार देती है। 

सर !आप इसके विषय में इतना सब जानते हैं ,आश्चर्य से कविता बोली। 

हम इसके विषय में उससे भी ज़्यादा जानते हैं ,पुलिस में यूँ ही भर्ती नहीं हुए ,हमने इससे नहीं कहा - ये पुलिस की ड्रेस पहने न जाने कहाँ से वे कपड़े ले आई और डंडा भी ले लिया ? हमने इसे पागल समझ यूँ ही छोड़ दिया किन्तु ये उसका भी दुरूपयोग करने लगी। जिन लोगों ने इसे काम दिया ,उनसे अगर चिढ़ गयी तो उस डंडे से कब प्रहार कर दे !पता नहीं , इसको ये बीमारी है। ज़्यादा दिनों तक इसकी इच्छा पूर्ति नहीं होती तब भी ये' पागल' सी हो जाती है।

उनकी बातें सुनकर ,कविता बोली -सर !जब आपको इसके विषय में इतनी जानकारी है तो हमसे क्यों इतनी मेहनत करवाई ?

सुनील वर्मा मुस्कुराये ,निराश होने की आवश्यकता नहीं है ,वो तो हम जानना चाहते थे ,ये किस समूह से जुडी है किसी ने इसे भेजा तो नहीं है। तुमने भी हमें बहुत महत्वपूर्ण जानकारी दी हैं। 

अब क्या करना है ?सर !

फ़िलहाल इसे लॉकअप में ही रखो ! इसका आगे क्या करना है ?ऊपर से इजाज़त लेनी होगी।     

कभी-कभी आज भी, भूमि,सुदीप  से पूछ लेती है - क्या कोई पगली इतनी बड़ी कहानी रच सकती है ?जो  वर्तमान और भूत का भी नहीं सोच सकती हो। बच्चे होना, पति का छोड़ कर चले जाना। लोगों का उसको मिलना। उसका घर छोड़ कर चले जाना यह सब क्या काल्पनिक हो सकता है ?हो सकता है ,इसने अपने जीवन में यही चाहा हो ,जो एक सपना बनकर रह गया किन्तु उसमें भी तो कुछ अच्छा नहीं हुआ। 

 पुनीत ने भूमि की बातों का कोई जवाब नहीं दिया, क्योंकि वह जानता था भूमि ने अभी दुनिया नहीं देखी है कितने बड़े-बड़े चालबाज़ इस दुनिया में भरे पड़े हैं , किंतु हां इतना अवश्य है , एक गरीब की सहायता करके, शायद यह अब  किसी दूसरे गरीब की सहायता करने से पहले चार बार सोचेगी , इतनी जल्दबाज़ी नहीं दिखाएगी। वैसे जो जैसा होता है ,उसका  स्वभाव कभी बदलता नहीं है। इतना लम्बा जीवन है ,एक न एक कहानी फिर से सामने आयेगी। 

भूमि प्रतिदिन खबरें सुनती ,वो जानना चाहती थी कि आख़िर 'ज़ीनत 'के साथ क्या हुआ ? एक दिन समाचार में सूचना आई। ये 'पागल' सी दिखने वाली लड़की बहुत ही चालाक थी। एक योज़ना के तहत वो अपना कार्य कर रही थी। ये शातिर लड़की जब पकड़ी गयी तो इसने बहुत से ख़ुलासे किये। जो कि गोपनीय रक्खे गए हैं ,एक दिन इसने अपने साथियों के साथ भागने का प्रयास भी किया किन्तु सफ़ल न हो सकी ,पुलिस की गोली उसकी रफ़्तार से ज़्यादा तेज़ थी। ये वहीँ ढ़ेर हो गयी ,इसके साथी भाग निकले। इसने अपने बहनोई पर उसको बर्बाद करने और उसकी बहन को मारने का इल्ज़ाम लगाया था। उसे पकड़ लिया गया है,अभी उससे पूछताछ चल रही है।

 तभी नीचे लिखी एक चेतावनी आई - ये लड़की एक भयंकर बिमारी से पीड़ित थी ,जो भी इसके सम्पर्क में आये वो अपनी जाँच करा लें ! सावधानी ही, सबसे सरल उपाय है।

सुदीप ये क्या हुआ ? भूमि ने पूछा। 

जो कुछ भी हुआ सही था। 

क्या उसका कोई गैंग था ?

तुम मुझसे क्यों पूछ रही हो ? मैं क्या पुलिस में हूँ ?

मुझे नहीं लगता ,वो भागी होगी। 

तुम्हें क्या लगता है ,क्या नहीं ? इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। 

जो भी उन लोगों ने निर्णय लिया सही लिया होगा ,मन ही मन सुदीप सोच रहा था ,वो भागी तो नहीं होगी किन्तु उसका जीना भी तो औरों के लिए ख़तरा ही था।

चलो ! अच्छा है ,उसके जीजा को सजा मिलेगी। 

लापरवाही से सुदीप बोला - वो तो ज़मानत पर छूट जायेगा। उसके खिलाफ पुलिस के पास कोई सबूत ही नहीं है। 

जिसने उसके साथ अनाचार किया और उसकी बहन की हत्या की ,वो छूट जायेगा। जिसने इतना कुछ सहा ,वो अब दुनिया में है, ही नहीं ,उसने जो भी किया बदला लेने के लिए था या सब कुछ होता चला गया। उसकी ऐसी सोच थी भी या नहीं। कई बार ऐसा होता है ,इंसान की सोच, परिस्थितियों के साथ -साथ बदल जाती है। कई बार इंसान ऐसा नहीं होता, जैसा दीखता है।  परिस्थितियाँ उसे बदलने पर मजबूर कर देती हैं जैसे -जैसे इंसान मिलते हैं ,वैसे ही वो जीवन में सीखता चला जाता है और उसकी सोच और व्यवहार बदलने लगता है। गलतियां तो उसकी भी रहीं हैं किन्तु वो अनाथ अपने जीने के लिए कुछ तो करती। यहाँ इंसान नहीं रहते, व्यापारी रहते हैं। यहाँ मुफ़्त में कोई काम नहीं होता। फिर चाहे इसमें नुकसान ही क्यों न हो जाये ?

 उसके साथ कुछ भी हुआ हो या उसने कुछ भी किया हो ,अब इन सबसे तो उसे मुक्ति मिल ही गयी ,सोचते हुए भूमि ने गहरी स्वांस के साथ अपनी कहानी का भी अंत कर दिया। 



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post